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डोकलाम विवाद: युद्ध नहीं चाहेगा चीन, दोनों देश का होगा नुकसान

वर्ष 1949 से विगत 68 वर्षों का इतिहास निरुपित करता है कि चीन एक विकट विस्तारवादी देश रहा है।

डोकलाम विवाद: युद्ध नहीं चाहेगा चीन, दोनों देश का होगा नुकसान

भारत और चीन के मध्य सिक्किम और भूटान के डोकलाम इलाके में सैन्य तनाव के जारी रहते जर्मनी के हैम्बर्ग नगर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनफिंग के मध्य जी-20 सम्मेलन में सौहार्दपूर्ण वातावरण में मुलाकात आखिरकार कौन सा कूटनीतिक संकेत प्रदान कर रही है।

हालांकि हैम्बर्ग सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन का मुद्दा से सबसे विशिष्ट बना रहा, जहां एक तरफ अमेरिका अपने राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप के नेतृत्व में विश्व की अगुवाई करने के विराट किरदार से कदम पीछे खींचकर अपने में राष्ट्रीय खोल में सिमट जाने की संरक्षणवादी फितरत प्रदर्शित कर रहा है,

वहीं दूसरी तरफ चीन दुनिया के पटल पर एक आर्थिक महाशक्ति बन जाने का स्वपन दिलो-दिमाग में संजोए हुए है और वैश्विक प्रश्नों को सुलझाने के लिए आगे बढ़कर दुनिया की कयादत करने का प्रबल महत्वाकांक्षा रखता है।

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यक्ष प्रश्न है कि ऐसे वैश्विक वातावरण में सरहद पर तनावपूर्ण विवाद के चलते हुए चीन वस्तुतः भारत के विरुद्ध एक सैन्य आक्रमण करने के लिए क्या वास्तव में तत्पर हो सकता है अथवा चीनी हुकूमत दो महान राष्ट्रों के मध्य विद्यमान वर्तमान विवाद को कूटनीतिक वार्ता के माध्यम से सुलझाने की पहल अंजाम करेगी।

वर्ष 1949 से विगत 68 वर्षों का इतिहास निरुपित करता है कि चीन अपनी राष्ट्रीय फितरत में वस्तुतः एक विकट विस्तारवादी देश रहा है। शक्तिशाली चीन ने अपने कमजोर पड़ोसी देशों को सैन्य धौंस-धमकी देकर उनकी जमीन हड़प लेने की फितरत का सदैव परिचय दिया है।

लाओस, कंबोडिया, म्यांमार, वियतनाम, भूटान और भारत आदि अनेक पड़ोसी देशों के साथ चीन की साम्यवादी हुकूमत का व्यवहार अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कदापि न्यायपूर्ण नहीं रहा।

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साम्यवादी सिद्धांत की कूटनीतिक शुद्धता से प्रभावित और पूर्व सोवियत संघ से हासिल प्रमाणिक अनुभवों से ओतप्रोत पं. जवाहरलाल नेहरू ने चीन के साम्यवादी नेतृत्व पर गहन विश्वास किया था, किंतु उत्तर में पं. नेहरू को चीन से क्या मिला, केवल दगा और धोखा।

वर्ष 1962 की जंग में चीन द्वारा सैन्य पराजय से अपमानित भारत ने गंभीर सबक सीखा और अपनी सैन्य शक्ति को निरंतर गति से आगे बढ़ाया है। 1962 की शिकस्त के पश्चात 1967 में नाथूला दर्रे पर सैन्य मुठभेड़ में और 1987 में सुंदरम्ा क्षेत्र में भारत ने भी अपनी सैन्य शक्ति के बलबूते पर दो बार चीन की लाल फौज को गंभीर सबक सिखाया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक ही फरमाया है कि वर्ष 1987 के पश्चात विगत 30 वर्षों में भारत-चीन सरहद पर एक भी गोली नहीं दागी गई है। वर्ष 1979 में चीन की साम्यवादी हुकूमत ने अपने से कमजोर समझकर साम्यवादी वियतनाम को सबक सिखाने के लिए सैन्य आक्रमण किया था और फिर सारी दुनिया ने आश्चर्यचकित होकर देखा कि चीन की लाल फौज को वियतनाम द्वारा करारी शिकस्त झेलनी पड़ी।

