Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

अरविंद जयतिलक लेख : ब्रिक्स से साधे ग्लोबल एजेंडे

हाल ही में हुए 12वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो टूक कहा कि हमें यह सुनिश्चित करने की दरकार है कि आतंकियों का समर्थन और मदद करने वाले देशों को भी दोषी ठहराया जाए। निश्चित रूप से ब्रिक्स ने कम समय में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन उसके समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं है। देश-दुनिया के सामने उसके सदस्य देशों का आपसी विवाद जगजाहिर है। अगर इसे दूर नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में ब्रिक्स के समक्ष कई किस्म की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। भारत के साथ चीन का सीमा विवाद और तनाव, पाक के संदर्भ में उसकी भारत विरोधी नीति ब्रिक्स के उद्देश्यों को प्रभावित कर सकता है।

अरविंद जयतिलक लेख : ब्रिक्स से साधे ग्लोबल एजेंडे
X

अरविंद जयतिलक

उभरती विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के सशक्त समूह ब्रिक्स का 12वां शिखर सम्मेलन संपन्न हो गया। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद को दुनिया के लिए सबसे बड़ी समस्या बताते हुए दो टूक कहा कि हमें यह सुनिश्चित करने की दरकार है कि आतंकियों का समर्थन और मदद करने वाले देशों को भी दोषी ठहराया जाए। गौर करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीधा इशारा सम्मेलन में उपस्थित चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग की ओर था जो परोक्ष रूप से आतंकवाद के गढ़ बन चुके पाकिस्तान की मदद कर रहे हैं। आतंकवाद के मुद्दे को गंभीरता से उठाने के साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद समेत विश्व व्यापार संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन संस्थाओं की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ब्रिक्स देशों द्वारा जारी घोषणा पत्र में आतंकवाद से निपटने के लिए एक समग्र रुख पर हामी भारत के लिए बड़ी उपलब्धि है। घोषणा पत्र में कहा गया है कि आतंकी गतिविधियों की रोकथाम के लिए समूचे अंतरराष्ट्रीय समुदाय को व्यापक और संतुलित नजरिया अपनाने की जरूरत है और इसके लिए संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक निकायों में सुधार की जरूरत है। याद होगा चीन के शियामेन शहर में संपन्न नौवें शिखर सम्मेलन में भी भारत ने आतंकवाद का मसला जोर-शोर से उठाया था और उसके कहने पर ही पाकिस्तान पोषित आतंकवादी संगठनों जैश-ए-मोहम्मद, हक्कानी नेटवर्क और तालिबान पर नकेल कसने की सहमति बनी थी।

भारत के आह्वान पर ही ब्रिक्स सदस्य देशों ने आतंकवाद से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय आतंकवादरोधी गठबंधन की वकालत की थी। 12वें शिखर सम्मेलन में आतंकवाद से निपटने की चुनौती पर विमर्श के साथ-साथ आर्थिक मसलों पर भी सदस्य देशों के बीच व्यापक विमर्श हुआ है। सम्मेलन में सदस्य देशों के बीच व्यापार-कारोबार क्षेत्र में एक-दूसरे की मदद, विकास परियोजनाओं का मदद की प्रक्रिया तेज करने, आपसी सहयोग से मौद्रिक नीति को अनुकूल बनाने, प्राकृतिक संपदा का संरक्षण तथा पर्यावरण सुरक्षा के प्रति संवेदनशील रुख अपनाने पर सहमति बनी है। निःसंदेह इस पहल से ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच आपसी तालमेल बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। ब्रिक्स संगठन की उपलब्धियों और चुनौतियों पर नजर दौड़ाएं तो 2009 में रूस के शहर येकाटेंरिनवर्ग से शुरू हुई यह यात्रा उपलब्धिसों से भरपूर रही है। चूंकि ब्रिक्स के सदस्य देश आने वाले समय की उभरती हुई शानदार अर्थव्यवस्थाएं हैं और ऐसे में वे चार दशक बाद अमेरिका और यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्थाओं को पीछे छोड़ देते हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ब्रिक्स के शिखर सम्मेलनों पर गौर करें तो डरबन शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने आपातकालीन स्थिति में ऋण संकट से उबरने के लिए 100 बिलियन डाॅलर का एक आपातकालीन कोष बनाने का सपना देखा और उसे फोर्टलेजा सम्मेलन में साकार कर दिया। इसमें चीन ने सबसे अधिक 41 अरब डाॅलर और दक्षिण अफ्रीका सबसे कम 5 अरब डाॅलर दिया। भारत, रूस और ब्राजील सभी ने 18-18 अरब डाॅलर देने की घोषणा की। याद होगा सदस्य देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष में मतदान करने वाली विधि में संरचनात्मक परिवर्तन पर भी जोर दिया जा चुका है।

