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अर्जुन राम मेघवाल का लेख : अतुलनीय राष्ट्र निर्माता

डॉ. अम्बेडकर साम्यवादी श्रम आंदोलनों तथा साम्यवादियों की देश के बाहर की शक्तियों के प्रति वफादारी, उत्पादन के संसाधनों पर नियंत्रण के उनके मार्क्सवादी दृष्टिकोण का खुलकर विरोध करते थे। उनके निबंध 'भारत में लघु जोत और उनका समाधान'(1918) में भारत की कृषि समस्या के हल के लिए औद्योगीकरण का प्रस्ताव दिया जो आज भी प्रासंगिक है। संविधान में उन्होंने भारत में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत पर आधारित एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए अहम कदम उठाए।

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डाॅ. भीमराव अम्बेडकर  

अर्जुन राम मेघवाल

राष्ट्र डॉ. आंबेडकर की 130 वीं जयंती मना रहा है, जो एक ऐसे राष्ट्रवादी व्यक्तित्व थे जिनके विचारों में प्रत्येक नागरिक के लिए राष्ट्र-निर्माण के काम में लग जाने की अदम्य भावना और प्रेरणा थी। हालांकि, एक समाज सुधारक, संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष तथा देश के पहले कानून मंत्री के रूप में उन्हें प्राथमिक रूप से जाना जाता रहा है। इसके साथ ही उन्होंने एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री, सक्रिय राजनेता, प्रख्यात वकील, श्रमिक नेता, महान सांसद, प्रखर विद्वान, मानवविज्ञानी, ज्ञानवान प्रोफेसर और वक्ता के रूप में भी अपनी पहचान बनाई। अब जबकि राष्ट्र स्वतन्त्रता के 75 वर्ष पूरे होने पर अमृत महोत्सव मनाने जा रहा है तो यह अनिवार्य हो जाता है कि हम बहु प्रतिभाशाली डॉ. आंबेडकर के विचारों की गंभीरता को समझने के लिए उस पर संपूर्णता से विचार करें और राष्ट्र निर्माता के रूप में उनकी भूमिका तथा एक मजबूत राष्ट्र बनाने के लिए न्यायपूर्ण समाज के लिए किये गए उनके कामों को समझें।

डॉ. आंबेडकर ने संस्थान निर्माता के अग्रदूत के रूप में भी बड़ा काम किया लेकिन उसका जिक्र इतिहास के पन्नों में नहीं मिलता। हमारे देश की केंद्रीय बैंक, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया, की अवधारणा हिल्टन यंग आयोग की सिफारिश पर आधारित थी, जिसने डॉ. अंबेडकर की पुस्तक 'रुपये की समस्या- इसकी उत्पत्ति और समाधान' पर विचार किया था। वायसराय की कार्यकारी परिषद में एक लेबर सदस्य के रूप में उन्होंने 1942 से 1946 तक राष्ट्र हित में पानी, बिजली और श्रम कल्याण क्षेत्र में कई नीतियों को विकसित किया। यह उनकी ही दूरदर्शिता थी जिससे केंद्रीय जल आयोग, केंद्रीय जलमार्ग, सिंचाई और नेविगेशन आयोग, केंद्रीय तकनीकी पावर बोर्ड, की स्थापना में मदद हुई। साथ ही एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन के जरिये नदी घाटी प्राधिकरण की स्थापना हुई जिसने सक्रिय रूप से दामोदर नदी घाटी परियोजना, सोन नदी घाटी परियोजना, महानदी (हीराकुंड परियोजना), कोसी और चम्बल नदी के अलावा दक्कन क्षेत्र की नदियों के बारे में विचार किया। अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 और नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 भी उन्हीं की सुविचारित दृष्टि थी।

डॉ. अांबेडकर प्रत्येक मंच पर हर वर्ग के दबे हुए तबके की तर्कपूर्ण आवाज थे। गोलमेज सम्मेलन में इस तबके के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने मजदूरों और किसानों को क्रूर जमींदारों के चंगुल से छुड़ा कर उनके हालात सुधारने की पैरवी की। वर्ष 1937 में बॉम्बे विधानसभा के पूना अधिवेशन में उन्होंने कोंकण में भूमि कार्यकाल की खोती प्रणाली को समाप्त करने के लिए एक विधेयक पेश किया। बंबई में 1938 में हुए काउंसिल हॉल तक के ऐतिहासिक किसान मार्च ने उन्हें किसानों, मजदूरों और भूमिहीनों के नेता के रूप में लोकप्रिय बना दिया। कृषि किरायादारी उन्मूलन के लिए विधेयक पेश करने वाले वे देश के पहले जनप्रतिनिधि थे। उनके निबंध 'भारत में लघु जोत और उनका समाधान'(1918) में भारत की कृषि समस्या के हल के लिए औद्योगीकरण का प्रस्ताव दिया जो आज भी आर्थिक बहस में प्रासंगिक है।

