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अवधेश कुमार का लेख: आतंक को दो माकूल जवाब

प्रधानमंत्री ने कहा है कि इन जवानों के बलिदान को हम नहीं भूलेंगे। हो सकता है आने वाले समय में आतंकवाद लक्षित कुछ कार्रवाई हो। कोरोना संघर्ष में हमारी संलग्नता का इस तरह का दुष्टतापूर्ण लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके लिए आंतरिक स्थिति को संभालना बहुत जरूरी है। जिस तरह की त्रुटिविहीन सुरक्षा सख्ती तथा जन सेवा की नीति अपनाकर पिछले वर्ष अगस्त से स्थिति को संभाला गया था उसकी पुनरावृत्ति करनी होगी। आतंक को जवाब देना होगा।

अवधेश कुमार का लेख: आतंक को दो माकूल जवाब
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जम्मू कश्मीर के हंदवाड़ा में तीन दिनों के अंदर दो बड़े आतंकवादी हमलों में आठ जवानों के बलिदान ने फिर एक बार देश में उबाल पैदा कर दिया है। पहले हमले में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में पांच जवानों का बलिदान हुआ तो दूसरे हमले में सीआरपीएफ के तीन जवान बलि चढ़े और श्रीनगर में सीआईएसफ की पेट्रोलिंग पार्टी पर हमला हुआ जिसमें एक जवान घायल हो गया। जब पूरा देश यह मानकर चल रहा था कि जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के दिन लग गए उसमें इन हमलों ने सोचने को विवश कर दिया है कि क्या आतंकवाद फिर से सिर उठा रहा है?

आरंभ पहली घटना से करें। चार आतंकवादियों के छिपे होने की सूचना मिलने पर सेना की राष्ट्रीय राइफल ने पुलिस के साथ मिलकर संयुक्त ऑपरेशन शुरु किया। अलग-अलग टीम आतंकवादियों को ढूंढ़ रही थी। दूसरे दिन एक टीम ठीक जगह पर पहुंच गई, लेकिन मुठभेड़ के बीच आतंकवादी भागने में सफल हो गए। दोपहर जब 21 राष्ट्रीय राइफल के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल आशुतोष शर्मा के नेतृत्व में उनकी टीम तलाश कर रही टीमों को कॉर्डिनेट कर रही थी तो उन्हें एक घर में आतंकवादियों के होने तथा कुछ लोगों को बंधक बनाने की जानकारी मिली। इन लोगों ने बंधकों को बाहर निकाल लिया, लेकिन छिपे हुए आतंकवादियों की ताबड़तोड़ गोलीबारी का शिकार हो गए। इनका संपर्क डिवाइस क्षतिग्रस्त हो गया था। लेकिन जिस दूसरी टीम ने घर को घेर रखा था, उसे कर्नल के मोबाइल पर फोन करने पर ट्रेजेडी का अंदाजा हो गया था क्योंकि दो बार उस फोन से सलाम वालेकुम की आवाज आई। अंदर जो भी हुआ हो, यह साफ है कि उन वीरों ने जान देकर बंधकों को मुक्त कराया और दो आतंकवादी मारे गए।

हमने जम्मू-कश्मीर में पांच साल बाद आतंकवादी मुठभेड़ में कमांडिंग ऑफिसर खोया है। 2015 में कुपवाड़ा के हाजीनाका जंगल में आतंकवादी मुठभेड़ में 41 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल संतोष महाडिक शहीद हुए थे। 27 जनवरी 2015 को 42 राष्ट्रीय राइफल्स के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल एमएन राय कश्मीर के त्राल में मुठभेड़ के दौरान शहीद हुए थे। इससे पहले वर्ष 2000 में आतंकवादियों के बारुदी सुरंग विस्फोट में 21 आरआर के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल रजिंदर चौहान ब्रिगेडियर बीएस शेरगिल और पांच जवानों के साथ शहीद हुए थे। आतंकवादियों और उनके आकाओं के बीच इससे जश्न का माहौल रहा होगा। इससे उनका हौंसला भी बढ़ा होगा कि हमने सेना को बड़ी क्षति पहुंचा दी है। ध्यान रखिए, 21 राष्ट्रीय राइफल्स का मुख्यालय हंदवाड़ा में ही है, जो कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में पड़ता है। यह आतंकवादियों के जश्न का दूसरा कारण होगा। दूसरी और तीसरी घटना तो सीधी चुनौती है। आतंकवादियों ने नाके पर हमला कर जवानों हताहत किया और तत्काल भागने में सफल हो गए।

