Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

प्रमोद भार्गव का लेख : राजनीति में अपराधीकरण खत्म हो

दरअसल, हमारे राजनेता और तथाकथित बुद्धिजीवी बड़ी सहजता से कह देते हैं कि दागी, धनी और बाहुवालियों को यदि दल उम्मीदवार बनाते हैं तो किसे जिताना है, यह तय स्थानीय मतदाता करें। बदलाव उसी के हाथ में है। वह योग्य प्रत्याशी का साथ दे और शिक्षित व स्वच्छ छवि के प्रतिनिधि का चयन करे, लेकिन ऐसी स्थिति में अक्सर मजबूत विकल्प का अभाव होता है। दागी माननीयों की वजह से ही नेक ईमानदार लोग राजनीति में हाशिए पर हैं और उच्च पदों पर बैठने वाले लोग भी कदाचरण करने को विवश हो जाते हैं। साफ है, विधायिका के साथ कार्यपालिका में भी शुद्धिकरण की जरूरत है।

प्रमोद भार्गव का लेख : राजनीति में अपराधीकरण खत्म हो
X

प्रमोद भार्गव 

प्रमोद भार्गव

देश में जब कोई गलत चलन लंबे समय तक चलता रहता है, तो वह कुप्रथा का रूप ले लेता है। भारतीय राजनीति में अपराधीकरण इसी कुप्रथा के शिकंजे में है। वैसे तो सर्वोच्च न्यायालय दागी माननीयों से मुक्ति के लिए अनेक बार दिशा-निर्देश दे चुकी है, लेकिन एक बार फिर न्यायालय ने सख्त लहजे में कहा है कि कानून के तहत सरकार को दुर्भावनापूर्ण दर्ज आपराधिक मामले वापस लेने का अधिकार है, लेकिन उच्च न्यायालय को संतुष्ट किए बिना मामले वापस नहीं होंगे। इसी के साथ न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को भी निर्देशित किया कि वे अपने क्षेत्र के सांसदों व विधायकों पर लंबित निपटारे के मामलों की जानकारी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को दें। इस फैसले को व्यापक रूप देने की दृष्टि से अदालत ने सभी दलों को निर्देशित किया है कि दागी नेताओं के इतिहास की जानकारी अपनी वेबसाइट के होम पेज पर डालें और अपराधों का पूरा ब्यौरा दें।

अदालत ने पिछले वर्ष हुए बिहार विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों के दागी इतिहास को सार्वजनिक करने के आदेश का पालन नहीं करने के मामले की सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया है। दरअसल अदालत में पेश की गई एक रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान और पूर्व सांसद एवं विधायकों के विरुद्ध लंबित मामले दो साल में ही 17 फीसदी बढ़ गए हैं। रिपोर्ट में बताया है कि दिसंबर 2018 में वर्तमान माननीयों के खिलाफ दर्ज मामलों की संख्या 4,122 थी, जो सितंबर 2020 में बढ़कर 4,859 हो गई। दरअसल, राजनीतिक सुधार की दिशा में न्यायालय हस्तक्षेप करके विधायिका को कानून बनाने के लिए उत्प्रेरित तो कर सकती है, लेकिन वह इस दिशा में कोई नया कानून अस्तित्व में नहीं ला सकती? क्योंकि कानून बनाने का दायित्व संविधान ने विधायिका के पास ही सुरक्षित रखा हुआ है। इसीलिए अदालत ने अपने आदेश में माननीयों को जाग जाने का संदेश दिया है। अदालत ने इसके पहले दागी सांसद व विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को सालभर में निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के मामले में भी सख्त रुख अपनाया था। अदालत की इस सख्ती पर केंद्र सरकार ने 12 विशेष अदालतों का गठन कर भी दिया था, लेकिन ये अदालतें अब तक सार्थक परिणाम देने में खरी नहीं उतर पाईं। दरअसल सर्वोच्च न्यायालय ने 10 जुलाई 2013 को जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को अंसवैधानिक करार देते हुए रद कर दिया था। इस आदेश के मुताबिक अदालत द्वारा दोषी ठहराते ही जनप्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त हो जाएगी। अदालत ने यह भी साफ किया था संविधान के अनुच्छेद 173 और 326 के अनुसार दोषी करार दिए लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल ही नहीं किए जा सकते हैं। इसके उलट जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) के अनुसार सजायाफ्ता जनप्रतिनिधियों को निर्वाचन में भागीदारी के सभी अधिकार हासिल हैं। अदालत ने महज इसी धारा को विलोपित किया है। उसके बाद मधु कोड़ा, लालू प्रसाद यादव, जगन्नाथ मिश्र और जयलललिता जैसे नेताओं को जेल जाने का रास्ता खुल गया था।

