Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

सुशील राजेश का लेख : स्वास्थ्य व्यवस्था को चाहिए 'ऑक्सीजन'

देशभर के 284 कोविड अस्पतालों, केयर सेंटर्स और क्वारंटीन केंद्रों में कोविड के कुल बिस्तर 20 लाख से भी कम हैं। उनमें से करीब 5 लाख आईसीयू बेड हैं। बुनियादी सवाल है कि क्या देश की करीब 139 करोड़ आबादी के लिए बिस्तरों की यह संख्या पर्याप्त है?

सुशील राजेश का लेख : स्वास्थ्य व्यवस्था को चाहिए ऑक्सीजन
X

सुशील राजेश

सुशील राजेश

प्रख्यात मेडिकल शोध-पत्रिका 'द लैंसेट' ने एक विश्लेषण प्रकाशित किया है, जिसका निष्कर्ष है कि कोविड-19 का संक्रमण हवा के जरिये तेजी से फैलता है और दूर तक संक्रमित कर सकता है। बूंदों (डाॅपलेट्स) से उतनी तेजी से संक्रमण नहीं फैलता। इस थ्योरी को खारिज कर दिया गया है। 'लैंसेट' का विश्लेषण ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका के छह विशेषज्ञों ने किया है। ऐसा ही शोधात्मक अध्ययन जुलाई, 2020 में 200 से अधिक विशेषज्ञ वैज्ञानिकों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को लिखकर भेजा था कि कोरोना संक्रमण हवा से भी फैलता है। खांसने, छींकने और सामान्य संवाद से जो कण हवा में घुल-मिल जाते हैं और लंबे वक्त तक जिंदा रहते हैं, उनकी संख्या हजारों में होती है। सांस लेने और छोड़ने के जरिये वायरस एक से दूसरे मानव-शरीर में प्रवेश करते हैं। संक्रमण हवा से नहीं फैलता, इस थ्योरी के पक्ष में ठोस सबूत नहीं हैं।

बहरहाल हालिया विश्लेषण में दावा किया गया है कि ऐसे संक्रमण के ठोस सबूत उपलब्ध हैं। 'लैंसेट' में भारत में व्यापक रूप से फैल रहे कोरोना संक्रमण की बुनियादी वजह भी हवा बताई गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 10 से ज्यादा लोग एक स्थान पर इकट्ठा न हों। यानी मेले, रैलियां, चुनाव, बंद कमरों में बसने की मजबूरी आदि ऐसे बुनियादी कारण हैं, जो संक्रमण फैला रहे हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कमोबेश 2 महीने तक भीड़ से एहतियात बरतें। जिन इलाकों में संक्रमण के ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं, वहीं कड़ी बंदिशें लगाई जाएं। पूर्ण लाॅकडाउन की जरूरत नहीं है।

'द लैंसेट' की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद प्रमुख चिकित्सकों और वैज्ञानिकों की टिप्पणियों का सार यह है कि भारत में संक्रमण की मौजूदा लहर लंबी चलेगी। इसका ढलान कब शुरू होगा, फिलहाल अनुमान लगाना असंभव-सा है, लेकिन संक्रमण की तीसरी लहर भी आएगी और इतनी ही भयावह हो सकती है। गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ डाॅक्टर एम.वली का मानना है कि रोज़ाना संक्रमण के आंकड़े 3 लाख को भी पार कर सकते हैं और आने वाले दिनों में हर रोज़ मौतों की संख्या 2500 को पार कर सकती है। रिपोर्ट के एक और भाग में खुलासा किया गया है कि कोरोना संक्रमण नवजात शिशुओं को भी घेर रहा है। ऐसे में पेचीदा सवाल डाॅक्टरों के सामने है कि ऐसे संक्रमित शिशु अपनी 'निगेटिव' मां का दूध पी सकते हैं अथवा नहीं? एक और अध्ययन सामने आया है कि मार्च में 10 साल की उम्र तक के करीब 55,000 बच्चे संक्रमित हुए हैं। बच्चों और 35 साल की उम्र तक के युवाओं के लिए तो कोरोना 'काल' बनकर आया है। ब्रिटेन में कार्यरत विशेषज्ञ चिकित्सक डाॅ. सुजीत राजन का अध्ययन है कि 25 से 55 साल तक की उम्र वालों में फेफड़ों का इंफेक्शन बेहद तेजी से फैल रहा है। कई मामलों में 60 फीसदी तक फेफड़े प्रभावित हुए हैं। जिनमें संक्रमण ज्यादा नहीं है और आक्सीजन स्तर भी ठीक है, वे अस्पताल की ओर न भागें। उन्हें क्वारंटीन करना चाहिए और पेट के बल लेटकर सोना चाहिए। उससे फायदा होगा। इन हालात में किसी भी देश का स्वास्थ्य ढांचा और व्यवस्थाएं ध्वस्त हो सकती हैं। हालांकि भारत में कहीं-कहीं व्यवस्था चरमरा जरूर रही है।

