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निशा सिंधु का लेख : गरीबों की सुध ले सरकार

पीएम (PM) ने 50 टॉप अधिकारियों से बात की है और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयासों पर चर्चा की है। इन सभी कदमों से आने वाले दिनों में देश की अर्थव्यवस्था (Economy) में निश्चित ही सुधार होगा, लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच्चाई है कि लॉकडाउन के चलते अर्थव्यवस्था की हालत खराब हुई और लाखों मजदूरों को पलायन करना पड़ा।

निशा सिंधु का लेख : गरीबों की सुध ले सरकार
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हमारे प्रधानमंत्री देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। कोरोना (Corona) के कारण लॉकडाउन के चलते पहले से ही सुस्त रफ्तार से चल रही अर्थव्यवस्था गहरे भंवर में है। सरकार ने अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक के आर्थिक पैकेज का ऐलान किया, जिसमें सभी वर्गों को राहत देने की कोशिश है।

उसके बाद भी पीएम (PM) ग्लोबल निवेश मंच को संबोधित कर चुके हैं, जिसमें भारत में निवेश की अपील की है। पीएम ने 50 टॉप अधिकारियों से बात की है और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयासों पर चर्चा की है। इन सभी कदमों से आने वाले दिनों में देश की अर्थव्यवस्था में निश्चित ही सुधार होगा, लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच्चाई है कि लॉकडाउन के चलते अर्थव्यवस्था की हालत खराब हुई और लाखों मजदूरों को पलायन करना पड़ा। लाखों लोगों का रोजगार चला गया। अब आने वाले वक्त सरकार के सामने इन्हें काम में लाना बड़ी चुनौती होगी।

22 मार्च के बाद से कोरोना संक्रमण की स्थिति लगातार बिगड़ी है। तमाम उपायों के बावजूद संक्रमितों की संख्या बढ़ती ही गई, जो अब 14 लाख पार कर गई है। मौतें भी लगातार बढ़ रही हैं। देश के ज्यादातर हिस्से महामारी की चपेट में हैं। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के अलावा सरकार ने भी मान लिया है कि हाल-फिलहाल में कोरोना से पीछा नहीं छूटने वाला है। ऐसी स्थिति में देश के आर्थिक हालात में जल्‍द कोई परिवर्तन होते नहीं दिखाई दे रही है।

अभी भी रेल, बसें पूरी तरह से चलनी शुरू नहीं हुईं हैं। कई सेक्‍टरों में काम शुरू नहीं हुआ है, जहां हुआ भी है, वहां मजदूरों की किल्‍लत का सामना करना पड़ रहा है। पलायन करके अपने गृह राज्‍य पहुंच चुके मजदूर वापस काम पर आने में हिचक रहे हैं। एक तरफ महामारी का खौफ है तो दूसरी तरफ गरीबों व मजदूरों को अपनी तंगहाली का भय है। सरकार बेशक मनरेगा का दावा करे, लेकिन लॉकडाउन के चलते बेरोजगारी के शिकार बने करोड़ों लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट बरकरार है। उन सबको मनरेगा में खपाना संभव नहीं है। नियमित तौर पर जिनकी कमाई-धमाई नहीं बची है और अगर यह सिलसिला लंबा चलता है तो बड़ा सवाल है कि जिंदगी कैसे चलेगी।

लॉकडाउन में आर्थिक चक्र ऐसा टूटा है कि गरीबों, मजदूरों की जिंदगी आसानी से पटरी पर लौटती नहीं दिख रही है। उनकी दशा खस्ताहाल है। उनका क्या होगा, जिनकी जवानी में ही नौकरियां छूटी हैं। आज अगर पाकिस्‍तान व चीन सीमा पर सैन्‍य मजबूती जरूरी है तो देश के अंदर रोजी-रोटी के मोहताज गरीबों की फिक्र भी जरूरी है। सरकार को केवल योजना बना कर नहीं बैठ जाना चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उसका क्रियान्‍वयन ठीक हो रहा है या नहीं।

आने वाले समय में वह भयावह परिदृश्य जो सिविल सोसायटी, सियासतदानों व शासन-प्रशासन की आंखों से ओझल है, वो है भूख और बेहाली से होने वाली मौतें। समय रहते अर्थव्‍यवस्‍था सुचारू नहीं हो सकी तो कोरोना पर भूख भारी पड़ेगी। यह कैसी विडंबना है कि अरबपतियों की मायानगरी की कशमकश, संत्रास और कुंठा से हुई कोई एक मौत या आत्महत्या पूरे देश की संवेदना को आहत कर देती है, लेकिन लॉकडाउन के बाद गुरुग्राम के बेरोजगार हो चुके युवा की आत्महत्या की खबर खामोश ढंग से आती है और उसी तरह चली जाती है। गरीबों की मौत तो नोटिस तक नहीं होती।

पीछे हमने देखा कि गुजरात से बिहार आने वाली श्रमिक एक्सप्रेस से आ रही एक महिला ने अपने गंतव्य तक पहुंचने से पहले ही भूख और बीमारी से दम तोड़ दिया। दूधमुंहा बच्चा अपनी मां को जगाने-उठाने की कोशिश करता दिखता है। ये उदाहरण पलायन की त्रासदी व गरीबों के प्रति संवेदनहीनता बयां करने के लिए काफी हैं। आज अगर देखा जाए तो राफेलों, चिनुकों, जगुआरों, मिराजों, तेजसों और सुखोइयों की दहाड़ से महाशक्ति बनने का दंभ भरने वाले भारत के पास भूख और बीमारी के इलाज का सर्वसुलभ तंत्र ही नहीं है।

वायरस-संक्रमण की जांच कराने के लिए भी यहां मोटी रकम चुकानी पड़ रही है। आखिर इस सच्चाई के साथ आत्मनिर्भर भारत का आह्वान खोखला लगता है। सामरिक मजबूती के साथ-साथ हमें अर्थव्‍यवस्‍था में तेजी सुधार के लिए कदम भी उठाने चाहिएं। इसके साथ ही सरकार को शिक्षा-स्‍वास्‍थ्‍य, बिजली-पानी, इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर, विनिर्माण और कृषि व संबद्ध क्षेत्रों पर फोकस करना चाहिए।

अगर हमारे पास अच्‍छे, पर्याप्‍त अस्‍पताल नहीं हैं, अच्‍छे स्‍कूल, कालेज व शोध संस्‍थान नहीं हैं, सबकी पहुंच में पेयजल, बिजली व सड़क नहीं हैं, गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा का तंत्र नहीं है, आम लोगों के लिए सर्वसुलभ न्‍याय नहीं है, तो आखिर हम लोक कल्‍याणकारी राज्‍य कैसे हैं। केवल नारों, ऐलानों, पैकेजों, अपीलों व वादों से तो परिवर्तन नहीं आएगा। लॉकडाउन के दौरान गरीबों व मजदूरों के साथ हुआ कुव्‍यवहार देखकर लगा कि हमने 70 साल में कैसा भारत बनाया है।

सड़कों पर मजदूरों का मंजर भयावह था। सरकार केवल गरीबों की भलाई का योजनाओं में दिखावा न करे बल्कि गरीबों-मजदूरों के वास्‍तविक व समग्र उत्‍थान के लिए काम करे, तभी गांधी-आंबेडकर-पटेल के सपनों का भारत साकार रूप लेगा।

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