बॉम्बे असेंबली के सदस्य के रूप में मजदूर की आवाज़ डॉ. अम्बेडकर ने कर्मचारियों के हड़ताल के अधिकार को छीन लेने वाले औद्योगिक विवाद विधेयक, 1937 को पेश किए जाने का जबर्दस्त विरोध किया। लेबर सदस्य के रूप में उन्होंने 'श्रम के जीवन की उचित स्थिति' की बजाय 'काम की उचित स्थिति' हासिल करने की वकालत की और सरकार की श्रम नीति का आधार बनाया। उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप ही प्रगतिशील श्रमिक कल्याण के उपाय सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाये गए। उन्होंने काम के घंटों को कम करके प्रति सप्ताह 48 घंटे करने, महिलाओं के कोयला खदानों में भूमिगत काम करने पर लगे प्रतिबंध को उठाने, ओवरटाइम का भुगतान, न्यूनतम वेतन का निर्धारण एवं संरक्षण, सवेतन अवकाश, लैंगिक भेदभाव न करते हुए समान काम समान वेतन, मातृत्व लाभ, श्रम कल्याण निधि तथा ट्रेड यूनियनों के गठन को मान्यता जैसे प्रावधान करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डॉ. आंबेडकर साम्यवादी श्रम आंदोलनों तथा साम्यवादियों की देश के बाहर की शक्तियों के प्रति वफादारी, उत्पादन के संसाधनों पर नियंत्रण के उनके मार्क्सवादी दृष्टिकोण का खुलकर विरोध करते थे।

संविधान का मसौदा बनाने के लिए गठित समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने भारत में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत पर आधारित एक न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के लिए सावधानीपूर्वक कदम उठाए। सबके लिए वयस्क मताधिकार की उनकी पैरवी से ही आज़ादी के तुरंत बाद देश में महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला। हिंदू कोड बिल के लिए उनकी क्रांतिकारी पैरवी थी जिससे महिलाओं की स्थिति को सुधारने की दिशा में उपाय हुए और उन्हें संपत्ति में वारिसाना हक़ मिला। केंद्र और राज्यों के बीच एक संघीय वित्त प्रणाली विकसित करने और उनके हितों की सुरक्षा करते हुए उनके उत्तरोत्तर आर्थिक स्तर को बढ़ाने में उन्होंने प्रमुख रूप से योगदान दिया। राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करने के प्रबल समर्थक के रूप में उन्होंने जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देने के विचार का विरोध किया और उसे संविधान के प्रारूप में शामिल नहीं किया। उन्होंने 10 अक्टूबर 1951 को केंद्रीय मंत्रिमंडल से अपने इस्तीफे के बयान में जम्मू-कश्मीर मामले को अचानक संयुक्त राष्ट्र संघ के पास ले जाने की नेहरू की विदेश नीति पर असंतोष व्यक्त किया। बौद्ध धम्म की एक अलग पूजा प्रणाली के माध्यम से उन्होंने दया, उदारता व करुणा के भारतीय मूल्यों को अपनाया।

डॉ. आंबेडकर के सोच की झलक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की गरीब समर्थक एवं जन कल्याणकारी नीतियों और कार्यक्रमों में दिखाई देती है। इस राष्ट्रवादी सुधारक की विरासत को उचित सम्मान प्रदान करने के लिए पंचतीर्थ का विकास करने के कदम उठाए जा रहे हैं। वे हैं जन्म भूमि (महू), शिक्षा भूमि (लंदन), चैत्य भूमि (मुंबई), दीक्षा भूमि (नागपुर), महा परिनिर्वाण भूमि (दिल्ली)। डॉ. अम्बेडकर ने जो सपने हमारे महान राष्ट्र के लिए देखे उन्हें पूरा करने के लिए सरकार प्रतिबद्धता के साथ उपाय कर रही है। जैसे मुद्रा योजना, अनुसूचित जाति-जनजाति समुदाय में उद्यमिता को बढ़ावा देने को स्टैंड-अप इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, आयुष्मान भारत याोजना, पीएम अवास योजना, उज्ज्वला योजना, ग्राम ज्योति योजना, सौभाग्‍य योजना, आदि। आइये आज डॉ. बी. आर. आंबेडकर की जयंती पर उनके सोच के विस्तृत फ़लक की कल्पना करते हुए हम उनको उचित श्रद्धांजलि दें और उनके विचारों के व्यापक प्रचार और राष्ट्र-निर्माण में खुद को लगा देने की प्रतिबद्धता का संकल्प लें।

(लेखक केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री तथा भारी उद्योग एवं सार्वजनिक प्रतिष्ठान राज्य मंत्री हैं। बीकानेर से लोकसभा के सदस्य हैं। ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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