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जीएसटी से ''एक देश एक टैक्स'' का सपना साकार

जीएसटी पर देश ही नहीं दुनिया की भी नजरें हैं।

जीएसटी से
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भारत 'एक देश एक टैक्स' के सपने को साकार करने की दहलीज पर है। अप्रत्यक्ष करों में सुधार की दिशा में मील का पत्थर माना जाने वाला विधेयक जीएसटी की आखिरी अड़चनें भी दूर होने के बाद इसके एक अप्रैल 2017 से देश भर में लागू होने की उम्मीद बढ़ गई है। हालांकि गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) विधेयक के मसौदे पर सहमति बनने में काफी वक्त लगा। एक अप्रैल 2010 से इसे लागू करने की योजना थी, लेकिन भाजपा और कांग्रेस के बीच अपनी-अपनी वजहों से राजनीति के चलते इसे मूर्त रूप लेने में और सात साल लग जाएंगे। आर्थिक दृष्टि से इस तरह की राजनीतिक देरी काफी नुकसानदेह साबित होती है।
राजनीतिक दलों को विरोध की राजनीति करते वक्त देशहित का ख्याल जरूर रखना चाहिए। जीएसटी पर देश ही नहीं दुनिया की भी नजरें हैं। क्योंकि अभी भारत ने अप्रत्यक्ष करों की जटिल प्रणाली है। कई प्रकार के टैक्स होने की वजह से लालफीताशाही हावी रहती है और वस्तुओं व सेवाओं का कॉस्ट बढ़ता है। केंद्र और राज्यों को मिला कर देश में करीब 17 तरह के अप्रत्यक्ष कर हैं। इसलिए जीएसटी की जरूरत महसूस की गई थी। पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय 2003 में जीएसटी का आइडिया पेश किया गया था।
लेकिन 2008-09 में डा. मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार के तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम की टीम ने जीएसटी का मॉडल बिल तैयार किया। चिदंबरम इसे एक अप्रैल 2010 से लागू करने की तैयारी में थे। लेकिन उस समय विपक्षी दल भाजपा और कुछ राज्यों के साथ कांग्रेस नीत सरकार की सहमति नहीं बन पाई थी। तब से यह बिल आम सहमति की बाट जोह रहा था। अब जब 2014 में भाजपा नीत सरकार बनी, तो नई सरकार जीएसटी पास कराना चाहती थी, लेकिन राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के चलते कांग्रेस सरकार की मंशा पूरी नहीं होने दे रही थी।
अंत में करीब छह संशोधन के साथ सभी दलों में सहमति बनी। अब जीएसटी लागू होने के बाद में देश में केवल तीन तरह के अप्रत्यक्ष कर रह जाएंगे। केंद्र सरकार द्वारा वसूले जाने वाले सेंट्रल जीएसटी (सीजीएसटी), राज्य सरकार द्वारा वसूले जाने वाले स्टेट जीएसटी (सीजीएसटी) मुख्य कर होंगे। तीसरा टैक्स इंटिगट्रेड जीएसटी (आईजीएसटी) होगा। यह टैक्स किसी कारोबार के दो या दो से अधिक राज्यों में रहने पर केंद्र सरकार द्वारा वसूल कर संबंधित राज्यों के बीच बराबर-बराबर बांटा जाएगा। जीएसटी के बाद चुंगी(अक्ट्राय), सेंट्रल सेल्स टैक्स (सीएसटी), एक्साइज, राज्य स्तर के सेल्स टैक्स या वैट, सर्विस टैक्स, एंट्री टैक्स, लॉटरी टैक्स, स्टैंप ड्यूटी, टेलीकॉम लाइसेंस फी, टर्नओवर टैक्स, बिजली के इस्तेमाल या बिक्री पर लगने वाले टैक्स, सामान के ट्रांसपोर्टेशन पर लगने वाले टैक्स इत्यादि खत्म हो जाएंगे।
जीएसटी में उत्पादन और सेवा दोनों पर लगने वाले करों को एक रूप प्रदान किया गया है। अभी टैक्स की दरें सात फीसदी से करीब 30 फीसदी तक है। अब यह एक दर 18 फीसदी होगा। मौजूदा टैक्स ढांचे में अलग-अलग जगहों पर टैक्स देय है, लेकिन जीएसटी के बाद केवल डेस्टिनेशन प्वाइंट पर ही टैक्स वसूला जाएगा। इससे उत्पादक और कंज्यूमर दोनों को लाभ होगा। भ्रष्टाचार पर अंकुश लेगा। देश की जीडीपी में करीब दो फीसदी की तेजी आ जाएगी। लेकिन राज्यसभा में पास होने के बावजूद जीएसटी की राह आसान नहीं है।
यह एक संविधान संशोधन बिल है। रास में संशोधन के साथ पास होने के चलते इसे फिर लोकसभा से पास कराना होगा। उसके बाद 15 राज्यों के विधानसभाओं से भी मंजूरी लेनी होगी। तक राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह लागू होगा। इस प्रक्रिया में अड़चन आई तो और देरी हो सकती है। लेकिन इसमें संदेह नहीं कि जीएसटी भारत में नए टैक्स युग की नींव रखेगा। तब डायरेक्ट टैक्स कोड की राह भी खुल सकती है।
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