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डॉ. ओमप्रभात अग्रवाल का लेख : पराली का प्रबंधन करना होगा

पराली जलाने के गंभीर परिणाम सामने आ रहे है। हर साल अक्टूबर माह के लगभग काटी जाने वाली धान की फसल पंजाब, हरियाणा और राजधानी दिल्ली क्षेत्र में मौसम की मुख्य फसल होने के कारण इसका क्षेत्र अत्यंत विशाल होता है और इसीलिये एक रपट के अनुसार इस वर्ष (2020) 25 अक्टूबर से एक नवंबर तक हरियाणा में 5784 स्थानों पर दहन हुआ। केवल 30 अक्टूबर को ही राजधानी और आस पास के क्षेत्रों में 3471 स्थानों पर दहन हुआ। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के निगरानी केन्द्र ‘सफर’ ने रपट दी कि 6 नवंबर को सम्पूर्ण उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में 4520 स्थानों पर पराली जलाई गई। सख्ती के बाद भी किसान उसे जला रहे है।

पंजाब में अब तक पराली जलाए जाने के 23 हजार से अधिक मामले, 85 लाख का लगाया जा चुका है जुर्माना
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डॉ. ओमप्रभात अग्रवाल

आजकल चारों ओर पराली दहन का शोर है। मीडिया में इसकी इतनी ही चर्चा है जितनी वैश्विक महामारी कोरोना की। पहले तो किसान इन्हेें खोद कर निकाल लिया करता था और इनका उपयोग कम्पोस्ट खाद बनाने अथवा पशुओं के चारे के रूप में कर लिया करता था। परंतु देश में हरित क्रांति के साथ बढ़े हुये उत्पादन तथा फलस्वरूप कम्बाइंड हारवेस्टरों के अधिकाधिक उपयोग में आने के पश्चात ये अवशेष अधिक लंबे लंबे एवं इतने अधिक मात्रा में खेत में पड़े रहने लग गये कि खोद कर निकालना अत्यधिक श्रमसाध्य तथा व्ययसाध्य हो गया।

अक्टूबर माह के लगभग काटी जाने वाली धान की फसल पंजाब, हरियाणा और राजधानी दिल्ली क्षेत्र में मौसम की मुख्य फसल होने के कारण इसका क्षेत्र अत्यंत विशाल होता है और इसीलिये एक रपट के अनुसार इस वर्ष (2020) 25 अक्टूबर से एक नवंबर तक हरियाणा में 5784 स्थानों पर दहन हुआ। केवल 30 अक्टूबर को ही राजधानी और आस पास के क्षेत्रों में 3471 स्थानों पर दहन हुआ। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के निगरानी केन्द्र 'सफर' ने रपट दी कि 6 नवंबर को सम्पूर्ण उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में 4520 स्थानों पर दहन हुआ। 2019 में सर्वाधिक दहन वाले अक्टूबर के एक विशेष दिन दहन की कुल संख्या 2700 रही थी। दहन के इस महाकाय रूप के कारण सैटेलाइटों से लिये गये चित्रों तक में वह स्पष्ट रूप से दिखता है। पराली दहन मिट्टी से नाइट्रोजन, फाॅस्फोरस, पौटैशियम जैसे तत्वों को नष्ट कर भूमि की उपजाऊ शक्ति तो कम करता ही है, गहन वायु प्रदूषण को भी जन्म देता है। सेंटर फाॅर साइंस एंड एनवायरमेंट की वैज्ञानिक अनुमिता राय चौधरीके अनुसार एक टन पराली के दहन से 60 किलोग्राम कार्बन मोनाॅक्साइड तथा 1460 किलोग्राम कार्बन डाइआॅक्साइड अगैसें, 3 किलोग्राम कणीय द्रव्य , 200 किलोग्राम राख, अत्यंत थोड़ी मात्रा में नाइट्रोजन पराॅक्साइड एवं हाड्रोकार्बन गैसें उत्पन्न होती हैं। जो कई रोगों का कारण बनती है।

कणीय द्रव्य वास्तव में महीन कार्बन कण होते है जो पराली दहन से बनते हैं। इन्हें अपने ही आकार के धूल कणों का साथ भी पर्यावरण प्रदूषण के लिये मिल जाता है। च्ड 2.5 इतने महीन होते हैं कि उनकी अपेक्षा मनुष्य के सर के बालों की मोटाई 30 गुणा अधिक होती है। ये सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंच कर उन्हें क्षतिग्रस्त कर देते हैं। च्ड 10 आकार में बड़े होने के कारण फेफड़ों तक तो नहीं पहुंच पाते परंतु श्वास नली तक पहुंच कर सांस की बीमारियों को वे भी उत्पन्न करते हैं। च्ड 10 से भी बड़े आकार के कण शरीर के अंदर प्रवेश कर पाने में असमर्थ रहते हैं क्योंकि वे नाक के अंदर के बालों में फंस कर रह जाते हैं। कणीय द्रव्य एक अत्यंत विनाशकारी धूमित कोहरे अथवा स्माॅग के निर्माण के लिये भी उत्तरदायी होते हैं। स्माॅग, अंग्रेजी के दो शब्दों, फाॅग एवं स्मोक को मिला कर बनाया गया शब्द है। कोहरा अथवा फाॅग वातावरण में उपस्थित जल वाष्प के ठंडे मौसम में संघनित होने से निर्मित होता है। इस संघनन से अत्यंत लघु जल कणों की सृष्टि होती है जो पास पास आकर धुंए जैसे कोहरे का निर्माण करते हैं। इसी कोहरे में जब लघु कार्बन कण (कणीय द्रव्य) मिश्रित हो जाते हैं तो धूमित कोहरा अथवा स्माॅग अस्तित्व में आता है। इस कोहरे को धूमित इसलिये कहा जाता है क्योंकि सामान्य धूम (धुंआ) भी लघु कार्बन कणों से ही बना होता है।

