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इंसान नहीं भेड़िया था राम रहीम!

गुरमीत ऐसा भी अपराधी है जो अपने राम रहीम नाम और संस्था का नाम डेरा सच्चा सौदा को कलंकित किया है।

इंसान नहीं भेड़िया था राम रहीम!
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एक बार फिर हमारी न्याय व्यवस्था की जीत हुई है। देश के कानून ने साबित किया है कि इंसाफ के मंदिर में सभी समान हैं। लोकतंत्र की मजबूती और उसकी सुरक्षा के लिए जरूरी है कि न्याय व्यवस्था यूं ही गतिशील बनी रहे।

दो महिलाओं के साथ बलात्कार के दोषी डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत सिंह राम रहीम को बीस साल कारावास की सजा समाज को बड़ा संदेश है कि कोई भी कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, उसका कितना भी राजनीतिक रसूख क्यों न हो, गुनाह करके बच नहीं सकता है।

गुरमीत सिंह का गुनाह इसलिए भी बड़ा है कि उस पर लाखों लोगों का भरोसा था। उसमें लाखों अनुयायियों की आस्था थी। वह धार्मिक नैतिकता का प्रतीक था। लोगों का अटल भरोसा तोड़ना, अनुयायियों की अंध आस्था से खिलवाड़ करना और धार्मिक नैतिकता का त्याग करना बड़ा गुनाह है।

इससे मानवता तार-तार होती है। जब लोग विश्वास करके आपके पास आ रहे हों, आपकी एक आवाज पर नतमस्तक हों और आप उस विश्वास को तोड़ें, आप उस आवाज को ताकत बढ़ाने के लिए दुरुपयोग करें, तो यह गुनाह है।

जज जगदीप सिंह ने सटीक टिप्प्णी भी की कि राम रहीम ने अपने प्रभाव का गलत इस्तेमाल किया और रेप जैसे अपराध को अंजाम दिया। समाज का एक ऐसा शख्स जिसे लोग बाबा मानते हैं, उसे अलग-अलग रूप में देखते हैं,

उसकी बातों को लोग गौर से सुनते हैं, इसके बाद भी उसने ऐसा कुकृत्य किया है, जिसे किसी भी सूरत में क्षमा नहीं किया जा सकता है। गुरमीत को मिली यह सजा धर्म के नाम पर एशो-आराम व अय्याशी का साम्राज्य खड़ा करने वाले व व्यापार करने वाले हर शख्स के लिए भी बड़ी सबक है।

गुरमीत इसलिए भी बड़ा अपराधी है कि वह सभ्य धार्मिक चेहरे के पीछे छिपा एक भेड़िया है, जो अपनी ताकत के दंभ में बलात्कार करने से भी नहीं हिचकता है और हिमाकत ऐसी कि पूरे मामले को भरसक दबाने का प्रयास भी करता है।

गुरमीत पर अपनी संस्था डेरा सच्चा सौदा की एक साध्वी के भाई और एक पत्रकार की हत्या करवाने व साधुओं को नपुंसक बनवाने के भी आरोप हैं। पत्रकार केस में 16 सितंबर और इसी सीबीआई अदालत सुनवाई होगी व नपुंसक केस में 24 अक्टूबर को हाईकोर्ट में सुनवाई होगी।

गुरमीत जैसे सफेदपोश अपराधियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी भी जरूरी है, ताकि इंसानियत पर से किसी का यकीन खत्म नहीं हो। गुरमीत सिंह जिस सामाजिक सेवा और उपकार की दुहाई देकर सीबीआई अदालत से अपने गुनाह को कम करने के लिए गिड़गिड़ा रहा था,

तो उसे समझना होगा कि अपराध हमेशा अपराध है, सेवा से अपराध की मात्रा कम नहीं होती है और सेवा के नाम पर अन्याय करने की छूट नहीं मिल जाती है। गुरमीत ऐसा भी अपराधी है जो अपने राम रहीम नाम और संस्था का नाम डेरा सच्चा सौदा को कलंकित किया है।

इससे पहले भी आसाराम, नारायाण साई, रामपाल, नित्यानंद, भीमानंद, जाकिर नाईक जैसे कई स्वयंभू धर्म के सौदागरों की करतूतें सामने आ चुकी हैं। लोगों को भी सोचना होगा कि धर्म के नाम पर किसी पर अंधविश्वास न करें।

ऐसे राजनेता और प्रशासन में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों को भी अपनी गिरेबां में झांकने की जरूरत है, जो गुरमीत जैसे बाबाओं के सामने घुटने टेकते हैं। बहुसंख्यक जनता की जरूरतों को पूरा करने और गरीबों को इंसाफ दिलाने में सरकारों की विफलताओं ने निराशा का वातावरण बना दिया है। अच्छी बात यह है कि देश की न्यायपालिका जनता की उम्मीदों पर खरा उतर रही है।

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