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समाज को आइना दिखाती एक उर्दू कहानी ''बराबरी''

डॉक्टर अब्दुल सत्तार तरक्कीपसंद खयालात के थे।

समाज को आइना दिखाती एक उर्दू कहानी
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डॉक्टर अब्दुल सत्तार तरक्कीपसंद खयालात के थे। धर्म, जाति, देश के भेद को नहीं मानते थे। बेटी मरियम को अमेरिका पढ़ने भी भेज दिया। लेकिन जब मरियम ने सूचना दी कि वह एक अमेरिकी से निकाह करना चाहती है तो थोड़ा परेशान हुए। फिर किसी तरह अपने दिल को समझा लिया। पर जब उन्होंने मरियम के शौहर को देखा तो...
डॉक्टर अब्दुल सत्तार ने दोबारा खत खोला और पढ़ने लगे। बोस्टन से उनकी लड़की मरियम ने इसे भेजा था, जो शोध कार्य के लिए दो साल से यूएस में थी। नौकर अभी चाय की प्याली रख कर गया था। उन्हें गर्म चाय पसंद थी, मगर अब तो यह ठंडी हो रही थी। खत में सलाम दुआ के बाद सबकी खैरियत पूछी गई थी। फिर वह बात थी, जिसने डॉक्टर सत्तार को हिला कर रख दिया था। लिखा था, ‘पापा! मैं एक जरूरी बात करना चाहती हूं। आपने मेरी हर बात मोहब्बत और धीरज से सुनी है, इसलिए हिम्मत कर रही हूं। उम्मीद है, आप नाराज नहीं होंगे। मेरी मुलाकात यहां डॉक्टर एरिक जॉन्सन से हुई है। वह काबिल और शरीफ इंसान हैं। दो साल से मेरे इंस्ट्रक्टर हैं। उन्होंने मुझे शादी का पैगाम दिया है। वह जहीन हैं और इंशाअल्लाह तरक्की करेंगे। अभी वह पाकिस्तान नहीं आ सकते और चाहते हैं कि हम निकाह कर लें। प्लीज मुझे इजाजत दें, मुझे यहां की नागरिकता भी मिल जाएगी।’ अंग्रेजी में लिखे गए इस खत पर डॉक्टर सत्तार की फौरी प्रतिक्रिया तो यह थी कि तुरंत बोस्टन कॉल बुक कराएं और पागल लड़की का दिमाग दुरुस्त कर दें। मगर फिर उन्होंने धीरज से काम लिया और कुर्सी की मुश्त से सिर टिका कर सोचने लगे।
आहिस्ता-आहिस्ता गुस्से पर उनके ख्यालात छाने लगे। वह इंसानी बराबरी को लेकर बड़ी शिद्दत से सोचते थे। मानते थे कि पूरी दुनिया में अशांति और फसाद की जड़ इंसान का आपसी अविश्वास और नस्ली रंगभेद था। उनकी जिंदगी पर मुहब्बत का जज्बा हावी था। उन्होंने कभी बेटा-बेटी में भी न समझा था। मरियम छोटी थी, तभी उन्होंने फैसला सुना दिया कि वह बेटियों को भी जायदाद में हिस्सा देंगे। मरियम को बेहतरीन स्कूल में पढ़ाया गया। फिर वह हार्वर्ड यूनिवर्सिटी बोस्टन पढ़ने चली गई। डॉक्टर सत्तार सोचने लगे, आखिर लड़के में क्या बुराई है, सिवा इसके कि वह अमेरिकी है। उनकी बेगम कश्मीरी थीं, खूबसूरत और गोरी, लिहाजा बच्चे भी मां पर हो गए थे। मरियम के खत से जाहिर होता था कि आदमी सही है, फिर शादी में क्या बुराई है? बेगम कमरे में आर्इं तो उन्होंने खामोशी से बेटी का खत पकड़ाया। खत के आखिरी हिस्से तक आते-आते उनकी त्यौरियां चढ़ने लगीं और फिर उनका रंग सफेद पड़ गया। कुछ क्षण दोनों ने कुछ नहीं कहा। फिर बेगम की बदली सी आवाज निकली, ‘और भेजो बाहर! मैं तो पहले ही खिलाफ थी..।’ वह तेजी से रोते हुए कमरे से बाहर निकल गर्इं। सत्तार साहब कुछ मिनट बाद आहिस्ता से उठे और बेगम के कमरे में पहुंचे। दुपट्टे का एक कोना बेगम के हाथ में था, जिससे वह आंखें पोंछ रही थीं। सत्तार साहब ने उनके कंधे पर हाथ रखा, ‘तुम जज्बाती हो रही हो। कंट्रोल रखो और मेरी बात सुनो।’ वह कुछ न बोलीं। उनका गुस्सा देख सत्तार साहब बाहर निकल गए। बीवी के शांत होने के बाद वह समझाना चाहते थे कि लड़का नेकदिल है। लड़की अट्ठाइस साल की है। हमें बड़ा दिल रखना होगा। ये खलिश रहेगी कि लड़की को अपने हाथ से नहीं ब्याह सके, मगर सोचो कि लड़की ने उसे चुना है और हमें उसकी खुशी मंजूर होनी चाहिए। मरियम को जवाबी खत लिखने के बाद सत्तार दंपत्ति ने करीबी दोस्तों-रिश्तेदारों को सूचना दे दी, हालांकि रिश्तेदारों के लिए यह काफी धमाकाखेज खबर थी। लड़कियों को ईर्ष्या हुई कि उनकी कजन को एक अमेरिकी ने पसंद कर लिया। कुछ का कहना था कि डॉक्टर सत्तार की लड़की हाथ से निकल गई। मगर डॉक्टर सत्तार आश्वस्त थे। उन्होंने खूब सोच-समझकर फैसला किया था। वह इंसानी बराबरी में यकीन रखते हैं और इस मामले में दूसरों की राय की उन्हें परवाह नहीं थी। मरियम की शादी हो गई। निकाह वाले दिन सत्तार फैमिली का फोन पर बोस्टन से संपर्क बना रहा। मां से बात करते हुए मरियम रोई तो मां भी फूट पड़ीं। ऐसी शादी के बारे में तो उन्होंने सोचा ही नहीं था। बैंक के लॉकर में मरियम के लिए जेवरात के दो सेट रखे थे, मगर जेवर तो लड़कियां पहनती हैं और बाप ने तो लड़की को लड़की रहने ही न दिया। वह मर्दों सी जिंदगी जी रही थी। अपने फैसले खुद करती थी। अकेली रहती थी, फिर भी फोन पर बात करते हुए वह जज्बात के हाथों बेकाबू हो गई।
मरियम ने फोन पर डॉक्टर साहब की एरिक से बात करवाई। डॉक्टर सत्तार ने मुबारकबाद दी और पाकिस्तान आने का न्यौता दिया। एरिक ने मदर-इन-लॉ से बात करने की ख्वाहिश जताई, मगर बेगम नर्वस हो गर्इं। वह खरे अमेरिकन के साथ इंग्लिश बोलते घबरा रही थीं। उन्होंने बस ‘हेलो’ और ‘कांग्रेट्स’ कह कर हड़बड़ी में फोन रख दिया। मरियम के छोटे बहन-भाइयों ने एरिक से खूब बातें कीं और शादी की तस्वीरें भेजने की फरमाइश कर डाली। छोटी बहन बीना ने कुरेद-कुरेदकर शादी का ब्यौरा पूछा। मरियम ने क्या पहना, मेहमानों को क्या खिलाया, तोहफे मिले? दूल्हे की शक्ल कैसी है? शादी की तस्वीरें कब आएंगीं। डॉक्टर साहब की