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क्या भारत इन स्थितियों से कभी उबर पाएगा..?

हमारा प्यारा देश भारत ऐसी स्थिति में फंसता रहा है जिस पर गहराई से विचार करने के बाद ऐसा लगता है मानो इससे निकल ही नहीं पाएगा। लगता है जैसे देश एक ऐसे चौराहे पर है जहां कोई ट्रैफिक सिग्नल नहीं और जो चाहे जिधर से निकलने की कोशिश कर रहा है, एक-दूसरे से लड़ रहा है, टकरा रहा है।

क्या भारत इन स्थितियों से कभी उबर पाएगा..?
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हमारा प्यारा देश भारत ऐसी स्थिति में फंसता रहा है जिस पर गहराई से विचार करने के बाद ऐसा लगता है मानो इससे निकल ही नहीं पाएगा। लगता है जैसे देश एक ऐसे चौराहे पर है जहां कोई ट्रैफिक सिग्नल नहीं और जो चाहे जिधर से निकलने की कोशिश कर रहा है, एक-दूसरे से लड़ रहा है, टकरा रहा है। जहां तक नजर आए अस्तव्यस्तता का ऐसा ही नजारा।

ट्रैफिक संभालने वाला जितना संभव है स्थिति को संभालने में लगा है। यह समझ नहीं आ रहा कि वह सफल होगा या नहीं। एक स्वस्थ देश का लक्षण यह है कि वहां किसी मामले पर विवेक से प्रतिक्रियाएं आएं, देशहित के मामलों पर सरकार और विपक्ष की आवाज एक हो, कठिन परिस्थिति में भी सरकार साहस के साथ जो देशहित में हो वही करने की कोशिश करे,

यह न सोचे कि इससे विपक्ष हंगामा करने लगेगा, तात्कालिक बदनामी सहते हुए भी जो होना चाहिए वही करे, सुरक्षा के मामले पर, अखंडता पर बिल्कुल शत-प्रतिशत एकता दिखे। आप जरा दल निरपेक्ष होकर विचार करिए और आज के भारत की तस्वीर बनाइए। क्या ये लक्षण हमारे देश में हैं। अगर नहीं हैं तो फिर चाहे हम जितना दावा करें इसे संभाला नहीं गया तो फिर भविष्य को लेकर चिंता की लकीरें खींची रहेंगी।

अभी कश्मीर में एक आतंकवादी मारा गया। सैनिकों द्वारा उसका शव खींचकर लाने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। एक बड़े समूह ने ऐसा हंगामा मचाया मानो किसी महामानव के शव का अपमान हुआ है। आतंकवादी मरने के लिए ही आते हैं, लेकिन मरने से पहले और बाद में वे कितनी क्षति पहुंचा सकते हैं यह मुख्य लक्ष्य होता है। उनके शरीर में विस्फोटक लगे होते हैं।

पहले ऐसा हुआ कि जब सैनिक उसके शव को उठाने लगे तो विस्फोट हो गया और कई मारे गए। उसके बाद से यह सामान्य नियम बन गया कि रस्सी, जंजीर लगाकर शव को कुछ दूर खींचकर लाते हैं। यह पूरी दुनिया में होता है। लेकिन भारत के अलावा आपको कहीं कोई हंगामा सुनने को नहीं मिलेगा। मान लीजिए, नियम नहीं भी हो तो एक आतंकवादी, जो केवल खून बहाए, विध्वंस करे, उसके शव के साथ कैसा बर्ताव होना चाहिए?

एक ही बर्ताव होना चाहिए कि उसके शव को दूर कहीं जाकर फेंक दीजिए ताकि उसे चील, कौए, कुत्ते खाएं। उसे महसूस हो कि मरने पर दो गज जमीन नहीं मिलेगी। ऐसा होने लगे तो आतंकवाद काफी कम हो जाएंगे। वो जन्नत में जाने के ख्वाब में आतंकवादी बनते हैं। तुर्की में 17 वीं सदी में ऐसे ही आतंकवादी पैदा हो गए थे।

वहां सैनिकों ने इनको मारकर शव को जानवरों, पक्षियों को खाने के लिए फेंकना शुरु किया धीरे-धीरे आतंकवाद खत्म हो गया। हमारे देश में ऐसे लोग हैं जिनके लिए आतंकवादियों का मानवाधिकार सर्वोपरि है। यह एक उदाहरण है हमारे देश की आत्मघाती सोच का। अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मारकर समुद्र में कहां दफना दिया किसी को नहीं मालूम।

