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डाॅ. एन.के. सोमानी का लेख : भारत-नेपाल रिश्ते मजबूत होंगे

साल 2020 में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में भारत-नेपाल संबंधों में उत्पन्न तनाव के दृष्टिगत देउबा के भारत दौरे को काफी अहम माना जा रहा है। दौरे की अहमियत की दो बड़ी वजह है। प्रथम, देउबा के भारत आने से ठीक पहले चीन के विदेश मंत्री वांग यी नेपाल के दौरे थे। इस दौरान चीन और नेपाल के बीच 9 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से कुछ समझौते ऐसे हैं जो नेपाल में भारत के प्रभाव को कम कर सकते हैं। चीन नेपाल में विकास परियोजनाओं में निवेश करने के लिए अपनी बेल्ट एंड रोड पहल पर भी जोर दे रहा है और दूसरा, देउबा की भारत यात्रा इसलिए भी अहम हो जाती है, क्योंकि पीएम नरेन्द्र मोदी ने स्वयं देउबा को आमंत्रित किया है।

डाॅ. एन.के. सोमानी का लेख : भारत-नेपाल रिश्ते मजबूत होंगे
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डाॅ. एन.के. सोमानी 

डाॅ. एन.के. सोमानी

नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा का भारत दौरा आज से शुरू हो रहा है। वे अगले तीन दिन यहां रहेंगे। इस दौरान वे हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलेंगे। वे भारत के कई दूसरे कई बड़े नेताओं से मिलेंगे। उनका पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी जाने का कार्यक्रम भी है। जुलाई 2021 में नेपाल के प्रधानमंत्री बनने के बाद देउबा पहली बार भारत आए हैं।

साल 2020 में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में भारत-नेपाल संबंधों में उत्पन्न तनाव के दृष्टिगत देउबा के भारत दौरे को काफी अहम माना जा रहा है। दौरे की अहमियत की दो बड़ी वजह है। प्रथम, देउबा के भारत आने से ठीक पहले चीन के विदेश मंत्री वांग यी नेपाल के दौरे थे। इस दौरान चीन और नेपाल के बीच 9 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें से कुछ समझौते ऐसे हैं जो नेपाल में भारत के प्रभाव को कम कर सकते हैं। चीन नेपाल में विकास परियोजनाओं में निवेश करने के लिए अपनी बेल्ट एंड रोड पहल पर भी जोर दे रहा है और दूसरा, देउबा की भारत यात्रा इसलिए भी अहम हो जाती है, क्योंकि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं देउबा को भारत भ्रमण के लिए आमंत्रित किया है।

नेपाल में कम्युनिस्ट सरकार आने के बाद भारत-नेपाल संबंधों पर संशय के जो बादल मंडरा रहे थे, वे और गहरे हो गए थे। नवंबर 2019 में भारत-नेपाल संबंधों में उस वक्त तनाव उत्पन्न हो गया था, जब पूर्व प्रधानमंत्री केपीशर्मा ओली ने कालापानी इलाके पर भारत को दो टूक कह दिया था कि भारत को इस क्षेत्र से अपनी सेना हटा लेनी चाहिए। नेपाल भारत को अपनी एक इंच जमीन नहीं देगा। साल 2014 में नरेंन्द्र मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान तत्कालीन पीएम सुशील कोइराला ने कालापानी का मुद्दा उठाया था और कालापानी पर नेपाल का अधिकार बताते हुए इसे हल करने की अपील की थी। इसी प्रकार साल 2020 में भारत-नेपाल रिश्ते उस वक्त काफी खराब हो गए थे, जब ओली ने कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे विवादित क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा बताने वाला नक्शा जारी किया था।

