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प्रमोद भार्गव का लेख : हौआ नहीं है ओमिक्रॉन

कोरोना के नए स्वरूप से भारत समेत दुनिया दहशत के साथ चिंता में है। इसका इतना हौआ बना दिया गया है कि कानपुर के एक चिकित्सक ने ओमिक्रोन के डर से अपनी पत्नी समेत दो बच्चों की हत्या कर दी। जबकि अब तक किसी भी वैज्ञानिक ने इसके खतरनाक होने की पुष्टि नहीं की है। दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे लेकर इसलिए भय पैदा कर रहा है क्योंकि चीन के वुहान से इस महामारी के फैलने के समय डब्ल्यूएचओ ने इसके दिशा निर्देश व यात्रा पर प्रतिबंध अतिरिक्त विलंब से जारी किए थे। इस कारण उसे चीन का चाटुकार और उसके हितों का संरक्षक भी कहा गया।

प्रमोद भार्गव  का लेख :  हौआ नहीं है ओमिक्रॉन
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प्रमोद भार्गव 

प्रमोद भार्गव

दक्षिण अफ्रीका से निकले कोरोना विषाणु के नए स्वरूप के अवतरित होने के बाद भारत समेत दुनिया दहशत के साथ चिंता में है। इसका इतना हौआ बना दिया गया है कि कानपुर के एक चिकित्सक ने ओमिक्रॉन के डर से अपनी पत्नी समेत दो बच्चों की हत्या कर दी। जबकि अब तक किसी भी वैज्ञानिक ने इसके खतरनाक होने की पुष्टि नहीं की है। दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे लेकर इसलिए भय पैदा कर रहा है क्योंकि चीन के वुहान से इस महामारी के फैलने के समय डब्ल्यूएचओ ने इसके दिशा निर्देश व यात्रा पर प्रतिबंध अतिरिक्त विलंब से जारी किए थे। इस कारण उसे चीन का चाटुकार और उसके हितों का संरक्षक भी कहा गया, लेकिन कोरोना के इस नए रूप के अवतरण होते ही इसे डब्ल्यूएचओ ने अत्यंत संक्रामक बताने के साथ डेल्टा से सात गुना ज्यादा तेज गति से फैलना भी बता दिया। जबकि फिलहाल यह भी तय नहीं हो पाया है कि यह कितना घातक है।

वैसे तो 24 नवंबर को सबसे पहले कोरोना के नए रूप की पहचान की थी। इसी के अगले दिन, यानी 25 नवंबर को डब्ल्यूएचओ ने इसका नाम ओमिक्रॉन देते हुए वैरिएंट ऑफ कन्सर्न रख दिया। मसलन चिंता का बहुरूप! तब से अब तक यह रूप करीब 50 देशों में फैल चुका है और इसका विस्तार जारी है। बावजूद इससे मौत होने की एक भी आधिकारिक खबर नहीं है। डब्ल्यूएचओ भी इस तथ्य की पुष्टि करता है। यानी दस दिन से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी ओमिक्रोन के रोगी सुरक्षित हैं। भारतीय वैज्ञानिकों की जिनोम सीक्वंेसिंग की निगरानी करने वाली वैज्ञानिकों की संस्था इन्साकॉग का मानना है कि यह नया ओमिक्रॉन का रूप अगर डेल्टा वायरस से मिश्रित होता है तो गंभीर संकट के हालत पैदा हो सकते हैं। हालांकि इस मिश्रण के कोई साक्ष्य अब तक सामने नहीं आए हैं। कोरोना की पहली और दूसरी लहर में शुरुआती लक्षण स्वाद और सूंघने की क्षमता का गायब हो जाना था। जबकि ओमिक्रॉन में ऐसा नहीं है। इसलिए इसकी वास्तविकता तभी सामने आएगी,जब रोगी की जीनोम सिक्वेंसिंग जांच होगी। हालांकि भारतीय अनुवांशिक वैज्ञानिकों के एक समूह का मानना है कि यदि आरटी-पीसीआर जांच को आंशिक तौर से न करके संपूर्ण तौर से किया जाए तो शरीर में इसके लक्षणों का पता चल सकता है।

