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न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव: भविष्य में कांग्रेस से पूछे जाएंगे ये तीखे सवाल

यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जाना क्या अपरिहार्य (अनिवार्य) हो गया था। क्या हर सवाल का जवाब महाभियोग हो सकता है। आज तक देश में किसी भी मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग नहीं लाया गया। फिर ऐसा क्या हो गया कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरूद्ध कांग्रेस छह अन्य दलों के साथ मिलकर महाभियोग लाने की मुहिम की अगुआ बन गई है।

न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव: भविष्य में कांग्रेस से पूछे जाएंगे ये तीखे सवाल
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यह सवाल जरूर पूछा जाएगा कि मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जाना क्या अपरिहार्य (अनिवार्य) हो गया था। क्या हर सवाल का जवाब महाभियोग हो सकता है। आज तक देश में किसी भी मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग नहीं लाया गया। फिर ऐसा क्या हो गया कि मौजूदा मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के विरूद्ध कांग्रेस छह अन्य दलों के साथ मिलकर महाभियोग लाने की मुहिम की अगुआ बन गई है।

यह वो पार्टी है, जिसने करीब-करीब छह दशक तक देश पर राज किया है। इसी पार्टी के झंडे तले महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, सुभाष चंद्र बोस से लेकर मौलाना आजाद, डा. आंबेड़कर, सरदार पटेल और लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेताओं और लाखों नाम-अनाम स्वतंत्रता सैनानियों की अगुआई में स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया। सत्ताएं आती रहती हैं।

जाती रहती हैं परंतु लोकतंत्र के स्तंभों को जरा भी खरोंच नहीं आने पाए, हर जिम्मेदार राजनीतिक दल का यह प्रथम कर्त्तव्य होता है। किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ भी कभी महाभियोग लाने की जरूरत महसूस होती है तो दस बार मंथन होता है। जब कोई और रास्ता दिखाई नहीं देता, तभी ऐसा किया जाता है। यहां तो देश की सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश से जुड़ा हुआ है।

प्रश्न उठता है कि कांग्रेस और छह अन्य दलों ने यह कदम आखिर क्यों उठाया ? यह सवाल इसलिए भी खड़ा हुआ है क्योंकि खुद कांग्रेस के भीतर इसे लेकर तीखे मतभेद सामने आ रहे हैं। पूर्व कानून मंत्री सलमान खुर्शीद कुछ दिन पहले महाभियोग जैसे कदम से नाइत्तेफाकी जाहिर कर चुके हैं। और तो और सर्वोच्च अदालत के जिन चार जजों की प्रेस कांफ्रैंस का हवाला कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने किया है,

उनमें से एक चेलमेश्वर ने भी कुछ समय पहले एक प्रश्न के उत्तर में कहा था कि हर सवाल का जवाब महाभियोग कैसे हो सकता है। कल को मेरे खिलाफ भी महाभियोग का प्रस्ताव लाने की बातें होंगी। व्यवस्था में यदि दोष हैं, उन्हें ठीक किए जाने की जरूरत है। दरअसल, कांग्रेस ने सर्वोच्च संवैधानिक संस्था के मुखिया के खिलाफ महाभियोग लाकर देश के भीतर बहुत बड़ी चर्चा को जन्म दे दिया है।

कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद ने प्रेस कांफ्रैंस में चाहे जो कारण गिनाए हों, वह आसानी से लोगों के गले से नीचे नहीं उतरेंगे। कांग्रेस को भी पता है कि महाभियोग लाने और उसे पारित कराने के बीच बहुत सारे लेकिन किंतु परंतु हैं और जब तक दोनों सदनों में दो तिहाई सांसद उसे पारित नहीं कर देते, उसे सिरे चढ़ाना संभव नहीं है।

राज्यसभा और लोकसभा में कांग्रेस और विपक्षी दलों के पास इतने सांसद नहीं हैं कि महाभियोग प्रस्ताव पारित करा सकें। यह जानकारी होने के बावजूद कांग्रेस ने इसकी पहल आखिर क्यों की ? इसका जवाब ढूंढना कतई मुश्किल नहीं है। 2004 से 2014 तक दस साल कांग्रेस के नेतृत्व वाली डा. मनमोहन सिंह (यूपीए) सरकार केन्द्र में रही।

इस दौरान सीबीआई ने गुजरात हिंसा से जुड़े मामलों से लेकर समझौता एक्सप्रेस, हैदराबाद स्थित मक्का मस्जिद और माले गांव बम विस्फोटों में कर्नल पुरोहित, साध्वी प्रज्ञा, स्वामी असीमानंद से लेकर गुजरात की पूर्व मंत्री माया कोडनानी तक को आरोपी बना डाला। कांग्रेस के कई नेताओं और तत्कालीन गृह मंत्री पी चिदंबरम ने हिंदू और भगवा आतंकवाद की थ्येरी गढ़कर देश के अल्पसंख्यकों को कांग्रेस के पक्ष में मोड़ने की कोशिश की।

पिछले कुछ समय में अदालतों ने इन सभी मामलों में कोई सबूत और गवाह नहीं होने के चलते एक-एक कर इन सबको दोषमुक्त करार दिया है। यही नहीं, दो दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को घेरने और भाजपा को बदनाम करने की मंशा से दायर की गई उन याचिकाओं को भी खारिज कर दिया, जिनमें कहा गया था कि सीबीआई जज लोया की मौत की जांच एसआईटी से कराई जाए।

अदालतों से अपने मनमाफिक फैसले नहीं आने और उसके द्वारा बहु प्रचारित कथित भगवा आतंकवाद की हवा निकलने से वह इस कदर परेशान है कि तमाम तरह के आरोप लगाते हुए मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ ही महाभियोग लाने पर आमादा हो गई है। इस पर वित्त मंत्री अरुण जेटली की टिप्पणी गौर करने लायक है। उन्होंने कहा है कि कांग्रेस अब इस तरह से देश भर के जजों को डराने की कोशिश कर रही है।

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