बीते तीन-चार दशकों के भीतर राजनीतिक अपराधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। महिलाओं से बलात्कार, हत्या और छेड़छाड़ करने वाले अपराधी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं। लूट,डकैती और भ्रष्ट कदाचरण से जुड़े नेता भी चुने जाते हैं। सरकारी जमीनों को हड़पने में भी नेताओं की भागीदारी रही है। हमारे यहां आरोपियों के परिजनों को ही टिकट देने की परंपरा बन गई है। नेता के उम्रदराज होने पर भी यही कुप्रथा अपनाई जाती है। इस विवश्ाता से ऐसा भी लगता है कि हमारे राजनीतिक दल, कार्यकताओं की उदीयमान पीढ़ी को आगे बढ़ाने का काम नहीं कर रहे हैं। राजनीतिक संस्कृति कालांतार में इस दोष से मुक्त नहीं हुई तो थोपे गए प्रतिनिधि कार्यकताओं को राजनीतिक संस्कार व सरोकारों से नहीं जोड़ पाएंगे। दागियों, वंशवादियों अयोग्य नेताओं को नकारे जाने की इच्छाशक्ति जताए बिना राजनीतिक सुधार होने वाले नहीं हैं। सोनिया गांधी ने अपने पुत्र राहुल को स्थापित करने की मंशा से कांग्रेस को ही ध्वस्त कर दिया है। जाहिर है, लोक पर राजनेता की मंशा असर डालती है। दरअसल, हमारे राजनेता और तथाकथित बुद्धिजीवी बड़ी सहजता से कह देते हैं कि दागी, धनी और बाहुवालियों को यदि दल उम्मीदवार बनाते हैं तो किसे जिताना है, यह तय स्थानीय मतदाता करे। बदलाव उसी के हाथ में है। वह योग्य प्रत्याशी का साथ दे और शिक्षित व स्वच्छ छवि के प्रतिनिधि का चयन करे, लेकिन ऐसी स्थिति में अक्सर मजबूत विकल्प का अभाव होता है।

हमारी कानूनी व्यवस्था में विरोधाभासी कानूनी प्रावधानों के चलते सजायाफ्ता मुजरिमों को आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध की मांग उठती रही है। लेकिन सार्थक परिणाम अब तक नहीं निकल पाए हैं। यही वजह है कि हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था पर अपराधी प्रवृत्ति के राजनीतिक प्रभावी होते चले जा रहे हैं। इसका एक प्रमुख कारण न्यायायिक प्रकिया में सुस्ती और टालने की प्रवृत्ति भी है। नतीजतन मामले लंबे समय तक लटके रहते हैं और नेताओं को पूरी राजनीतिक पारी खेलने का अवसर मिल जाता है। इसलिए त्वरित न्यायालय कारगर नतीजे नहीं दे पाई। त्वरित न्यायलयों की तरह ही उपभोक्ता, किशोर और परिवार न्यायालयों का गठन इसी उद्देश्य से किया गया था कि इन प्रकृतियों के मामले, इन विशेष अदालतों में तेज गति से निपटेंगे, लेकिन इनकी सार्थकता पूर्ण रूप में सिद्ध नहीं हो पाई है। वकीलों द्वारा सुनवाई टालने की मंशा ने इन अदालतों के गठन का मकसद लगभग खत्म कर दिया है।

हमारे यहां पुलिस हो या सीबीआई जैसी शीर्ष जांच ऐजेंसी, इनकी भूमिकाएं निर्लिप्त नहीं होती हैं। अकसर इनका झुकाव सत्ता के पक्ष में देखा जाता है, इसीलिए देश में यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बनी हुई है कि अपराध भी व्यक्ति की हैसियत के मुताबिक पंजीबद्ध किए जाते हैं और उसी अंदाज में जांच प्रकिया आगे बढ़ती है। इसी लचर मानसिकता का परिणाम है कि राजनीति में अपराधियों की संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है। इसी कारण राजनीति में अपराधीकरण को बल मिला है।

विडंबना यह भी है कि जनप्रतिनिधियों को तो सब सुधारना चाहते हैं, लेकिन उन अधिकारियों को सुधारने से बचते हैं, जो राजनीति में अपराधीकरण को प्रोत्साहित करते हुए भ्रष्ट आचरण से जुड़े हैं। लोकायुक्त पुलिस द्वारा रंगे हाथों पकड़े जाने के बावजूद राज्य सरकारें इन पर मामला चलाने की मंजूरी देने की बजाय, बचाने का काम करती हैं। लिहाजा उन भ्रष्ट और स्त्रीजन्य अपराधों से जुड़े लोक सेवकों को भी दागी नेताओं की श्रेणी में लाने की जरूरत है। दागी माननीयों की वजह से ही नेक ईमानदार लोग राजनीति में हाशिए पर हैं और उच्च पदों पर बैठने वाले लोग भी कदाचरण करने को विवश हो जाते हैं। साफ है, विधायिका के साथ कार्यपालिका में भी शुद्धिकरण की जरूरत है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Next Story