ख्वाहिश थी कि मरियम शादी के बाद छुट्टी लेकर शौहर के साथ पाकिस्तान आए, लेकिन उसे नई-नई जॉब मिली थी। इतनी जल्दी छुट्टी लेना मुनासिब नहीं था। डॉक्टर साहब को मायूसी हुई। उन्हें बेटी से मिले दो साल हो चुके थे। शादी की तस्वीरें भेजने में मरियम ने सुस्ती दिखाई। इसरार इंतहाई बढ़ गया। महीना गुजर गया। तस्वीरें न पहुंचनी थीं और न पहुंचीं। आखिर समझा गया कि डाक विभाग की कोताही की भेंट चढ़ गई। मरियम काम में इतनी मसरूफ थी कि उसे फुर्सत ही नहीं मिलती थी।
एक दिन यूं ही बैठे-ठाले डॉक्टर सत्तार का दिल घबराया। छाती में दर्द सा महसूस हुआ और माथा पसीने-पसीने हो गया। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। हल्का हार्ट अटैक था। बेगम सत्तार बेचैनी और परेशानी से बुरा हाल किए थीं। रात-रात भर अस्पताल में शौहर की देखभाल करतीं। एक दिन मरियम का फोन आया। बेगम भरी बैठी थीं, फोन पर मरियम की खबर ले ली और बोलीं, ‘अब तुम अपने मां-बाप के मरने पर ही आना।’ मरियम सफाई पेश करती रही, मगर मां ने कुछ नहीं सुना। एक हफ्ते बाद मरियम ने फोन पर अपने आने का प्रोग्राम बताया। वह दो हफ्ते बाद पाकिस्तान आने वाली थी, साथ में डॉक्टर एरिक भी आ रहा था, जिसे बमुश्किल दो हफ्ते की छुट्टी मिली थी। डॉक्टर सत्तार अस्पताल से घर आ गए थे। मरियम के आने की खबर से ही उनका चेहरा सुर्ख हो गया था। वह बेटी-दामाद के स्वागत की तैयारियों में तल्लीन थे। कितनी गाड़ियां एयरपोर्ट जाएंगी। डिनर पर कौन-कौन आएगा? अपने पुराने कुलीग्स को भी बुलाना चाहते थे, ताकि एरिक से मिलवा सकें। सारे रिश्तेदारों को बारी-बारी फोन पर बेटी-दामाद के आगमन की खुशखबरी सुनाई जा चुकी थी और उन्हें आमंत्रित किया जा चुका था। घर में ईद का समां बंधने वाला था।
मिसेज सत्तार शॉपिंग में मसरूफ थीं। दिल में छुपे अरमान निकालने का वक्त आ गया था। मरियम के लिए दर्जन भर सूट और साड़ियां आॅर्डर कर चुकी थीं। एरिक के लिए पठानी शूट और गर्म शॉल्स लिए जा रहे थे। बेटी के लिए जेवरात का नया सेट आॅर्डर हो चुका था, जो वह अपने हाथों से पहली रात डिनर के वक्त पहनाएंगी। दामाद को उसकी पसंद से ही तोहफे दिए जाएंगे। मगर हीरे की अंगूठी तो उसकी मुंह दिखाई थी। सास अपने हाथ से पहली रात डिनर पर यह अंगूठी पहनाएंगी। शानदार हीरे की अंगूठी खरीदी गई है।