सुविधाभोगी यूरोप में इसका विस्तार सबसे ज्यादा देखने में आया है। इस कारण भारतीय वैज्ञानिक चिंतित हैं। नई दिल्ली स्थित काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ विनोद स्कारिया का कहना है कि पहली बार कोविड-19 ऐसा विचित्र विषाणु देखने में आया है, जो 32 बार अपना स्वरूप परिवर्तन कर चुका है। इस वायरस की स्पाइक सरंचना में सबसे अधिक बदलाव हुए हैं। इसी वजह से वैक्सीन लेने के बावजूद दोबारा संक्रमित हो रहे हैं। इसलिए भारत में यह रूप प्रवेश करने के बाद यदि बाईदवे इसका संयोग डेल्टा वायरस के रूपों से बन जाता है, तो यह खतरनाक हो सकता है। क्योंकि इस मिश्रण के बाद यह कैसा होगा, वैज्ञानिकों को फिलहाल यह जानकारी नहीं है। क्योंकि अकेले डेल्टा रूप में ही 25 बार परिवर्तन हो चुका है। इन्साकॉग के अनुसार भारत में अब तक 1.15 लाख नमूनों की जिनोम सिक्वेंसिंग की गई है, इनमें से 45,394 नमूने गंभीर पाए गए हैं।

कोरोना सबसे पहले चीन के वुहान में मिला था। यहीं से दुनिया में सबसे अधिक फैला है। इसे ही चीन के वैज्ञानिकों द्वारा निर्मित कृत्रिम वायरस भी कहा गया है। लेकिन अभी तक यह सच्चाई सामने नहीं आई है कि वाकई कृत्रिम है या प्राकृतिक। इसके बाद 614 जी और ए-222 वायरस हैं, जो यूरोप में कहर ढा रहे हैं। डेल्टा, डेल्टा प्लस के अवतार में कैसे आया, यह अभी स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन इसकी संरचना पूर्व के वायरसों से बहुत ज्यादा भिन्न है, इसीलिए इसके फैलने की क्षमता भी ज्यादा रही है। दरअसल वायरस अपनी मूल प्रकृति से परजीवी होता है। इसलिए यह जब मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाता है तो कोशिका पर अनाधिकृत अधिकार जमाकर विकसित होने लगता है। इसकी संख्या में तब और ज्यादा गुणात्मक वृद्धि होती है, जब इसे न्यूनतम प्रतिरोधी क्षमता वाला शरीर मिल जाता है। ऐसे रोगियों के शरीर से शक्ति ग्रहण कर यह अधिक ताकतवर होकर बाहर निकलता है। इसीलिए वैज्ञानिक यह कह रहे हैं कि अधिक शक्तिशाली वायरस के आ जाने से इसी किस्म के पूर्व वायरसों की किस्में आप से आप खत्म होती चलती हैं। गोया, ओमिक्रॉन डेल्टा से ज्यादा ताकतवर हुआ तो डेल्टा की किस्में समाप्त हो जाएंगी।

ओमिक्रॉन वायरस तेजी से फैल तो रहा है, लेकिन उसी अनुपात में घातक भी है, ऐसे कोई वैज्ञानिक साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। इसीलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने टीकाकरण को लेकर आशा जताई है कि फिलहाल ज्यादा डर इस बात को लेकर है कि टीका कारगार है अथवा नहीं। यदि शरीर में टीका की वजह से प्रतिरक्षातंत्र मजबूत हुआ है तो वह नए रूप से रक्षा जरूर करेगा। साफ है, जिन लोगों ने टीके नहीं लगवाए हैं, वह जल्द से जल्द टीका लगवा लें। दरअसल ओमिक्रॉन से ज्यादा दहशत इसलिए फैल रही है, क्योंकि यह डेल्टा से सात गुना ज्यादा गति से फैल रहा है। लेकिन दक्षिण अफ्रीका के जिन क्षेत्रों में यह दो माह पहले से फैल रहा है, वहां इन्हीं दो माह में नई मरीजों के आने और मौतों में गिरावट दर्ज की जा रही है।

भारत समेत पूरी दुनिया में जो वैक्सीन लगाई जा रही हैं, वे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सक्षम हैं। लिहाजा वायरस नए रूपों में परिवर्तित होता भले ही चला जाए, वह टीके को निष्प्रभावी नहीं कर पाएगा।

ओमिक्रॉन की सरंचना के परीक्षण के बाद जो आरंभिक साक्ष्य मिले हैं, उनसे पता चला है कि यह रूप उन लोगों को ज्यादा प्रभावित कर सकता है, जो कोरोना संक्रमित हो चुके हैं। दिल्ली स्थित सीएसआईआर-जिनोमिकी और समवेत जीव विज्ञान संस्थान में वैज्ञानिक विनोद स्कारिया के मुताबिक डेल्टा प्लस सॉर्स सीओवी-2 के स्पाइक प्रोटीन में हुए परिवर्तन से बना था। लेकिन फिलहाल ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि अनुवांशिक परिवर्तन इसे ज्यादा खतरनाक बना पाते हैं अथवा नहीं? इसलिए उम्मीद भी बंधी है कि ओमिक्रॅन बीमारी को गंभीर बीमारी में बदलने में सक्षम नहीं है। इस लिहाज से कोरोना के इस नए अवतार से भयभीत होने की बजाय सावधानी बरतने की जरूरत है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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