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सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विचारों की स्वतंत्रता पर इसका दुरुपयोग न हो

आपत्तिजनक सामग्री दिखती है तो लिखने वाले के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की आम धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करवाया जा सकता है और कार्रवाई भी हो सकती है।

सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विचारों की स्वतंत्रता पर इसका दुरुपयोग न हो
सोशल मीडिया पर अभिव्यक्त किए गए किसी विचार को विवादास्पद ठहरा कर जिस आईटी एक्ट की धारा 66ए के तहत कार्रवाई होती थी, उसे सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने का काम किया है। इस फैसले का मतलब ये है कि पहले पुलिस को सोशल मीडिया पर किसी भी कमेंट या कुछ भी लिखने पर (यदि वह आपत्तिजनक है) किसी को भी तुरंत गिरफ्तार करने का अधिकार था, लेकिन अब वो अधिकार खत्म हो गया है। हालांकि इसका मतलब ये भी नहीं है कि लोगों को सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखने की छूट मिल गई है।
अगर उस पर कोई आपत्तिजनक सामग्री दिखती है तो लिखने वाले के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की आम धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज करवाया जा सकता है और कार्रवाई भी हो सकती है। इस प्रकार किसी को भी बिना सोचे समझे कुछ भी कमेंट करने की आजादी नहीं होगी। दरअसल, संविधान का अनुच्छेद 19(1)ए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। वहीं अनुच्छेद 19(2) में नागरिकों के इस अधिकार पर तार्किक पाबंदी का प्रबंध किया गया है, लेकिन आईटी एक्ट की धारा 66ए संविधान के दायरे से बाहर जाती हुई प्रतीत होने लगी थी। आईटी एक्ट 2000 में बना, लेकिन इसमें 2008 में बदलाव हुए थे। इसके बाद से ही धारा 66ए विवादों में आ गई। क्योंकि सूचना तकनीकी पर आधारित किसी भी संचार माध्यम से भेजा जाने वाला संदेश अगर आपत्तिजनक है तो इस धारा के तहत गिरफ्तारी हो सकती थी, लेकिन इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि आपत्तिजनक क्या होगा। इसी की आड़ लेकर बीते कुछ सालों से इस धारा का सोशल मीडिया पर विचार व्यक्त करने से रोकने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगा था।
इसका खुलकर दुरुपयोग होने लगा था। अधिकतर गिरफ्तारियां राजनीतिक प्रभाव में ही हुई हैं। हाल में ही उत्तर प्रदेश में आजम खान के खिलाफ फेसबुक पर एक कमेंट को लेकर पुलिस ने एक छात्र को गिरफ्तार किया था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ एक कार्टून बनाने पर पुलिस ने प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा को गिरफ्तार कर लिया था। असीम त्रिवेदी ने फेसबुक पर केंद्र सरकार के खिलाफ एक कार्टून पोस्ट किया था, जिसके बाद उन्हें इसी धारा के तहत गिरफ्तार किया गया था। बाल ठाकरे पर कमेंट के कारण 2012 में दो लड़कियों शाहीन और रीनू की गिरफ्तारी हुई थी। इनकी गिरफ्तारी के बाद देशभर में विरोध जताया गया। सुप्रीम कोर्ट में इसके खिलाफ कई याचिकाएं दायर की गई थीं।
हालांकि केंद्र सरकार इस धारा को रद करने की बजाय इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए नई गाइडलाइन लाने के पक्ष में थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वर्तमान में यह भारतीय नागरिकों के मूल अधिकार का उल्लंघन कर रही है। इसीलिए इसे बनाए रखना संविधान का विरोध होगा। जाहिर है, इसके बाद लोग सोशल मीडिया पर खुलकर विचार रखेंगे। हालांकि लोगों को भी अपनी बात मर्यादा में रहकर कहनी चाहिए। उनका ध्येय विचार व्यक्त करना और निष्पक्ष आलोचना करना होना चाहिए न कि दूसरों को बदनाम करना, नफरत फैलाना और मिथ्या प्रचार करना।
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