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प्रो. नीलम महाजन सिंह का लेख : अब अग्रिम भूमिका में भारत

ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय की 96 वर्ष की उम्र में मृत्यु हो गई। उनके अंतिम संस्कार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भारत की ओर से शिष्टाचार के नाते शिरकत कर रही हैं। ब्रिटिश शासन की शोषणकारी प्रकृति के कारण भारत के उद्योग प्रभावित हुए। अंग्रेजों के बुनियादी औपनिवेशिक चरित्र और भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय जनता पर इसके प्रभाव ने देश में राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन को जन्म दिया। आज भारत की आज़ादी के 76वें वर्ष में हमें अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान पर गर्व करना चाहिए और उपनिवेशी व गुलामी की किसी भी सोच से बाहर निकलना चाहिए। हम भारत के लोग सम्प्रभुता वादी मुल्क के वासी हैं।

प्रो. नीलम महाजन सिंह का लेख : अब अग्रिम भूमिका में भारत
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ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय की 96 वर्ष की उम्र में मृत्यु हुई तथा आज, 19 सितंबर को उनका अंतिम संस्कार है। इसमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भारत की ओर से शिष्टाचार के नाते शिरकत कर रही हैं। एक समय था जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सूर्यास्त विश्वभर में नहीं होता था। आज वो स्थिति नहीं है। विश्व में गिने-चुने देश में राजशाही है। अधिकांश देशों में लोकतंत्र है। भारत में भी मज़बूत लोकतंत्र है, लेकिन इसके लिए हमें दो सौ साल की अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने के लिए भारी कीमत चुकानी पड़ी है। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की प्रतीक महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय के अंतिम संस्कार में भारत की ओर से राष्ट्रपति जैसे शीर्ष पदासीन व्यक्ति को शिरकत करनी चाहिए? अंतरराष्ट्रीय डिप्लोमेटिक शिष्टाचार निभाने के लिए यह मात्र प्रतीक ही है। ब्रिटिश महारानी की मौत पर भारत का आंसू बहाना क्या हमारी उपनिवेशिक की मानसिकता का परिचायक नहीं है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी इसी वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर पंच प्रणों में गुलामी की मानसिकता को त्त्यागने की अपील की है। क्या यह हमारी कथनी व करनी में फर्क है? भारत को पता है कि उसका मशहूर कोहिनूर हीरा अभी भी ब्रिटिश राजशाही के पास है। इसे वापस देने के लिए ब्रिटेन की ओर से कभी भी चूं तक नहीं होता। 'ब्रिटिश राज' पर बहुत शोध कार्यहुआ है। इसमें कई बातें आंख खोलने वाली हैं।

भारत में भी 1757 में प्लासी के युद्धोपरांत ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिये ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत में प्रवेश कर लिया था। यूरोप में 'रेनेसां' तथा 'क्रांति' का आरंभ हो चुका था व ब्रिटानिया सरकार के विरोध में अधिकांश देश आज़ादी की लड़ाई की ओर तत्परता से आगे बढ़ रहे थे। ब्रिटानिया के शासनकाल में क्रूर व्यवहार तथा हर देश का अर्थिक शोषण किया जा रहा था। फ्रांसीसी क्रांतिवीर 'लाफायाते ने, 'लिबर्टी, इक्वैलिटी, फ्रैटरनिटी' का नारा दिया। भारत पर भी यूरोपीय क्रांति का प्रभाव पड़ने लगा। आरनल्ड टोयनबी ने 'इंडस्ट्रयल रिवोल्यूशन' का नारा दिया। ब्रिटेन ने अपने शासन के अधीन हर देश को गुलाम ही समझा तथा उसकी जनता पर अनेक ज़ुल्म ढाए। इसका नतीजा था 'औद्योगिक क्रांति'। सामरिक कारणों से, ब्रिटिश सरकार ने भारी, बुनियादी और पूंजीगत वस्तुओं को विकसित करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया-जो औद्योगिकीकरण का आधार था। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में, उसे पूरी तरह से साम्राज्यवादी दुनिया पर निर्भर होना पड़ा। कुछ वर्ष पहले डॉ. शशि थरूर ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटेन के शासकों की धज्जियां उड़ाईं। उनका ये भाषण दुनियाभर में वायरल हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शशि थरूर के इस भाषण की संसद में प्रशंसा की। जिस देश के शासकों ने भारत के स्वतंत्रता सेनानियों पर इतने ज़ुल्म किए हों, उसकी महारानी के लि‍ए क्या आंसू बहाने? क्या हम, कभी जनरल डायर के जलियांवाला बाग में जुल्म को भूल सकते हैंं? क्या भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की शहादत देश कभी भूल सकता है? यह भी तथ्य है कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से कच्चे कपास का निर्यात कर किसानों को लूटा था। साम्राज्यवादी शासकों द्वारा भारतीय पूंजी के माध्यम से औद्योगीकरण की आवश्यकता को नकार दिया गया था। यह भारत से पूंजी की निकासी की राशि थी। विदेशी पूंजी की बढ़ती भागीदारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश राज के बोलबाले को मज़बूत किया। इस विदेशी निवेश ने सबसे पहले कच्चे माल और खाद्य पदार्थों के उत्पादन और निर्यात पर विशेष ध्यान देकर भारत के 'निर्देशित अविकसितता' में योगदान दिया।

