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विवेक सक्सेना का लेख : जी-23 व कांग्रेस मुक्त विकल्प

दो मई को पूरे देश की नजर पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों पर होगी किन्तु कांग्रेस ओर कांग्रेसियों की नजर शेष चार राज्यों के चुनाव परिणामों पर होगी। इन चारों राज्यों असम,केरल, तमिलनाडु और पांडिचेरी में कांग्रेस के लिए सम्भावना है। इन चार राज्यों के चुनाव परिणामों के अनुसार जी-23 अपनी रणनीति तय करेगा।यदि नतीजे कांग्रेस के अनुकूल आये तो जी-23 को अपने कदम वापस ले लेंगे, किन्तु यदि परिणाम विपरीत आये तो क्या होगा यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।

विवेक सक्सेना का लेख :  जी-23 व कांग्रेस मुक्त विकल्प
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विवेक सक्सेना

विवेक सक्सेना

2 मई को पूरे देश की नजर पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों पर होगी किन्तु कांग्रेस ओर कांग्रेसियों की नजर शेष चार राज्यों के चुनाव परिणामों पर होगी। इन चारों राज्यों असम,केरल, तमिलनाडु और पांडिचेरी में कांग्रेस के लिए सम्भावना है। इन चार राज्यों के चुनाव परिणामों के अनुसार जी-23 अपनी रणनीति तय करेगा। यदि नतीजे कांग्रेस के अनुकूल आये तो जी-23 को अपने कदम वापस ले लेंगे, किन्तु यदि परिणाम विपरीत आये तो क्या होगा यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। यद्यपि कांग्रेस में गांधी परिवार की प्रति भक्ति और सत्ता की चाह की जड़ें बहुत गहरी हैं। चार राज्यों में परिणाम कांग्रेस के प्रतिकूल आते हैं तो भी सम्भावना है तो पूरी कांग्रेस गांधी परिवार के पीछे खड़ी नजर आएगी और यदि परिणाम अनुकूल आये तब तो श्रेय गांधी परिवार को देने की होड़ होगी ही। देखा जाय तो वास्तव में दोनों परिस्थितियों में जी-23 के करने के लिए बहुत कुछ नहीं है। उनके पास दो ही विकल्प रहेंगे। या तो अपने कदम पीछे लेकर पुनः एक बार गांधी शरणम गच्छामि हो जाएं और अपने निर्वासन के काल में चले जायें या एक्स, वाई, जेड शब्द जोड़कर एक नई कांग्रेस बना लें, और कुछ दिनों की सुर्खियां बटोरकर गुमनामी में खो जाएं। वास्तव में देश को एक मजबूत विपक्ष देने की इच्छा जिन राजनीतिज्ञों में होगी उन्हें जोड़-तोड़ और शॉर्टकट की नीति त्यागनी होगी, दीर्घकालीन अपनानी होगी।

वास्तव में ऐसे लोगों को जनसंघ से लेकर आज की भाजपा की यात्रा का गहन अध्ययन करना चाहिए और उसी अनुरूप मार्ग पर चलना चाहिए। जी-23 इस दृष्टि से बहुत उपयुक्त समूह है। उनके पास दृष्टि है, अनुभव है,पहचान है और असीम क्षमताएँ हैं। बस उनको दो-तीन महत्वपूर्ण बातें करना होंगी- 1. तत्काल सत्ता की चाहत छोड़नी होगी। 2. नया राजनीतिक दल बनाते समय कांग्रेस नाम का मोह त्यागना होगा। 3. एक पार्षद भी अपने दम पर नहीं जीता सकते, इस छवि से मुक्त होना होगा। प्रारम्भ में जनसंघ के उम्मीदवार जमानत बचाने के लिए चुनाव लड़ते थे। आज उसी जनसंघ की नई अवतार भाजपा केंद्र में ना केवल सत्तारूढ़ है, बल्कि अपने प्रभाव क्षेत्र को तेजी से बढ़ाते जा रही है। पश्चिम बंगाल में तो उसने अपनी जड़ें जमा ही ली हैं, इसी तर्ज पर उसका अगला लक्ष्य तमिलनाडु और केरल होगा। जी-23 को इसी तर्ज पर एक लंबी रणनीति के तहत धैर्यपूर्वक एक नई पार्टी को आगे बढ़ाना चाहिए।

जी-23 को कांग्रेस नाम का मोह भी इसलिए छोड़ना चाहिए, क्योंकि कांग्रेस द्वारा कई ऐतिहासिक भूलों, गलतियों का भारी-भरकम बोझ किसी भी नई कांग्रेस पर भी आ पड़ता है व कांग्रेसी कल्चर से मुक्त नहीं हो पाती है। भारत विभाजन का दोष, कश्मीर का विलय और धारा 370, चीन के प्रति नीति, आपातकाल, ऑपरेशन ब्लू स्टार और सिख नरसंहार, मुस्लिम तुष्टिकरण और शाहबानो प्रकरण, भ्रष्टाचार आदि। इसके अलावा वामपंथियों को पीछे के दरवाजे से सत्ता का लाभ देकर इतना ताकतवर बनाना कि वे इतने उद्दंड हो गए कि सरेआम 'देश के टुकड़े होंगे इंशाल्लाह इंशाल्लाह' कहने का दुस्साहस कर गए। आज भी कांग्रेस को वामपंथी चला रहे हैं,यह आम धारणा है। ये सब कांग्रेस नाम पर ही बोझ हैं। जी-23 को यह ध्यान में लेना चाहिए कि नारायण दत्त तिवारी, अर्जुनसिंह, ममता बनर्जी ओर शरद पवार आदि ने जो कांग्रेस बनाई उनका क्या हश्र हुआ है। असली नकली कांग्रेस की लड़ाई से मुक्त होकर एक नया राजनीतिक दल जी-23 को बनाना चाहिए। नया नाम, नई विचारधारा और नई कार्य संस्कृति। याद रहे 1978-979 में जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता के विवाद के पश्चात जनसंघ घटक ने जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी के नाम से नया दल बनाया, जनसंघ को पुनर्जीवित नहीं किया। भाजपा ने जनसंघ की विरासत से आज भी जोड़कर रखा है।

वास्तव में आज कांग्रेस ऐसा भवन है जिसकी विशालता तो है किंतु नींव से लेकर शिखर तक इतनी जर्जर हो चुकी है कि उसका पुनर्निर्माण (रिनोवेशन) नहीं हो सकता, नव निर्माण ही करना होगा। जी-23 के लिए कांग्रेस में अब बहुत कुछ बचा नहीं है। हां, यदि वे इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाना चाहते हैं तो उन्हें एक नए दल का गठन करना चाहिए। जी-23 में बहुत लोगों में जन नेता बनने की क्षमता है। जी-23 के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि वे 23 हैं। वे अकेले नारायणदत्त तिवारी, अर्जुन सिंह, शरद पवार या ममता दीदी नहीं है। ना ही वे किसी एक प्रांत, भाषा या जाति से हैं। यही उनकी ताकत है। वे अपनी ताकत को पहचानें तथा भारत के भविष्य को गढ़ने में अपना योगदान दें।

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