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चिंतन: मंगलयान के बाद जीपीएस सैटेलाइट बड़ी कामयाबी

यह नेविगेशन सैटेलाइट आकाश में भारत की लंबी उड़ान है।

चिंतन: मंगलयान के बाद जीपीएस सैटेलाइट बड़ी कामयाबी
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मंगलयान और कई संचार उपग्रहों के बाद आईआरएनएसएस-1 जी की लांचिंग के साथ ही भारत ने अंतरिक्ष में एक और बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है। भारत ने श्रीहरिकोटा स्थित स्पेस सेंटर से पीएसएलवी-सी33 के जरिये अपने स्वदेशी जीपीएस उपग्रह को केवल 20 मिनट में सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया। भारत अब दुनिया का पांचवां देश बन गया है जिसके पास खुद का अपना जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) सैटेलाइट है।

अमेरिका, यूरोपियन यूनियन, चीन और रूस के पास भी अपना नेविगेशन सिस्टम है। आईआरएनएसएस-1जी भारत का सातवां नेविगेशन सैटेलाइट है। इस सीरीज का यह अंतिम उपग्रह है। इससे पहले आईआरएनएस-1ए (जुलाई 2013), 1बी (अप्रैल 2014 ), 1सी (अक्टूबर 2014), 1डी (मार्च 2015), 1ई (जनवरी 2016) और छठा 1एफ (मार्च 2016) उपग्रह लॉन्च किए जा चुके हैं। आईआरएनएसएस का पूरा नाम इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो को बधाई देते हुए इस सैटेलाइट को नाविक नाम दिया है। पीएम ने नाविक नाम इस नए जीपीएस उपग्रह की सटीक लोकेशन बताने की खूबी के चलते मछुआरों को सर्मपित करते हुए दिया है। अब अमेरिका के जीपीएस पर हमारी निर्भरता खत्म हो जाएगी। इसके लिए भी अमेरिका ही कारण है। अब तक जीपीएस की जानकारी यूएस से लेते थे, लेकिन करगिल युद्ध के दौरान यूएस सरकार ने जीपीएस सूचना शेयर करने से इनकार कर दिया था।
जिस तरह अमेरिकी दबाव में रूस ने हमें क्रायोजेनिक ईंधन टेक्नोलॉजी देने से इनकार कर दिया था। उसके बाद भारतीय वैज्ञानिकों ने इसे चुनौती के तौर पर लिया था और हमने अपनी क्रायोजेनिक तकनीक बनाई। ठीक उसी तरह यूएस के इनकार के बाद हमने खुद अपनी किस्मत बनाई और आज अपना जीपीएस सैटेलाइट लांच किया है। यह हर भारतीय के लिए गौरव का पल है। यह मेक इन इंडिया की ओर एक बड़ा कदम है। इस जीपीएस सैटेलाइट से नेवी, कोस्टगार्डस, शिपिंग, रेलवे, कार में स्मार्टफोन से रास्ता खोजने, समंदर में मछुआरों, एअरक्राफ्टों की लैंडिंग और प्राकृतिक आपदा में राहत पहुंचाने में मदद मिलेगी।
इसकी जद में कश्मीर से कन्याकुमारी और कच्छ से कामरूप (असम) तक का क्षेत्र रहेगा। इसके अलावा यह भारतीय सीमा के चारों ओर करीब 1500 किमी के इलाके को कवर करेगा। इससे हमें सीमा पर दुश्मन के किसी भी गतिविधियों की सटीक जानकारी मिल जाएगी। अक्सर हमारे मछुआरे समंदर में गलती से दूसरे देशों की सीमा में चले जाते हैं, लेकिन इस नए सैटेलाइट से उन्हें सटीक लोकेशन की जानकारी दी जा सकेगी।
इससे सार्क देशों को भी मदद मिलेगी। ये सैटेलाइट लगातार डाटा भेजते हैं जिन्हें किसी स्मार्टफोन से भी पढ़ा जा सकता है। इसलिए यह आम लोगों के लिए भी फायदेमंद होगा। सबसे बड़ा फायदा यह है कि इस जीपीएस सैटेलाइट से हमारे सैनिकों को सीमा की सुरक्षा और चौकसी में काफी मदद मिलेगी। देश की इस उपलब्धि के लिए निस्संदेह हमारे वैज्ञानिक बधाई के पात्र हैं। मोदी के शब्दों में 1425 किलोग्राम वजन का यह नेविगेशन सैटेलाइट आकाश में भारत की लंबी उड़ान है।
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