स्मरणीय है कि इस स्माॅग में दहन से उत्पन्न सभी प्रदूषक गैसें भी मिल जाती हैं और इसे अत्यंत विषैला बना देती हैं। राजधानी दिल्ली 1 नवंबर 2016 को विकट स्माॅग से घिर गई थी जो 8-10 दिन तक चला। उस वर्ष भी पराली दहन अक्टूबर के उत्तरार्ध में प्रारंभ हो गया था। यह स्माॅग इतना घनघोर था कि दृश्यता 10 फीट से भी कम रह गई थी और यूनीसेफ तक ने इसका संज्ञान लिया था। इसकी तुलना इतिहास के भीषणतम 1952 के लंदन के स्माॅग से की गई थी, जब वहां 20 हजार व्यक्ति प्रश्वसन कष्टों से पीड़ित हुएथे और चार हजार तो मृत्यु के मुख में ही चले गये थे। स्मरणीय है कि 2.5 की सुरक्षित सीमा भारत में प्रति घनमीटर वायु के लिये 60 एवं सहनीय सीमा 100 आंकी गई है जबकि दिल्ली में यह 500 तक पहुंच गई थी। वायु प्रदूषण 10 के लिए सुरक्षित सीमा 100 है।

इस वर्ष ठंड कुछ अधिक पहले पड़ जाने के कारण 25 अक्टूबर को ही दिल्ली में स्माॅग दिखाई दिया। यह स्माॅग 2016 की भांति भीषण तो नहीं है, परंतु स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव दिखाई देने लगा है। पराली दहन निश्चय ही गंभीर वायु प्रदूषण का जनक होता है यद्यपि आज के किसान की यह एक सीमा तक विवशता भी है। अतः इससे छुटकारा पाने के उपाय ढूंढ़े जा रहे हैं। पराली को काटना तो पड़ेगा ही यद्यपि प्रक्रिया को धनलाभ कमाने का जरिया बनाकर किसान को प्रोत्साहित किया जा सकता है। उदाहरण के लिये इसे बायोफुयेल (बायोइथेनाॅल) के उत्पादन के लिये काम में लाया जा सकता है। यह फुयेल (ईंधन) अब तो पेट्रोल गैसोलीन आदि में कुछ मात्रा में अवश्य मिलाया जाता है। (भारत) के वैज्ञानिकों ने एक विशेष एन्जाइम की सहायता से पराली के 76 प्रतिशत तक को बायोफुयेल में परिवर्तित करने की क्षमता वाली विधि विकसित कर ली है। इसी प्रकार एक अन्य विधि द्वारा इसे बायोमास में परिवर्तित कर उससे थर्मल ऊर्जा उत्पादित की जा सकती जो अंततः बिजली के उत्पादन का श्रोत बन जाती है। पंजाब के फाजिल्का में एक संयंत्र इस विधि से बिजली बना भी रहा है। कहना न होगा कि ये दोनों ही प्रयास फिलहाल सर्वथा नाकाफी हैं। अभी अभी एक बहुत ही सरल एवं सक्षम विधि का विकास हुआ है। इस विधि का श्रेय इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट को जाता है। इसमें एक विशिष्ट बायोडीकम्पोजर विलयन, जिसका विकास इंस्टीट्यूट ने ही किया है, का छिड़काव खेतों में भूमि से लगी हुई पराली के ऊपर ही कर दिया जाता है। कुछ अवधि में वह वहीं पर सड़ गल कर एक उत्तम जैविक खाद में परिवर्तित हो जाती है और खेत अगली फसल के लिये बिना किसी अधिक श्रम अथवा व्यय के तैयार हो जाते हैं। अब योजना बन रही है कि इसी सस्ती और सक्षम विधि का उपयोग पराली की समस्या से छुटकारा पाने के लिये किया जाय। दिल्ली और आस पास के कुछ क्षेत्रों में तो यह विधि क्रियान्वित भी की जा रही है।

पराली की समस्या कितनी गंभीर है इसका एक अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इससे उत्पन्न गहन प्रदूषण के कारण प्रदूषण सूचक ।फप् जो सामान्यतः 100 से अधिक होना चाहिये अब सम्पूर्ण प्रदेश में 400 से भी ऊपर पहंुच रहा है। अधिकांश नगरों में यह 500 के आस पास है और कहीं कहीं तो 600 से भी ऊपर तक चला गया है। यह स्वास्थ्य के लिये खतरे का अलार्म है। अस्पताल कोविड की मार से पहले ही त्रस्त थे और ऊपर से अब प्रदूषण के प्रभाव की मार झेलने को भी विवश हो रहे हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय तक ने सरकार से पूछा है कि प्रदूषण से नागरिकों के स्वास्थ्य के संरक्षण के लिये क्या किया जा रहा है। यह दहन निश्चय ही सत्यानाशी है और इस पर शीघ्र से शीघ्र नियंत्रण आवश्यक है ताकि 2016 वाली स्थिति पुनः न उत्पन्न हो जाय।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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