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राजनीति के गलियारों में हम सब एक ''कार्ड'' जैसे

हम ऐसे भोले भाले हैं कि उनकी बीन पर भरपूर मनोरंजन करते हुए नाचते रहते हैं झूम झूम के। हमारी आस्थाओं और भावुकताओं को भुना कर वे हमें मंदिर-मस्जिद के खेल मैदानों में उतार देते हैं । फिर हमारा घुटना छिले या सीना छलनी हो किसी कोच को कोई फिक्र नहीं।

राजनीति के गलियारों में हम सब एक

पहले वे एक अच्छे इंसान थे। सबसे हंसते थे, बोलते थे। सबके रंजो गम में शरीक होते थे। लेकिन पिछले कुछ दिनों से उनमें अचानक परिवर्तन दिखने लगे। वे बात-बात पर उत्तेजित हो जाते, बांहे चढ़ा लेते। एक खास तरह का चश्मा लगाकर चीजों के देखने लगे। पता ही नहीं चला कि कब वो एक कार्ड में तब्दील हो गए। यूं देखें तो हम सब एक जीते जागते कार्ड में ही बदलते जा रहे हैं।

देश के रहनुमा हमें आवश्यकतानुसार उपयोग में ले लेते हैं और फिर उपेक्षा के ड्रावर में पटक देते हैं पांच सालों के लिए। हम से तो अच्छे प्लास्टिक कार्ड हैं जो ज्यादा दोहन करने पर टें बोल देते हैं लेकिन एक हम हैं जो अपने शोषण और गलत इस्तेमाल के विरूद्ध कभी उफ तक नहीं कर पाते। सुविधाओं के अस्तबल में बंधकर सुस्ताना ही हमारी नियति रह गयी है।

कभी हमें सांप्रदायिक कार्ड की तरह उपयोग में लिया जाता है तो और हम परस्पर जहर उगलने का काम करते हैं तो कभी अल्पसंख्यक या दलित कार्ड समझ कर हमारा तुष्टीकरण किया जाता है। हम ऐसे भोले भाले हैं कि उनकी बीन पर भरपूर मनोरंजन करते हुए नाचते रहते हैं झूम झूम के। हमारी आस्थाओं और भावुकताओं को भुना कर वे हमें मंदिर-मस्जिद के खेल मैदानों में उतार देते हैं।

फिर हमारा घुटना छिले या सीना छलनी हो किसी कोच को कोई फिक्र नहीं। इन्हीं कार्डो में से कोई कार्ड ट्रम्प कार्ड बन जाता है कभी-कभी। जिसको कालातीत होते ही दूध में मक्खी की तरह निकाल फेंक दिया जाता है। कालांतर में यही कार्ड या तो असंतुष्टों का अगुआ बन जाता है या खिसिया कर पार्टी छोड़ देता है। कार्डों की बेबसी यही है कि वे स्वयं अपने विवेक से कोई निर्णय नहीं ले सकते।

कल मुझे मोहल्ले के युवा क्रांतिकारी नेता जुझारू जी मिल गए। मैंने आवाज दी तो बस इतना कह कर चलते बने कि जल्दी में हैं, चुनावी दिन हैं उनको फलां ने बुलाया है। मैं समझ गया ये न रूकेंगे क्योंकि फिलहाल वो एक पहचान कार्ड में तब्दील होने जा रहे थे। हमारी कहानी एक कार्ड से शुरू हो दूसरे कार्ड पर खत्म होने की कहानी है।

कुछ लोग हमें सिम कार्ड की तरह अपने स्वार्थों के सेट में डालते हैं और काम निकल जाने के बाद तोड़कर फेंक देते हैं। इधर कुछ मनुष्य रूपी कार्डों पर स्क्रेच भी आ जाते हैं झूठ, बेईमानी और दुराचार के, लेकिन फिर भी वो अपने को चलन में बनाए रखते हैं। समय उनके नकाब उतरने का इंतजार करता रहता है।

एक दिन उनका प्लास्टिक और मैग्नेट चिप घिस जाता है और अंततः वे चलन से बाहर हो जाते हैं। बाजार आपको तरह तरह से फेंट कर, मोहकर अपने हितों में चलाना चाहता है तो बादशाह आपको एक जोकर की तरह इस्तेमाल करना चाहता है। कब आप पपलू से घपलू में बदल जाते हैं आपको इसका अहसास तक नहीं हो पाता।

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