Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

भारतीय बैंकिंग, टैक्स और वित्तीय प्रणाली में इतना गड़बड़झाला क्यों है?

पीएनबी के नीरव मोदी और मेहुल चौकसी और कानपुर के रोटोमैक मामले की जांच चल ही रही थी कि आयकर विभाग ने 3200 करोड़ रुपये का टीडीएस घोटाला का पर्दाफाश किया है। 447 कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के टीडीएस हड़प लिए।

भारतीय बैंकिंग, टैक्स और वित्तीय प्रणाली में इतना गड़बड़झाला क्यों है?

लगता है हमारा वित्तीय तंत्र छिद्रों से भरा हुआ है, जिसमें धोखा, फरेब की पूरी गुंजाइश है। इसमें भ्रष्ट लोगों के लिए गड़बड़ी करना बहुत कठिन नहीं है। वित्तीय तंत्र को नियंत्रित करने वाले सरकारी विभागों में भ्रष्ट कारोबारियों की इतनी मजबूत घुसपैठ है कि उनके लिए सरकार को नुकसान पहुंचाना आसान है। पंजाब नेशनल बैंक की 11 हजार करोड़ रुपये से अधिक की धांधली सामने आने के बाद लगातार वित्तीय क्षेत्र के घोटाले के सामने आने से साबित हो रहे हैं कि हमारे वित्तीय सिस्टम में पारदर्शिता का घोर अभाव है।

पीएनबी के नीरव मोदी और मेहुल चौकसी और कानपुर के रोटोमैक मामले की जांच चल ही रही थी कि आयकर विभाग ने 3200 करोड़ रुपये का टीडीएस घोटाला का पर्दाफाश किया है। 447 कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के टीडीएस हड़प लिए। इन कंपनियों ने अपने कर्मचारियों से तो टैक्स काट लिया, लेकिन उसे सरकार के पास जमा नहीं करवाया। इन कंपनियों ने कर्मचारियों के काटे गए टीडीएस को अपने बिजनस में ही निवेश कर दिया।

टीडीएस का नियम यह है कि कर्मचारियों के वेतन से कटने वाले टीडीएस को नियोक्ता कंपनी को एक सप्ताह के भीतर सरकार के खाते में जमा कर देन चाहिए। तीन महीने में भी जमा करने का नियम है। पर इसकी अनुमति होनी चाहिए। कर्मियों के टीडीएस काटकर सरकारी खाते में जमा नहीं करना आईटी एक्ट के सेक्शन 276बी का उल्लंघन है। इसके दोषियों को बहुत ही मामूली सजा (तीन माह से सात साल तक की कैद या जुर्माना या दोनों) का प्रावधान है।

जबकि वित्तीय अपराधों के लिए कठोर सजा का प्रावधान हहोना चाहिए। यूं तो टीडीएस मामले में आयकर विभाग आईपीसी की धाराओं के तहत धोखाधड़ी और आपराधिक मामले भी दर्ज कर रहा है, लेकिन बड़ा सवाल है कि हमारी बैंकिंग, टैक्स और वित्तीय प्रणाली में इतना गड़बड़झाला क्यों है? आजादी के बाद करीब 28 साल तक लगातार कांग्रेस की सरकार रही। वह दौर देश में हर क्षेत्र में व्यवस्था निर्माण का था।

उस वक्त हुए घोटालों से भी सरकार ने सबक नहीं लिया। बेहतर सिस्टम का निर्माण नहीं किया। 1991 में जब देश में आर्थिक उदारीकरण लागू किया गया, तब भी कांग्रेस की सरकार थी। उस समय के पीएम पीवी नरसिम्हाराव सरकार में वित्त मंत्री रहे अर्थशास्त्री डा़ मनमोहन सिंह ने देश में उदारीकरण की नींव रखी थी। उस वक्त भी आर्थिक उदारीकरण के साथ टैक्स व वित्तीय तंत्र को पारदर्शी बनाने का काम नहीं किया गया।

बाद में दस साल तक डा़ मनमोहन सिंह खुद देश के प्रधानमंत्री रहे। इस तरह देखा जाय तो देश के टैक्स, वित्तीय व बैंकिंग तंत्र व कंपनी जगत में सुधार लाने व उसे पारदर्शी बनाने का कांग्रेस के पास पूरा मौका था। आज जिस तरह के वित्तीय घोटाले सामने आ रहे हैं, वे सभी सिस्टम की कमियों से जुड़े हैं। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक तरह से कांग्र्रेस पर सुधार नहीं करने का आरोप ठीक ही लगाया है।

उन्होंने कहा कि सिस्टम में सुधार लाने में कांग्रेस की दिलचस्पी नहीं थी। अब तो सरकार को समूचे वित्तीय व बैंकिंग तंत्र की सफाई करनी चाहिए। कंपनियों के संचालन को भी पारदर्शी बनाए जाने की आवयकता है। सरकार को सरकार के साथ कॉरपोरेट जगत के लेनदेन, बैंकिंग, टैक्स व वित्तीय क्षेत्र की गतिविधियां आदि सभी की व्यापक जांच करवानी चाहिए और इसे पारदर्शी व चुस्त बनाने की दिशा में तत्काल काम करना चाहिए। इस तरह के घोटालों से अर्थव्यवस्था की गति व साख को नुकसान पहुंचता है।

Next Story
Top