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भारत-फ्रांस संबंधों को मिला नया आयाम

किसान को तो सबके आगे हाथ बांधे मरते- मरते भी रहना है।

भारत-फ्रांस संबंधों को मिला नया आयाम
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सुबह-सुबह अपने को फिट रखने के गैर इरादतन इरादे से कनाट प्लेस की मार्किट के चक्कर लगा रहा था कि सामने रिक्शा लिए होरी आता दिखा तो पांव ठिठक गए। होरी ने कंबल की बुक्कल मारी हुई थी और फटी हुई चप्पलों से रिक्शा के पैडल दौड़ा रहा था। मेरे पास आते ही उसने रिक्शा को ब्रेक मारी तो रिक्शा ने ऐसी चूं की आवाज की जैसे केंद्र की सहायता न मिलने पर किसी राज्य की सरकार से आती है।

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‘और होरी कैसे हो? सुबह-सुबह रिक्शा पर मॉर्निंग वॉक करने निकले हो! गुड! अच्छा लगा तुम्हें देख कर कि अब तुम भी अपनी सेहत के बारे में सोचने लगे हो, वैसे यह बात तुम्हें बहुत पहले जान लेनी चाहिए थी’ मैंने बाबा राम देव का अनुसरण करते लंबी लंबी सांसें लेते कहा तो होरी ने खासंते हुए पूछा, ‘हुजूर! ई भूमि अधिग्रहण बिल कब तक पास हो जाएगा? अब और इंतजार नहीं होता,’ कमाल का बंदा है यार ये होरी भी! विपक्ष मर गया भूमि अधिग्रहण बिल के पास न होने के लिए खून-पसीना एक करते और...। ‘गांव से तबाह फसल के मुवावजे के लिए सरकार से कोई गया कि नहीं?’ ‘कौन जाएगा हमारी विथा को जानने गांव सरकार! अपने भाई आत्महत्या पर आत्महत्या किए जा रहे हैं और ऊ सरकार के बंदे कहते हैं कि किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की, सब अपनी मौत मरे हैं, ताड़ी पीकर मरे हैं। अबके भी कुछ फसल जानवरों ने खत्म कर दी थी और जो अब उनसे बची थी वह ऊपरवाले ने तबाह कर दी। अब तो साहब! भूमि अधिग्रहण बिल पास हो ही जाना चाहिए। ऊंट के मुंह में जीरा अब और नहीं। रोज-रोज के इस मरने से तो छुट्टी हो जाए। कम्बख्त न रहे ये खेत और न करनी पड़े आत्महत्या!’ कह उसने गोदान लिख स्वर्ग में जमी पे्रमचंद की आत्मा को नमन किया। ‘पर उससे तो...।’

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‘वैसे भी साहब का रखा है किसानी में? दिन रात मिट्टी के साथ मिट्टी बनो आखिर में हाथ आता क्या है? यहां तो किसान सबका नरम चारा है। पटवारी का नजराना और दस्तूरी न दें तो गांव में रहना मुश्किल। जमींदार के चपरासी और उसके कारिंदों का पेट न भरें तो निबाह न हो। गांव में आजकल तो एक न एक हाकिम रोज बढ़ते जाते हैं। कोई डॉक्टर कुत्तों के इलाज के लिए आता है तो कोई बंदरों की नसबंदी के लिए। उधर बच्चों के स्कूल में इम्तहान लेने वाला इंसपिटर है, कच्ची पगडंडी में रेत बिछाने वाला पीडब्ल्डी का सुपरवाइजर है, सच कहें साहब, हम तो इन साहबों से अब तंग आ गए हैं।

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नहर का साहब अलग, जंगल न होने के बाद भी जंगल का साहब अलग, ताड़ी-शराब का साहब अलग, गांव-बुखार का साहब अलग, खेती न होने के बाद भी खेती का साहब अलग! कभी कानूनगो आते हैं तो कभी तहसीलदार! कभी डिप्टी, कभी जण्ट, कभी कलक्टर तो कभी कमिश्नर। अब और कहां तक गिनाऊं साहब? गिनाते- गिनाते रात हो जाए। अब तो ऊपर से मैनेजर अलग आ गए हैं। पहले उधार देते हैं फिर डराने लगते हैं।

