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संसद के शीतकालीन सत्र से ढेरों उम्मीदें

सत्ता में आने के बाद से ही मोदी सरकार सबका साथ-सबका विकास के मूलमंत्र के साथ आगे बढ़ने की बात करती रही है।

संसद के शीतकालीन सत्र से ढेरों उम्मीदें
संसद के शीतकालीन सत्र से देश को ढेर सारी उम्मीदें हैं। जिस तरह से गत मानसून सत्र हंगामे और शोरगुल की भेंट चढ़ गया था, उसे देखते हुए सरकार के सामने इस सत्र को सुचारु रूप से चलाने की चुनौती है। कथित असहिष्णुता सहित कई ऐसे मुद्दे हैं, जिनको आधार बनाकर विपक्षी दल सत्तारूढ़ राजग सरकार को सदन में घेरने की बात कर चुके हैं। दूसरी ओर मोदी सरकार चाहती है कि जल्द से जल्द वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी और भूमि अधिग्रहण समेत सभी लंबित विधेयकों को पारित करा कर कानून का शक्ल दे दिया जाए, ताकि अर्थव्यवस्था को गति मिल सके।

हालांकि सदन को चलाने की जिम्मेदारी सत्तापक्ष की होती है, लेकिन विपक्ष को भी अपनी भूमिका का एहसास होना चाहिए। विपक्ष को हर कदम पर सत्तापक्ष को सहयोग देना चाहिए, वह सदन को पंगु बनाकर कोई बात नहीं मनवा सकता, वहीं सत्तापक्ष को चाहिए कि वह ऐसा व्यवहार न करे जिससे विपक्ष खुद को उपेक्षित महसूस करे। हालांकि सत्ता में आने के बाद से ही मोदी सरकार सबका साथ-सबका विकास के मूलमंत्र के साथ आगे बढ़ने की बात करती रही है। वहीं संसदीय कार्यमंत्री वैंकया नायडू ने साफ किया है कि असहिष्णुता सहित विपक्ष जिस किसी भी मुद्दे पर चर्चा चाहता है, सरकार उसके लिए तैयार है। वैसे भी संसद बहस के लिए है, शोरगुल के लिए नहीं।

यहां देश के सामने आए ज्वलंत मुद्दों पर विचार-विर्मश कर राष्ट्रहित में सर्वमान्य हल खोजा जाना चाहिए, तभी इसकी सार्थकता और गरिमा बरकरार रह सकती है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। इसकी सभी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का समाधान लोकतांत्रिक तरीकों से ही किया जा सकता है। देश की जनता को इस व्यवस्था में अटूट आस्था है, यही वजह है कि यहां लोकतंत्र लगातार फल-फूल रहा है। वैश्विक मंच पर भारत का कद लगातार बढ़ने की एक बड़ी वजह यह भी है।

इसके मूल्यों को बरकरार रखने की जिम्मेदारी यहां के निर्वाचित प्रतिनिधियों पर है, जिनको जनता ने अपना बहुमूल्य मत देकर संसद में इस उम्मीद के साथ भेजा है कि वे संसदीय परंपराओं का सम्मान करेंगे और स्वहित से ऊपर उठकर देशहित में फैसला लेते हुए जनता की समस्याओं का समाधान खोजेंगे, लेकिन हाल के वर्षों में संसद में बढ़ता हंगामा चिंता का सबब बन रहा है। निजी हमले और तकरार बढ़ने से इसकी गरिमा धूमिल हुई है।

मानसून सत्र में इसकी झलक देश देख चुका है। इसके कारण पिछले सत्र के दौरान राज्यसभा में एक भी वित्त विधेयक पारित न हो सका था, जबकि लोकसभा में अध्यक्ष द्वारा 25 विपक्षी सांसदों के निलंबन के बाद ही आठ विधेयक पार लग सके थे। आवंटित समय में से राज्यसभा ने महज नौ फीसदी तथा लोकसभा ने 48 फीसदी का ही उपयोग किया था। उम्मीद है कि इस बार वैसा दृश्य देखने को नहीं मिलेगा, लेकिन दुर्भाग्य से यदि यह सत्र भी मानसून सत्र के रास्ते पर गया तो लोगों में संदेश जाएगा कि हमारे सांसदों को देश की चिंता कम बल्कि अपनी राजनीति की फिक्र ज्यादा है। फिलहाल देश सर्वोच्च पंचायत संसद की ओर देख रहा है।

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