साल 2017 में आधुनिकतम मिसाइलों तथा परमाणु और हाइड्रोजन बमों से लैस भारतीय फौज की सैन्यशक्ति को चीन सरकार बखूबी जानती है। सीमा विवाद पर भारत पर सैन्य आक्रमण अंजाम देकर चीन वस्तुतः दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बन जाने की अपनी प्रबल महत्वाकांक्षा को कदापि तहस नहस नहीं करेगा।

भारत सरकार चीनी लाल फौज की धमकी से किंचित मात्र भी खौफ नहीं खाएगी। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का अखबार पीपुल्स डेली और चीनी हुकुमत का मुख्ापत्र ग्लोब्ल टाइम्स भारत के विरुद्ध कितना भी विषाक्त प्रलाप क्यों न करता रहे,

हकीकत में भारत पर सैन्य आक्रमण करने का निर्णय तो चीनी हुकूमत का करना होगा और यह फैसला चीनी अखबारों के संपादकों को कदापि नहीं करना है, जो कि भारतीय फौज को विवादित इलाके से खदेड़कर बाहर कर देने की गीदड़ भभकियां दे रहे हैं।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हुकूमत आर्थिक विकास के इस दौर में जबकि अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियों ने चीन को आर्थिक तौर पर और अधिक शक्तिशाली बन जाने स्वर्णिम का अवसर प्रदान किया है तो फिर अपनी बराबर की टक्कर के मुल्क भारत के साथ चीनी हुकूमत विनाशकारी जंग में कदापि नहीं उलझेगी।

दरअसल चीन की वर्तमान बौखलाहट की वास्तविक वजह है कि भारत को कूटनीतिक तौर पर अमेरिका के अत्यंत निकट हो जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ है। अमेरिका और भारत ने संयुक्त तौर पर ऐलान किया कि वे मिलकर हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की नाजायज हरकतों को रोकने के लिए उस पर दबाब स्थापित करेगे।

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विगत कुछ वर्षों से चीन की फितरत बन चुकी है कि जब कभी कोई चीन की हरकतों के खिलाफ आवाज बुलंद करने का हौसला दिखाए तो चीन यह मापने-तोलने के लिए अपनी हरकतों को और तेज कर देता है कि कोई किस तरह से उसका सामना करने के लिए तत्पर है।

पाकिस्तान से अमेरिका की सैन्य और कूटनीतिक दूरियां निरंतर बढ़ रही हैं। पाकिस्तान की सरजमीं पर अमेरिका का स्थान अब शनैः शनैः चीन ले रहा है। इसका सबसे विशिष्ट और ज्वलंत उदाहरण चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) का निर्माण कार्य है।

चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) नामक यह गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर इलाके से गुजर रहा है, जो कि वास्तव में भारत का इलाका है। चीन की वर्तमान नाराजगी और क्षोभ का एक कारण रहा कि मई माह में बीजिंग में आयोजित वन बेल्ट वन रोड परियोजना के मेगा कार्यक्रम में भारत ने शिरकत अंजाम नहीं दी।

स्पष्ट है कि चीनी हुकूमत को परियोजना के मेगा कार्यक्रम का भारत द्वारा अंजाम दिया गया बायकॉट बेहद नागवार गुजरा। भारत को भविष्य में पाकिस्तान के नए आका चीन की कुटिल साजिशों से निपटना पड़ेगा। विश्व के पटल पर अत्यंत संतुलित कूटनीति ही भारत का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।

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