ब्रिक्स सदस्य देशों ने 2012 में दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन के आयोजन से पहले ब्रिक्स अकादमिक फोरम में विकास बैंक बनाने पर विचार किया और दो साल बाद उसे फोर्टलेजा सम्मेलन में मूर्त रूप दिया। यह संशय निराधार साबित हुआ कि चीन अपनी आर्थिक ताकत के बूते विकास बैंक में बड़ी हिस्सेदारी के लिए सदस्य देशों पर दबाव बनाने में कामयाब रहेगा। उल्लेखनीय है कि ब्रिक्स देशों के पास विश्व का 25.9 फीसदी भू-भाग एवं 40 फीसदी आबादी है। विश्व में सकल घरेलू उत्पाद में इनका योगदान 15 फीसदी है। आंकड़ों पर गौर करें तो विश्व में निरपेक्ष सकल घरेलू उत्पाद में ब्रिक्स देशों चीन, रूस, ब्राजील तथा भारत की स्थिति तीसरा, दसवां एवं बारहवां है। इसमें चीन का सकल घरेलू उत्पाद 4.4 मिलियन, रूस का 1.67 मिलियन, ब्राजील का 1.57 और भारत का 1.2 मिलियन डाॅलर है। अच्छी बात यह है कि ब्रिक्स देशों की आर्थिक ताकत लगातार बढ़ रही है, लेकिन राजनीतिक व कूटनीतिक नजरिए से देखें तो ब्रिक्स वर्तमान मत प्रणाली में ब्रिक्स देशों के मत देने का अधिकार उनकी आर्थिक शक्ति के लिहाज से काफी कम है। कहना गलत नहीं होगा कि ब्रिक्स देशों के पास प्रचुर मात्रा में संसाधन हैं, जिससे वे एक-दूसरे का सहयोग कर आर्थिक विकास को नई दिशा दे सकते हैं। ।

उम्मीद जताई जा रही है कि 2050 तक ब्रिक्स देशों की स्थिति और अधिक मजबूत होगी। चीन 70.71 मिलियन डाॅलर के साथ पहले, भारत 37.66 मिलियन डाॅलर के साथ तीसरे, ब्राजील 11.36 मिलियन डाॅलर के साथ चौथे और रूस का 8.58 मिलियन डाॅलर के साथ छठे पायदान पर होगा। निश्चित रूप से ब्रिक्स ने कम समय में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं लेकिन उसके समक्ष चुनौतियां भी कम नहीं है। देश-दुनिया के सामने उसके सदस्य देशों का आपसी विवाद जगजाहिर है। अगर इसे दूर नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में ब्रिक्स के समक्ष कई किस्म की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। भारत के साथ चीन का जटिल सीमा विवाद और तनाव, पाकिस्तान के संदर्भ में उसकी भारत विरोधी नीति और दक्षिण चीन सागर में हाइड्रोकार्बन संपदा के प्रति उसका साम्राज्यवादी रवैया ब्रिक्स के उद्देश्यों को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि भारत और चीन दोनों देशों के बीच आपसी सहमति से सीमा पर तनाव को खत्म करने का प्रयास किया जा रहा है लेकिन चीन के बार-बार बदलते रुख को लेकर उस पर भरोसा करना कठिन होता जा रहा है, लेकिन भारत की अनदेखी करना उसके लिए आसान नहीं होगा। ऐसा इसलिए भी कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी ब्रिक्स के अन्य सभी देशों के अलावा दुनिया के ताकतवर देशों से रिश्ते प्रगाढ़ करने में कामयाब हुए हैं। अमेरिका से निकटता के बावजूद भी रूस और भारत के बीच आपसी सामंजस्य बना हुआ है। रुस आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत का साथ देने की कई बार प्रतिबद्धता जता चुका है। निःसंदेह आतंकवाद पर ब्रिक्स देशों के समान दृष्टिकोण से दक्षिण एशिया में शांति, सहयोग और आर्थिक विकास का वातावरण निर्मित होगा। कहना गलत नहीं होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर ब्रिक्स देशों ने आतंकवाद के मसले पर एकजुटता बनाए रखने का संकल्प जाहिर कर अपनी भूमिका को एक नया तेवर दिया है। लेकिन सच यह भी है कि ब्रिक्स देशों को एक-दूसरे की सहयोग करने की असल चुनौती और अग्निपरीक्षा से गुजरना अभी बाकी है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Next Story