इन घटनाओं का गहराई से विश्लेषण जरुरी है। माना जा रहा है कि आतंकवादी पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से घुसपैठ करने वाले एक समूह को लेने के लिए हंदवाड़ा पहुंचे थे। यह घुसपैठ कर आने वाले आतंकवादियों का रिसेप्शन क्षेत्र भी है। यानी जब आतंकवादी नियंत्रण रेखा से घुसपैठ कर आते हैं तो इस क्षेत्र में उन्हें अंदर मौजूद आतंकवादी रीसीव करते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि दूसरे आतंकवादी भी वहां होंगे जो घुसपैठ कर आए। उनके लिए सर्च ऑपरेशन चल रहा था और इसी बीच दूसरा हमला हो गया। अप्रैल-मई में पाकिस्तान सबसे ज्यादा घुसपैठ कराने की कोशिशंे करता है, क्योंकि इस मौसम में एंटी इन्फिल्ट्रेशन ऑब्स्टकल सिस्टम यानी घुसपैठ रोधी बाधा प्रणाली को ढंकने वाली बर्फ पिघलने लगती है। इसके लिए पाकिस्तान युद्धविराम का उल्लंघन कर गोलीबारी की आड़ देता है जिसके कारण आतंकवादी घुसपैठ करने में सफल होते हैं। साफ है कि दुनिया भले कोरोना प्रकोप से बाहर आने के लिए संघर्ष कर रही हो, पाकिस्तान भी इसमें फंसा हुआ है, लेकिन यह कश्मीर में आतंकवादी को निर्यात करने से बाज नहीं आ रहा है।

हालांकि इस वर्ष आतंकवादियों के खिलाफ संघर्ष में सफलताएं हैं। जनवरी से अब तक मुठभेड़ों में 62 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए हैं। केवल 1 अप्रैल से अब तक 30 आतंकी मारे गए हैं। अगर खुफिया रिपोर्ट को मानें तो आतंकवादियों के नेटवर्क की भारी तबाही हुई है और उनके मददगार ओवर ग्राउंड वर्करों पर दबाव है। पाकिस्तान दक्षिण कश्मीर से ले जाकर उत्तर कश्मीर में आतंकवादियों को सक्रिय करना चाहता है। इसके लिए वह घुसपैठ की कोशिशें लगातार उत्तर से कर रहा है। हमारे जवान इन आतंकवादियों का काम तमाम करेंगे इसमें किसी के संदेह नहीं है। लेकिन यह स्वीकारने में आपत्ति नहीं है कि 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाने के पूर्व उठाए गए ऐतिहासिक सुरक्षा कदमों के कारण आतंकवादी घटनाएं जिस तरह रुकीं थीं, शांति आ रहीं थीं उस स्थिति में गिरावट आई है। उस कदम के बाद पाकिस्तान के रवैये से साफ था कि वह हर हाल में कश्मीर को जलाने की जितनी कोशिश कर सकता है करेगा। इसलिए जम्मू कश्मीर विशेषकर कश्मीर घाटी मेें लगाई गई बंदिशों को कुछ समय तक जारी रखा जाना आवश्यक था। जब आप मोबाइल और नेट आदि चालू करते हैं, अन्य बंदिशें हटाते हैं तो उसका लाभ आतंकवादी और सीमा पर उनके प्रायोजक उठाते हैं। भारत के पास इससे बड़ा अवसर जम्मू कश्मीर में शांति स्थापना का नहीं हो सकता। इसलिए बिना भावुकता में आए तथा दबावों से अप्रभावित रहते हुए सरकार को फिर से वे सारे आवश्यक बंदिशंे कुछ समय के लिए लागू करनी चाहिए जिनका लाभ आतंकवादी, उनके समर्थक और सीमा पार के उनके प्रायोजक उठाते हैं।

इसके बाद आता है कूटनीति और सीमा पार कार्रवाई का। भारत ने गिलगिट बाल्तिस्तान सहित पाक अधिकृत कश्मीर को खाली करने की जो मांग की है उसे सघन कूटनीति के रुप में सतत जारी रखा जाए। सर्जिकल स्ट्राइक और वायुयान स्ट्राइक जैसे सीमा पार आतंकवाद विरोधी लड़ाई में इतिहास का अध्याय लिखने की दो बड़ी कार्रवाई हम कर चुके हैं। प्रधानमंत्री ने कहा है कि इन जवानों के बलिदान को हम नहीं भूलेंगे। हो सकता है आने वाले समय में आतंकवाद लक्षित कुछ कार्रवाई हो। कोरोना संघर्ष में हमारी संलग्नता का इस तरह का दुष्टतापूर्ण लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। किंतु इसके लिए आंतरिक स्थिति को संभालना बहुत जरुरी है। जिस तरह की त्रुटिविहीन सुरक्षा सख्ती तथा जन सेवा की नीति अपनाकर पिछले वर्ष अगस्त से स्थिति को संभाला गया था उसकी पुनरावृत्ति करनी होगी। मानवाधिकार के नाम पर अलगाववादियों तथा वहां के परंपरागत नेताओं के समर्थक तथाकथित लेफ्ट लिबरलों को छोड़कर पूरा देश कश्मीर मामले में सरकार के साथ खड़ा है।

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