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कर्ज माफी होते ही खेतों में आई हरियाली

ये कैसी सरकार है रे होरी! अपना वचन निभा रही है। एक्शन से पहले ही एक्शन मोड में आ रही है। तय सीमा से पहले ही अपना वचन निभा रही है या कि किसानों को एक बार फिर उल्लू बना रही है। वैसे यहां उल्लू बनना कौन सी नई बात है।

कर्ज माफी होते ही खेतों में आई हरियाली

वे पांच साल से आराम की मुद्रा में थे। वे पांच साल जाम की मुद्रा में थे। वे पांच साल से ताक की मुद्रा में थे। वे पांच साल से फिराक की मुद्रा में थे। पर आराम जाम में भी इंतकाम की मुद्रा में थे। कुर्सी इंतकाम की जननी है। राजनीति में जब जब किसी का मन किसी से इंतकाम लेने के लिए करता है तो वह पहला वार उसकी कुर्सी पर करता है।

कुर्सी पर बैठे को कुर्सी से गिराने का पहला हथियार वोटर है। नेता पीछे रहता है, वह केवल वोटर को ललकारता है। जिसने किसी पर वोटर को ललकारने का हुनर सीख लिया, समझो उसने हारा हुआ चुनाव भी जीत लिया। यह नेता बबने की पहली कला है या फिर यूं भी कह सकते हैं कि यह नेता बनने की पहली सीढ़ी है।

अबके उन्होंने तय कर लिया था कि जो वे अबके सत्ता में आ जाएं तो तबाही मचाकर रख देंगे। उनकी तो उनकी, अपनी भी ईंट र्से ईंट बजाकर रख देंगे। इसके लिए उन्होंने जनता में डटकर सपनों के चश्मे बांटे। उनसे हटकर सपनीले चश्मे बांटे। हर किस्म के सपनों के चश्मे बांटे। हर जात के सपनों के चश्मे बांटे। हर वर्ग के सपनों के चश्मे बांटे।

हर जिस्म के सपनों के चश्मे बांटे। ऐसे चश्मे बांटे कि जो जनता की आखों में बिलकुल फिट हो जाएं। आखिर में जनता की आंखों पर सपनों के चश्मे लगाने में कामयाब रहे। हर कोई उनके चश्मों की रंगीनी में खोया नजर आने लगा और वे सरकार में आ गए। सरकार में आते ही इधर उन्होंने शपथ ली तो उधर एक्शन मोड में।

सबने कहा, जनाब तनिक रूकिए! इत्ते दिनों तक चुनाव में बका है। जरा गला तो समूद कर लीजिए। कुछ इधर का पीजिए, कुछ उधर का पीजिए। पर नहीं, वे एक्शन मोड में थे तो बस एक्शन लेना चाहते थे। सो उनके एक्शन मोड में आते ही चारों ओर हाहाकार मच गया। चमत्कार! घोर चमत्कार! पार्टी के खजाने से नहीं, अपने वेतन,

पैंशन में से तो वे टैक्स भी नहीं देते, दूसरों की जेबें फाड़ अपनी वाहीवाही के लिये किसानों के कर्ज माफ करने के वचन पर तत्काल अपने एक्शन की मुहर लगाते किसानों की कर्ज की फाइल पर पहला हमला मारा तो किसान सन्न, प्रसन्न! ये क्या मेरे बाप! तबाही! ये कैसी सरकार है रे होरी! अपना वचन निभा रही है। एक्शन से पहले ही एक्शन मोड में आ रही है।

तय सीमा से पहले ही अपना वचन निभा रही है या कि किसानों को एक बार फिर उल्लू बना रही है। वैसे यहां उल्लू बनना कौन सी नई बात है। बुरा तो तब लगता है जब कोई उल्लू बनाए बिना बगल से चुपचाप सिर नीचा किए चला जाता है। किसानों के कर्जों की माफी की फाइल पर साइन होते ही कर्जों के बोझ से आत्महत्या किए किसानों की आत्माएं एक बार फिर उनके राज में जन्म लेने को मचलने लगीं।

काश! उन्होंने आत्महत्या करने से पहले जरा चुनाव के बारे में भी सोच लिया होता। एक बार ध्यान रखा होता कि वे भारत में रहते हैं, जहां राजनीति के लिए, वोट बैंक के लिए नेता न जाने कब, क्या घोषणा कर सकते हैं। अगर यही बात ध्यान रखी होती तो ऐसा कदम नहीं उठता, आत्महत्या जैसा। उनके एक्शन मोड में आते ही खेत खलिहान मल्हार गा उठे।

किसानों के कर्जों की माफी की फाइल पर उनके साइन करते ही खेतों में फसलें लहलहाने लगीं। किसानों के कर्जों की माफी की फाइल पर उनके साइन करते ही धान की मंजीरों पर चिड़िया गाने लगी। किसानों के कर्जों की माफी की फाइल पर साइन होते ही गेहूं की बालियों पर बुलबुल इतराने लगी। किसानों के कर्जों की माफी की फाइल पर उनके साइन करते ही सूखे खेतों में मक्की, दालें मुस्कुराने लगीं।

किसानों के कर्ज माफी की फाइल पर उनके साइन करते ही बिन ब्याई गाय भी दूध देने को रंभाने लगी। किसानों के कर्जों की माफी की फाइल पर साइन होते ही धनिया सारे डर छोड़ कजरी गाने गली। किसानों के कर्ज माफी की फाइल पर उनके साइन करते ही बरसों से सूखे पड़े ज्वार के खेतों में ज्वार आ गया। भाटा न आए खुदा करे।

इधर जनाब की सरकार बनी, उधर रिकार्ड समय से पहले अपना वचन पूरा किया तो स्वर्ग में बैठे दशरथ परेशान! उन्होंने कभी सपने में भी न सोचा था कि लोकतंत्र में जनता को दिया वचन यों भी निभाया जाएगा। उन्होंने तो केवल और केवल अपनी पत्नी को ही वचन दिए थे, पर उन वचनों ने उन्हें किस कद्र परेशान किया था,

दिवंगत होने के बाद जो आज भी इस बात को सोचते हैं तो उनके रोंगटे डर के मारे खड़े हो जाते हैं। जबकि दिवंगत होने के बाद डरना मना है। जो दिवंगत हो गया अगर वो भी डरेगा को बेचारा जिंदा आदमी के लिए क्या काम बाकी रहेगा। भगवान करे वे यों ही एक्शन मोड में रहें। उनके एक्शन के साथ ही साथ उनके प्यादे भी मौज में रहें। सरकार चलती रहे।

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