यह सभी इलाके भारत की सीमा में हैं और भारत शुरू से ही इस नक्शे का खारिज करता रहा है। सीमा संबंधी मुद्दे को उछालने के अलावा ओली ने अपने कार्यकाल के दौरान ऐसे कई बयान दिए जिससे भारत नेपाल संबंधों में तनाव उत्पन्न हुआ। बेसिर-पैर के बयान देने के लिए मशहूर ओली ने जुलाई 2020 में भगवान श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या पर प्रश्न उठाते हुए कहा था कि भारत ने सांस्कृतिक अतिक्रमण करने के लिए वहां फर्जी अयोध्या का निर्माण करवाया है, जबकि असली अयोध्या नेपाल के बीरगंज में है। मई 2020 में जब दुनिया कोरोना महामारी के संकट से गुजर रही थी उस वक्त भी ओली ने भारत के खिलाफ विवादित बयान दिया। ओली ने नेपाल में बढ़ रहे कोरोना मामलों के लिए भारत को जिम्मेदार ठहराया था। बेल्ट एंड रोड में चीन का सहयोगी होने और व्यापारिक हितों के कारण नेपाल का झुकाव भाारत से कहीं अधिक चीन की ओर है। 2019 में काठमांडू में हुए बिम्सटेक सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी ने बिम्सटेक सदस्य देशों के सामने सैन्य अभ्यास का प्रस्ताव रखा था। ऐने वक्त पर चीन के दबाव में नेपाल ने इस सैन्य अभ्यास में शामिल होने से इनकार कर दिया था, जबकि उससे कुछ समय पहले ही नेपाल ने चीन के साथ सैन्य अभ्यास किया था। भारत और नेपाल दोनों समान संस्कृति व मूल्यों वाले पड़ोसी होने के बावजूद आज तक संबंधों के एक निर्धारित दायरे से बाहर नहीं निकल पाए हैं।

अब, जुलाई 2021 में देउबा के रिकाॅर्ड पांचवी दफा नेपाल के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत-नेपाल संबंधों में बहाली की उम्मीद जगी हैं। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दौरान दोनों देशों के बीच विकास और आर्थिक साझेदारी, व्यापार, स्वास्थ्य क्षेत्र में सहयोग, बिजली, कनेक्टिविटी तथा आपसी हित से जुडे़ दूसरे अनेक मुद्दों पर बातचीत हो सकती है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी की नेपाल यात्रा के दौरान चीन व नेपाल के बीच रेल संपर्क जोड़ने को लेकर एक अहम समझौता हुआ है। चीन को कांउटर करने के लिए भारत नेपाल में नए कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट की घोषणा कर सकता है। इसके अलावा देउबा की इस यात्रा के दौरान भारत और नेपाल को जोड़ने वाले 35 किमी लंबे कुर्था (जनकपुर) तथा जयानगर (बिहार) रेलमार्ग के उद्धघाटन की संभवाना है। द्विपक्षीय वार्ता में भारत द्वारा रक्सौल-काठमांडू रेललाइन को लेकर भी कोई बड़ी घोषणा की जा सकती है। इसके अलावा द्विपक्षीय वार्ता के दौरान देउबा 1950 की भारत-नेपाल मैत्री संधि की समीक्षा का मुद्दा उठा सकते हैं। नेपाल काफी समय से संधि की समीक्षा की मांग कर रहा है। साल 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की पहली नेपाल यात्रा के दौरान संधि की समीक्षा करने की सहमति दोनों देशांे के बीच बनी थी। हालांकि उस वक्त इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई थी। साल 2015 में मधेशी आंदोलन के वजह से यह मामला ठंडा पड़ गया था।

भारत नेपाल में कई कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इनमें क्राॅस-बाॅर्डर रेलवे लिंक, विद्युतीकरण की परियोजना के अलावा सड़कों और पुलांे का निर्माण शामिल है। नेपाल इन प्रोजेक्ट की धीमी गति को लेकर भारत सरकार के सामने कई बार नाराजगी प्रकट कर चुका है। कयास इस बात के भी लगाए जा रहे हैं कि सीमा से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए दोनों देशों के बीच विदेश सचिव स्तर की वार्ता शुरू करने पर सहमति बन सकती हैं। इससे पहले देउबा और मोदी ने पिछले साल नवंबर में स्काॅटलैंड के ग्लासगो में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन से इतर मुलाकात कर भारत-नेपाल दोस्ती के कई पहलुओं पर बातचीत की थी। इस दौरान देउबा ने कोविड-19 महामारी के खिलाफ लड़ाई मेे नेपाल को जरूरी मेडिकल सप्लाई और वैक्सीन के लिए सहायता प्रदान करने पर प्रधानमंत्री मोदी का धन्यवाद किया था।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तिगत आग्रह को स्वीकार कर भारत आए नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की इस यात्रा के बाद भारत-नेपाल संबंध सहयोग, सामंजस्य और विश्वास की दिशा में आगे ही बढ़ेंगे। इस तथ्य से इसलिए भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि शेर बहादुर देउबा के भारत दौरे से ठीक पहले नई दिल्ली के साथ रिश्तों को साधने के लिए नेपाल ने देउबा के सबसे करीबी डाॅ. शंकर प्रसाद शर्मा जैसे कुशल और अनुभवी राजनयिक को भारत में नियुक्त किया है।

(लेखक विदेश मामलों के जानकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)

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