किसान को तो सबके आगे हाथ बांधे मरते- मरते भी रहना है। इनके लिए रसद-चारे, अंडे- मुर्गी, दूध-घी, दारू- बकरे का इंतजाम अब और कहां से करें सरकार? का महाजन से अब इनकी खातिरदारी को भी सूद पर पैसा लें का? अब तो बस भूमि अधिग्रहण बिल पास हो जाए तो इस स्यापे से मुक्ति मिले सरकार,’ उसने उदास हो कहा और रिक्शा को मरे पांवों से पैडल मारता आगे हो लिया। मैंने उसके उदास होने को गभ्भीरता से इसलिए नहीं लिया कि इस देश के होरी को मैंने आजतक उदास-हताश होते ही देखा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फ्रांस में जिस तरह की सफलता हासिल हुई है उसे देखते हुए इस बात की उम्मीद बढ़ गई है कि उनकी जर्मनी और कनाडा की यात्रा भी सफलता के नए मानदंड स्थापित करेंगी। नरेंद्र मोदी फ्रांस के बाद रविवार को जर्मनी पहुंच गए, वहां से वे कनाडा जाएंगे। प्रधानमंत्री के रूप में उनकी यह अब तक की सबसे लंबी यात्रा है। उनकी फ्रांस यात्रा दोनों देशों के संबंधों को नया आयाम दे गया। दोनों देशों के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सत्रह समझौते हुए हैं। यह बताने के लिए काफी हैकि भारत और फ्रांस की दोस्ती समय के साथ कितनी मजबूत हो गई है।

जैतपुर में परमाणु रिएक्टर परियोजना, स्मार्ट सिटी व हाईस्पीड ट्रेनों को चलाने में सहयोग के करार अपने स्थान पर महत्वपूर्ण तो हैं ही, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा का इससे भी कहीं ज्यादा महत्व राफेल लड़ाकू विमान खरीदने का फैसला और एयरबस सहित वहां की कई कंपनियों का मोदी सरकार के महत्वाकांक्षी मेक इन इंडिया अभियान में सहयोग देने के लिए हामी भरना है। फ्रांस यूरोप के शक्तिशाली देशों में गिना जाता है।

वहां की सरकार व विभिन्न समुदायों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिस तरह हाथों हाथ लिया गया और फ्रांस की मीडिया ने उन्हें प्रमुखता प्रदान की उससे कहा जा सकता है कि दुनिया में उनके नेतृत्व में भारत का कद बढ़ रहा है। फ्रांस की कंपनी दासौ से लड़ाकू विमान राफेल खरीदने का फैसला लंबे समय से लंबित था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीधे फ्रांस सरकार से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदकर भारतीय वायुसेना को और मजबूती देने का काम किया है।

रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर की मानें तो वायुसेना के लिए यह सौदा आॅक्सीजन का काम करेगा। माना जा रहा है कि भारत को दो साल के अंदर तैयार हालत में ये विमान हासिल हो जाएंगे। हालांकि कांग्रेस सहित कुछ लोग इस फैसले पर बेवजह सवाल उठा रहे हैं। उन लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भारत ने पिछले 17 साल से एक भी लड़ाकू विमान नहीं खरीदे हैं, जिसकी वजह से वायुसेना को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। वायुसेना के पास रूस निर्मित मिग-21 और मिग-27 पिछली पीढ़ी के विमान हैं। जाहिर है, इसके लड़ाकू बेड़े में शामिल तमाम विमान पुराने पड़ चुके हैं।

वहीं चीन और पाकिस्तान की चुनौतियों को देखते हुए भारतीय वायुसेना के पास विमानों की कमी है। इन स्थितियों में वायुसेना को नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों की सख्त दरकार है। भारत जैसे देश के लिए रक्षा जरूरतों को पूरा करने में इतनी देरी नहीं होनी चाहिए। ऐसा कोईतंत्र बनाने की जरूरत है जिससे रक्षा खरीद प्रक्रिया समय पर पूरी हो सके। अब दासौ भारत में राफेल निर्माण की संभावना भी खोजेगी। जाहिर है, इससे मेक इन इंडिया अभियान को भी बल मिल सकता है।

विमान कंपनी एयरबस ने तो यहां तक कह दी हैकि वह भारत में ही भारत और दुनिया के लिए विमान निर्माण करेगी। इसके लिए कंपनी अगले पांच साल में अरबों डॉलर निवेश करेगी। कुछ अन्य फ्रांसीसी कंपनियां भी मेक इन इंडिया अभियान में शामिल होने जा रही हैं। अब फ्रांस के साथ हुए इन सारे समझौतों को जमीन पर उतारने की तेज पहल शुरू कर देनी चाहिए।

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