दूसरा मसला यह था कि अमेरिकन दामाद आ रहा है। घर भी उसकी शान के मुताबिक होना चाहिए। बेडरूम की नए सिरे से सजावट की गई। दीवार बा वाल कार्पेट लगाया गया। कमरे की नफीस सजावट की गई। ड्रॉइंग रूम में भी परिवर्तन किए गए। पूर्वी अंदाज की सजावट की चीजों में इजाफा किया गया, ताकि वह यहां के कल्चर से अवगत हो सके। सबसे बड़ा मसला बाथरूम का था, जो पुराने हो चुके थे। इतनी जल्दी नया सेट लगाना तो मुमकिन न था। सिर्फ कमोड बदल दिया गया। वक्त मिल जाता तो टाइलें भी बदलवा देते। बावर्ची को मेहमान के रहने के दौरान किचन खूब चमकाकर रखने का सख्ती से आॅर्डर दिया गया। गैर मुल्की नफासत पसंद होते हैं। सोचना बाकी था कि पकाया क्या जाएगा? वे लोग पंद्रह दिन के लिए आ रहे थे। छोटी बहन बीना ने पंद्रह दिन का मुकम्मल मेन्यू तैयार किया था। वह उम्दा इंटरनेशनल खानों की विधियां जमा कर रही थी। वैसे पंद्रह दिन तो दावतों में ही गुजर जाने थे। रिश्तेदार और दोस्त अभी से वक्त मांग रहे थे। बीना का इसरार था कि वह अमेरिकन दूल्हा भाई को तमाम खाने खिलाकर छोडेÞगी। कार भी सर्विसिंग के बाद चमचमा रही थी। एक और कार का इंतजाम कर लिया गया।
मरियम के आने में एक दिन बाकी था। मुकम्मल तैयारियों के बावजूद लगता था कि कुछ रह गया है। बेगम बौखलाई-बौखलाई फिर रही थीं। उनकी सहेलियों के फोन आ रहे थे। सब फ्लाइट का वक्त पूछ रहे थे, लेकिन फ्लाइट इतनी सुबह थी कि बेगम सत्तार ने खुशदिलों से सबको एयरपोर्ट जाने से मना कर दिया और शाम को घर आने को कह दिया, लेकिन करीबी रिश्तेदार आग्रह करने में थे कि वे सुबह ही आ जाएंगे और मरियम और उसके दूल्हे का स्वागत करेंगे। बीना सहेलियों को फोन करके दूल्हे के बारे में बता रही थी। हालांंकि उसने सबसे एक दिन छोड़कर आने को कहा था। वजह यह थी कि पहले दिन रिश्तेदारों का जमावड़ा होगा, रात में डिनर होगा। दूल्हे मियां थके होंगे। एक सहेली ने पूछा कि वह मगरूर तो नहीं? बीना ने कहा, ‘वह बहुत स्वीट हैं।’ दो गाड़ियां एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गर्इं। एक गाड़ी में बेटा और उसके साथ बीना थी। वह बजिद थी कि बहन और दूल्हे वाली गाड़ी में बैठेगी। दूसरी कार मंझला बेटा ड्राइव कर रहा था और डॉक्टर सत्तार और बेगम साथ थे। बेगम रास्ते भर दुआएं मांगती रहीं। उनके दिल में मीठी-सी बेचैनी थी। बेटी को इतने अर्से बाद देखेंगी। डरती थीं कि वह उस अमेरिकन की भाषा कैसे समझेंगी। बाकी लोग अंग्रेजी बोल लेते थे, मगर वह अंग्रेजी में कच्ची थीं। खैर कुछ न कुछ हो जाएगा। एयरपोर्ट आ गया। गाड़ी पार्क कर सब लोग लाउंज में आ गए। फ्लाइट पहुंच चुकी थी। इंटरनेशनल फ्लाइट से लोग बाहर निकलने में वक्त लेते हैं। एक तो सामान ज्यादा होता है, फिर सामान की क्लियरिंग और पैकिंग में वक्त लगता है। थोड़ी-थोड़ी देर बाद सब लोग रेलिंग के पास आकर झांक लेते थे। बेगम सत्तार थक कर बेंच पर बैठ गर्इं और और अपनी निगाहें वहां गड़ा दीं, जहां से मुसाफिर निकलने वाले थे। बीना भी उनके साथ थी और वहीं निगाहें जमाए बैठी थी।