संदिग्ध माओवादियों की गिरफ्तारी पर देख लीजिए क्या हो रहा है। कांग्रेस जैसी पार्टी उनके साथ आ गई है। पुलिस उनसे पूछताछ करने से पहले उच्चतम न्यायालय के चक्कर लगा रही है। आप कैसे इस देश से माओवादी हिंसा को खत्म करेंगे, जब तक शहरों में उनको बौद्धिक खुराक से लेकर वित्तपोषण तक की व्यवस्था करने वाले विद्यमान हैं, ऐसी आत्मघाती प्रकृति वाला देश दुनिया में आपको नहीं मिलेगा।

अब जरा दूसरी दिशा में चलते हैं। इस समय बैंक का पैसा गबन करने का आरोप झेलने वाले भगोड़ों पर हंगामा मचा हुआ है। विजय माल्या ने बयान दे दिया कि वो लंदन आने के पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिला था। जेटली के इस्तीफे की मांग हो रही है। जिस विजय माल्या को सब लोग चोर कह रहे थे वह अचानक सत्यवादी हो गया।

कल कोई दुश्मन देश हमारे यहां अशांति पैदा कराना चाहे तो उसे कुछ करना ही नहीं प्रधानमंत्री पर कुछ ऐसा आरोप लगा दे जो देशहित के विरुद्ध जाने वाला हो तो उनके खिलाफ पता नहीं कितना बड़ा तूफान खड़ा हो जाएगा। यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति है। विजय माल्या के यहां यदि बैंक का पैसा डूब रहा है तो सरकार का उद्देश्य उसे किसी तरह वापस कराने का होना चाहिए।

वित्त मंत्री उनका पक्ष सुन लेते तो क्या हो जाता? सरकार विपक्ष के हंगामे की चिंता किए बगैर हिम्मत के साथ उनसे बात करती, वित्त मंत्री बैंक प्रतिनिधियों को बुलाते और समझौते का रास्ता निकल सकता था। माल्या ने न्यायालय में बताया था कि बैंकों का करीब 5 हजार करोड़ बनता है जो मैं किश्त में चुकाने को तैयार हूं।

यह सामान्य नियम है कि डूबते पैसे को पाने के लिए बैंक कर्जदार के साथ बैठकर रास्ता निकालते हैं और मूलधन से ही सेट्ल कर लेते हैं। माल्या पहले भी विदेश गया और उसे जब पूछताछ के लिए बुलाया गया आया। किंतु जब उसकी कोई सुनने वाला नहीं मिला तो भाग गया। मेहुल चौकसी और नीरव मोदी का मामला भी देख लीजिए। मेहुल चौकसी पर मामला इसलिए दर्ज हुआ, क्योंकि बैंकों के अनुसार वह नीरव मोदी का साझेदार था।

वह एक कंपनी में साझेदार था तथा वह साझेदारी भी 2000 में खत्म हो गई। उसका व्यापार देश के साथ विदेश तक था। उसके सारे शॉप, वर्कशॉप, कार्यालय सील हो गए, खाते फ्रीज कर दिए गए। सैंकड़ों लोगों का रोजगार चला गया। आज भी मामले को निपटाया जा सकता है। किंतु इसे इतना बड़ा मुद्दा बना दिया गया है कि सरकार इसे छूना ही नहीं चाहती।

सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय की भूमिका समझौता कराने की है नहीं। नीरव मोदी का मामला थोड़ा जटिल है। लेकिन वह भी बिगड़ा इसीलिए कि राजनीतिक नेतृत्व ने उसमें हाथ डालने की कोशिश तक नहीं की। हम यहां किसी को ईमानदारी का प्रमाण पत्र नहीं दे रहे। किंतु यहां प्रश्न दूसरा है। हमको अपना पैसा निकालना है और उनका व्यवसाय चल सकता है तो उसका रास्ता भी बनाना है।

बैंक अधिकारी अपना गला बचाने के लिए कर्ज लेने वालों को खलनायक बना देते हैं। फंसे हुए कर्ज के अनेक ऐसे मामले हैं जिनमें मिल बैठकर रास्ता निकाला जा सकता था। बैंक व्यावहारिक रास्ता अपनाते तो कर्ज वापस आ सकता था। जिसका व्यापार रुक गया वह फिर से खड़ा कर सकता था। हां, कुछ मामले में समस्या है।

किंतु किसी को जेल में डालने में हमारा हित है या उसके पास जो कुछ है उससे जितना हो सकता है कर्ज वापस करा लेने में अगर वाजिब कारण से व्यवसाय डूबा है तो वैसे व्यक्ति को फिर से खड़ा होने का मौका भी मिलना चाहिए। किंतु जहां ऐसे मामलों को राजनीति का हथियार बनाकर सरकार पर मिलीभगत का निराधार आरोप लगेगा और सरकार उस दबाव में आ जाएगी उस देश की दुर्दशा निश्चित है।

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