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चिंतन: आतंक के खिलाफ भारत को चौंकन्ना रहने की जरूरत

भारत को अपनी सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया नेटवर्क को और एक्टिव कर देना चाहिए।

चिंतन: आतंक के खिलाफ भारत को चौंकन्ना रहने की जरूरत

इधर पांच दिनों में चार आतंकी हमले। तुर्की की राजधानी इस्तांबुल और अफगानिस्तान की राजधानी काबुल को दहलाने के बाद आतंकियों ने बंग्लादेश की राजधानी ढाका में 20 विदेशियों को बंधक बनाकर हत्या कर दी। अगले ही दिन इराक की राजधानी बगदाद में आत्मघाती हमलावरों ने दो बम धमाके कर 83 बेकसूरों की जान ले ली।

इराक में भी हमला तब हुआ है, जब लोग रमजान की खरीदारी कर रहे थे। आतंकियों ने इन चार देशों के हमलों में करीब दो सौ निदरेष लोगों को मौत के घाट उतार दिए। आखिर यह हिंसा किस लिए? आतंकी संगठन कौन सा मकसद हासिल करना चाहता है और यह मकसद किन लोगों के लिए है?

इतिहास का सबसे क्रूर काल मध्ययुगीन दौर में भी इस तरह बेकसूरों को कोई नहीं मारता था। उस दौर में अधिकतर हिंसा राजपाट के लिए होती थी, जिनमें सैनिक लड़ते थे, आमजन को हिंसा का शिकार नहीं बनाया जाता था। लेकिन आधुनिक दौर में आतंकी संगठन जिस तरह बर्बर हिंसा कर रहे हैं, बेगुनाह आमजनों को मार रहे हैं, उससे लगता है कि आतंकी किसी मकसद के लिए नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि या तो खौफ का कारोबार कर रहे हैं या बस हताशा में मानव सभ्यता को आघात पहुंचा रहे हैं।

आज जितने भी आतंकी हमले हो रहे हैं, उनमें मारे या पकड़े जाने वाले आतंकी अल्लाह-हू-अकबर बोलते हुए पाए गए हैं। इससे पता लगता है कि वे कौम से इस्लाम को मानने वाले मुसलमान हैं। लेकिन इस्लाम हिंसा की इजाजत नहीं देता है। फिर ये कैसे मुसलमान हैं? खास बात यह है कि ये सभी हमले रमजान के मौके पर हुए हैं, जबकि इस्लाम में रमजान पाक महीना है, जिसमें लोग अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं।

फिर अगर ये आतंकी हिंसा कर रहे हैं, तो निश्चित ही वे इस्लामिक नहीं हैं। बांग्लादेश की पीएम शेख हसीना ने कहा भी कि ये लोग किस तरह के मुसलमान हैं, इनका कोई धर्म नहीं है। वे हत्या कर रमजान की तरावीह का उल्लंघन कर रहे हैं। अगर ऐसा है तो सभ्य मुसलमानों की ओर से आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक आवाज क्यों नहीं उठती है? क्यों मुस्लिम देशों में ही आतंकी गुटों के हेडक्वार्टर हैं? वहां की सरकारें क्या कर रही हैं? इन्हें हथियार कहां से मिल रहे हैं? इनका वित्त पोषण कौन कर रहा है?

ये तमाम सवाल मुस्लिमों के सामने खड़े हैं। आज वे ईसाई के बाद विश्व की दूसरी बड़ी आबादी है। लेकिन आतंकवाद के चलते मुस्लिमों की साख संकट में है। होना तो यह चाहिए कि जिन-जिन देशों या प्रांतों में आतंकी गुट सक्रिय हैं, वहां की सरकारों और आवामों को उनके खिलाफ हल्ला बोलना चाहिए। इसके साथ ही इस्लामिक स्टेट, अलकायदा, तालिबान, लश्करे तैयबा, अल शबाब, बोको हरम जैसे खतरनाक और ताकतवर आतंकी गुटों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर भी लड़ाई लड़ने की जरूरत है।

अंतराष्ट्रीय मंचों पर सभी देश आतंकवाद के खिलाफ बात भी करते हैं और संधि भी करते हैं, लेकिन विश्व स्तर पर अभी तक सामूहिक लड़ाई शुरू नहीं हुई है। सऊदी अरब ने 34 मुस्लिम देशों का समूह भी बनाया है, लेकिन यह समूह भी धरातल पर काम करता नहीं दिखाई दे रहा है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र इसमें भूमिका निभा सकता है और उसे निभाना भी चाहिए।

बांग्लादेश की सरकार ने जैसे कहा है कि प्रतिबंधित आतंकी गुट जेएमबी (जमीयतुल मुजाहिदीन बांग्लादेश) ने पाकिस्तान की खुफिया इकाई आईएसआई की शह पर बंधकों को मारा है, उसके बाद भारत को भी निगरानी बढ़ाने की जरूरत है। हैदराबाद मॉडयूल के खुलासे के बाद लगता है कि आईएस की नजर भी भारत पर है। पाक के आतंकी गुटों के निशाने पर भारत पहले से ही है। इसलिए भारत को अपनी सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया नेटवर्क को और एक्टिव कर देना चाहिए।

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