तकरीबन आधे घंटे बाद न्यूयॉर्क की उड़ान से मुसाफिर बाहर आने शुरू हुए, सब लपक कर दरवाजे के सामने चारों तरफ लगी हुई रेलिंग के साथ चिपक गए और एक-एक को देखने लगे। बेगम सत्तार भी हुजूम के अंदर घुसी थीं और हर आने वाले को देख रही थीं। मरियम ने निकलने में देर लगा दी। ‘बाजी...!’ बीना चीखी बहुत से लोगों में उन्हें मरियम का चेहरा नजर आया। फिर वह चुप सी हो गई। दरवाजे से बाहर निकलने के बाद वह फिर उन्हें नजर आई। उसने लंबा कोट पहन रखा था और सिर पर स्कार्फ था। कंधे से पर्स लटक रहा था, हाथ में बैग था। ‘इधर मरियम!’ बीना ने जोर-जोर से हाथ हिलाए। मरियम ने उन्हें देख लिया और जल्दी से उनकी तरफ लपकी, लेकिन उसके साथ कोई अमेरिकन मर्द नहीं था।
‘एरिक नहीं आया?’ डॉक्टर सत्तार ने पूछा।
‘आया है। दिस वे। मरियम ने बाजू लहराकर सामान की गाड़ी ढकेलते हुए एक लंबे-तगड़े अश्वेत मर्द की ओर इशारा किया। गोरे अमेरिकन की तलाश करती निगाहों ने मरियम के पीछे आते हुए उस व्यक्ति को नोटिस नहीं किया था। ‘यह एरिक है पापा। एंड एरिक, दिस इज पापा हेयर इज मॉम।’
सब लोग भौंचक्के होकर एरिक को देख रहे थे। गुफाओं जैसे नथुने और स्याह होंठों के अंदर लंबे-लंबे सफेद दांत...। एरिक की मुस्कुराहट भी भयानक थी। वह आगे बढ़ा और सबसे हाथ मिलाने लगा। वह गहरे रंग का स्मार्ट सूट पहने था। वापसी पर बीना जबरदस्ती मम्मी-पापा वाली गाड़ी में बैठी। बड़ा बेटा, मरियम और उसका शौहर एक कार में थे, दूसरी कार मंझला बेटा ड्राइव कर रहा था। बराबर में छोटी बहन थी। पिछली सीट पर डॉक्टर सत्तार और बेगम सत्तार। कुछ देर तक कोई कुछ न बोला। ‘सारे रिश्तेदार अब तक घर पहुंच चुके होेंगे।’ डॉक्टर सत्तार ने खोए-खोए अंदाज से कहा। ‘शुक्र है, मेरी फ्रेंड आज नहीं आ रहीं’, बीना ने बैठी हुई आवाज में कहा।
‘क्या हुआ? वह भी तो इंसान हैं।’ मंझले बेटे की आवाज में व्यंग्य का पुट था।
‘चुप करो कमबख्तों!’ बेगम सत्तार फट पड़ीं, जलील कर दिया लड़की ने’, वह सिसक-सिसक कर रोने लगीं।
‘वैसे है स्मार्ट....‘मंझला बाज नहीं आया।’
‘खामोश रह!’ बेगम सत्तार दहाड़ीं, ‘तुम सब एक जैसे हो। यह सब इस आदमी की वजह से हुआ है। बराबरी...बराबरी...अब चाटो बराबरी को। तबाह करा दिया।’ वह पति को कोसते हुए सिसकने लगीं।
‘ऐसा न कहें अम्मी! हो सकता है, उसकी रूह बहुत खूबसूरत हो।’
‘अचार डालना है रूह का!’ अब तक खामोश बैठे डॉक्टर साहब तुनक कर बोले, ‘घर पर रिश्तेदार दांत गाड़े बैठे हैं। सच कह रही है तुम्हारी मां। नहीं भोजना चाहिए था लड़की को अकेले...’ डॉक्टर साहब का गला रुंध गया और आवाज कंठ में फंस गई।
अनुवाद- सुरजीत
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