प्रोफेसर बिपन चंद्रा ('हिस्ट्री आफ मॉडर्न इंडिया') के शब्दों में, हम अपनी वर्तमान चर्चा को इस प्रकार समाप्त कर सकते हैं: "भारतीय औद्योगिक विकास में प्रमुख सुधार उन दौरों के दौरान हुए, जब विश्व पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के साथ भारत के औपनिवेशिक आर्थिक संबंध अस्थायी रूप से कमजोर या बाधित हो गए थे। दूसरी ओर, इन कड़ियों के मजबूत होने से पिछड़ापन और ठहराव आया।" ब्रिटेन ने अपनी नीतियों को इस तरह से लागू किया कि भारत कच्चे माल और खाद्य पदार्थों का निर्यातक बन गया। यह ईस्ट इंडिया कंपनी के दिनों के दौरान हुआ। इस स्थिति ने 1857 के बाद एक गंभीर मोड़ ले लिया। इन भुगतानों में होम चार्ज (सार्वजनिक ऋण पर ब्याज, नागरिक और सैन्य व्यय, निजी विदेशी पूंजी पर ब्याज और लाभ, विदेशी बैंकिंग का उपयोग करने के लिए सेवा शुल्क, और शिपिंग व्यवसाय आदि) शामिल थे। भारतीय सामाजिक समूहों और वर्गों पर, औपनिवेशिक आर्थिक और राजनीतिक वर्चस्व की संरचना पर अब तक की हमारी चर्चा ने साम्राज्यवाद और भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से के बीच कई संघर्षों की मेज़बानी की। एक ही समय में, बहुत से भारतीय लोगों को ब्रिटिश शासन की शोषणकारी और विनाशकारी भूमिका का एहसास हुआ, जो अक्सर औपनिवेशिक शोषण के लाभार्थियों और एजेंटों के माध्यम से किए जाते थे -- जमींदार, प्रधान, साहूकार, आदि। जैसा कि अनपढ़ किसानों, जमींदारों, साहूकारों, वकीलों, पुजारियों को भी राष्ट्रवादियों द्वारा स्पष्ट किया गया था। ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति से सबसे अधिक पीड़ित किसान थे। हस्तकला उद्योगों के विनाश और भूमि राजस्व में लगातार वृद्धि ने कई कारीगरों और खेती करने वालों को रोजगार से बाहर कर दिया। नतीजतन, उन्होंने साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष में बहुत सक्रिय भाग लिया। लेनिन ने एक बार टिप्पणी की थी, जहां वास्तविक राजनीति की शुरुआत होती है,वहां जनता होती है। प्रोफेसर ई.एच. कार के शब्दों में, संख्याएं इतिहास में गिनी जाती हैं।

19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध के दौरान आधुनिक कारखानों से एक नया वर्ग पैदा हुआ - औद्योगिक श्रमिक वर्ग। ब्रिटिश शासन के दौरान मज़दूर वर्गों की दयनीय स्थितियां, 1938 में जर्गेन कुक्ज़िनस्की द्वारा स्पष्ट रूप से सामने रखी गई थीं, "बिना कटे, जानवरों की तरह, बिना प्रकाश और हवा और पानी के, भारतीय औद्योगिक कामगार सबसे अधिक शोषित लोगों में से एक है। 1858 के बाद, देश ने पूंजीवादी वर्ग - पूंजीपति वर्ग का उदय देखा। औपनिवेशिक नीति ने भारतीय उद्योगों और पूंजीपति वर्ग को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया था। अंग्रेजों ने एक तरफा मुक्त व्यापार की नीति अपनाई।' ब्रिटिश शासन की शोषणकारी प्रकृति के कारण भारत के उद्योग प्रभावित हुए। अंग्रेजों के बुनियादी औपनिवेशिक चरित्र और भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय जनता पर इसके प्रभाव ने देश में राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन को जन्म दिया। आज भारत की आज़ादी के 76वें वर्ष में हमें अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान पर गर्व करना चाहिए और उपनिवेशी व गुलामी की किसी भी सोच से बाहर निकलना चाहिए। हम भारत के लोग सम्प्रभुता वादी मुल्क के वासी हैं।

(लेखक प्रो. नीलम महाजन सिंह वरिष्ठ टीवी पत्रकार, मानवाधिकार लोकोपकारक व राजनीतिक विश्लेषक हैं, इस लेख में उनके अपने विचार हैं।)

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