फोर्टिस अस्पताल के निदेशक डाॅ. कौशल कांत के मुताबिक, देशभर के 284 कोविड अस्पतालों, केयर सेंटर्स और क्वारंटीन केंद्रों में कोविड के कुल बिस्तर 20 लाख से भी कम हैं। उनमें से करीब 5 लाख आईसीयू बेड हैं। बुनियादी सवाल है कि क्या देश की करीब 139 करोड़ आबादी के लिए बिस्तरों की यह संख्या पर्याप्त है? यह नहीं हो सकता, लिहाजा आम आदमी बीमारी और महामारी में तड़प-तड़प कर मर रहा है। राजधानी दिल्ली के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में एक ही बिस्तर पर कोविड के दो मरीज लिटाने की विवशता है। देश के नेताओं, अमीर लोगों और वीआईपी जमात को कोई परेशानी नहीं है, क्योंकि उनके लिए बिस्तर खाली और आरक्षित रखे जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि कोरोना की पहली लहर के दौरान देशभर में जो लाॅकडाउन लगाया गया था, उस दौरान सरकार और निजी क्षेत्र के स्तर पर, स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की, कोशिश नहीं की गई। हम पीपीई किट्स, वेंटिलेटर और मास्क के क्षेत्रों में आत्मनिर्भर हुए। हमने कोरोना के दो टीके बनाने और उनके उत्पादन में कामयाबी हासिल की और करीब 12 करोड़ नागरिकों को टीके की खुराकें भी दी जा चुकी हैं। अभी आधा दर्जन टीके बाज़ार में आने हैं। वे सरकार और विशेषज्ञ समूह के विचाराधीन हैं।

अमेरिकी इंजेक्शन रेमडेसिविर का भारत में उत्पादन हो रहा है। आज 7 कंपनियां कार्यरत हैं और केंद्र ने उत्पादन दोगुना करने का फैसला भी ले लिया है, लेकिन तैयारियों और कोशिशों के बावजूद कई विसंगतियां सामने आई हैं। सिर्फ वेंटिलेटर की ही बात करें, तो 50,000 वेंटिलेटर बनाने के आर्डर ज्यादातर उन कंपनियों को दिए गए, जिनके पास बुनियादी ढांचा ही नहीं था। ऐसी एक कंपनी चेन्नई की है, जिसे 373 करोड़ रुपये का आर्डर दिया गया और वह एक भी वेंटिलेटर बनाकर नहीं दे सकी। इस तरह देश में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा मजबूत कैसे किया जा सकता है? यदि तह तक जाएं, तो वेंटिलेटर के सौदों में बड़ा घोटाला भी सामने आ सकता है! बहरहाल जब कोरोना का फैलाव भयावह स्थिति तक आ चुका है, जब सरकार ने 50,000 मीट्रिक टन आक्सीजन आयात करने का निर्णय लिया है। यह भोज काल में सब्जी उगाने जैसा है। अभी तो हमारी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को आक्सीजन की जरूरत है।

दरअसल आज़ादी के बाद सात दशकों में भी स्वास्थ्य हमारी प्राथमिकता नहीं रहा। एक भी चुनाव इस मुद्दे पर नहीं लड़ा गया और न ही जनता ने पुरजोर मांग की। हम तो चुनाव देखते और तय करते रहे। यही कारण है कि आज भी जीडीपी का 3 फीसदी हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च नहीं किया जाता। हालांकि इस बार आम बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए आवंट में बंपर वृद्धि की गई है, लेकिन सवाल है कि पिछले अनुभवों को देखते हुए क्या सरकार आने वाले वक्त में पब्लिक हेल्थ सिस्टम को दुरुस्त कर पाएगी, यह समय बताएगा? लिहाजा यह महामारी भी 'राम भरोसे' बीतने दीजिए।

Next Story