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उमेश चतुर्वेदी का लेख : रोटी की मजबूरी में पलायन

भूख को शांत करने के लिए होने वाले पलायन की मोटे तौर पर तीन बड़ी वजहें हैं। पहली वजह है, औद्योगीकरण के दौर में विकास और औद्योगीकरण का असमान वितरण। दूसरी वजह है, बेतहाशा जनसंख्या वृद्धि, जिसके कारण ग्रामीण संसाधन कम से कमतर होते चले गए और तीसरी वजह है, ग्राम केंद्रित अर्थव्यस्था का शुरू से ही अभाव। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और भ्रष्टाचार इसके पीछे की सार्वभौम बड़ी वजह है। हमारा संविधान ग्राम केंद्रित बना ही नहीं।

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उमेश चतुर्वेदी

सपनों को पूरा करने की तुलना में पेट की आग बुझाने के लिए होने वाला पलायन एक तरह से विभीषिका ही होती है। कोरोना के चलते जब इस साल मार्च के आखिरी हफ्ते से महानगरों या नगरों से गांवों की ओर पलायन बढ़ा तो इसे ग्राम केंद्रित सामाजिक व्यवस्था के लिए बेहतर माना गया। सिवाए बिहार की नीतीश सरकार के, ज्यादातर राज्य सरकारों ने ऐसा दिखाना शुरू किया, मानो घर लौटे मजदूरों के जरिए वे सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर ऐसा ताना-बाना खड़ा कर देंगी, जो पलायन रोकने में कामयाब होगा। कुछ राज्य सरकारों ने तो अपनी तैयारियों को ऐसे प्रस्तुत किया, मानो वे भारतीय इतिहास के उस स्वर्ण युग को लौटा लाएंगी, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतने लगे हैं, गांव लौटे लोगों को लगने लगा है कि सरकार की मुफ्त अनाज योजना और मनरेगा के जरिए उनके परिवार का पेट भले ही कुछ महीने भर जाए, लेकिन सिर्फ इनके जरिए उनके परिवार की दूसरी बुनियादी जरूरतें, मसलन कपड़ा, पढ़ाई, बुनियादी मनोरंजन, आदि आवश्यकताएं शायद ही पूरी हो पाएं। लिहाजा गांव को छोड़कर उस महानगर की ओर कामगार लौटने लगा है, जिसे वह अपने लिए निष्ठुर मानकर छोड़ आया था। घनी और भारी जनसंख्या और घनघोर गरीबी वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल से दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, मुंबई, सूरत आदि जगहों की ओर जाने वाली गाड़ियों की बुकिंग भर चुकी है। जिन्हें टिकट नहीं मिल पा रहा है, वे परेशान हैं। क्योंकि कोरोना के चलते पूरी रेलगाड़ियां नहीं चल रही हैं और अब सामान्य या प्रतीक्षारत टिकटों के जरिए यात्रा करना संभव नहीं है।

कोरोना के संकट काल में जो पलायन हुआ, उसके पीछे मोटे तौर पर तीन कारण रहे। कुछ लोग बीमारी के डर से येन-केन प्रकारेण घरों की ओर लौट पड़े तो कुछ को उन महानगरों और औद्योगिक केंद्रों ने उपेक्षित छोड़ दिया, जिनकी जीवन रेखा ये कामगार ही थे। इन सबसे कहीं ज्यादा बड़ा कारण कुछ राजनीतिक दल भी रहे, जिन्होंने केंद्र सरकार को नाकाम साबित करने के लिए पलायन को बढ़ावा दिया। केंद्र सरकार की गलती यह रही कि उसने उन राज्य सरकारों पर भी भरोसा कर लिया, जिनका एकमात्र उद्देश्य उसकी हर योजना को नाकाम ही साबित करना रहा है। कुछ राज्य सरकारों ने यह भी सोचा कि अगर अपने यहां के नगरों की भीड़ को उनके मूल स्थानों की ओर भेज देंगे तो वे कोरोना संकट का आसानी से मुकाबला कर सकेंगे, लेकिन इस आपाधापी और भागमभाग का उलटा ही असर पड़ा है। प्रवासियों के जरिए उनके पैतृक स्थानों तक तो कोरोना पहुंचा ही, मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद जैसे महानगरों में इसकी वजह से कोरोना और ज्यादा ही बढ़ गया। इस पूरी राजनीति में आर्थिक गतिविधियां लंबे समय तक के लिए पूरी तरह ठप हो गईं।

खेती और किसानी के लिए मशहूर पंजाब और हरियाणा की खेती व्यवस्था को बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग ही संभालते रहे हैं। मजदूरों की वापसी में इन राज्यों के किसानों ने अपनी ओर से कहीं ज्यादा संजीदा और सम्मानजनक व्यवस्था की। अब वे अपने यहां मजदूरों को वापस लाने के लिए बस भेज रहे हैं और लौटे मजदूरों का माला-फूल के साथ स्वागत कर रहे हैं। मुंबई के कुछ शोरूम मालिक और कारोबारी मजदूरों के खाते में पैसे ट्रांसफर कर रहे हैं और जब वे येन-केन प्रकारेण मुंबई पहुंच रहे हैं तो बस स्टैंड या स्टेशन पर खुद उनका स्वागत करने जा रहे हैं। जाहिर है कि एक बार फिर शहर, औद्योगिक और रोजगार केंद्र आबाद होने जा रहे हैं। कोरोना के चलते यह प्रक्रिया बेशक कुछ महीनों तक धीमी रहेगी।

भूख को शांत करने के लिए होने वाले पलायन की मोटे तौर पर तीन बड़ी वजहें हैं। पहली वजह है, औद्योगीकरण के दौर में विकास और औद्योगीकरण का असमान वितरण। दूसरी वजह है, बेतहाशा जनसंख्या वृद्धि, जिसकी वजह से ग्रामीण संसाधन कम से कमतर होते चले गए और तीसरी वजह है, ग्राम केंद्रित अर्थव्यस्था का शुरू से ही अभाव। राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी और भ्रष्टाचार इसके पीछे की सार्वभौम बड़ी वजह है। हमारा संविधान ग्राम केंद्रित बना ही नहीं। अंबेडकर ने गांधी जी के सपनों के मुताबिक ग्राम केंद्रित की बजाय व्यक्ति केंद्रित शासन व्यवस्था को स्वीकार किया। नेहरू तो मानते ही थे कि गांव असभ्य और अस्वच्छ हैं, लिहाजा वहां से सामाजिक बदलाव की बड़ी भूमिका नहीं निभाई जा सकती। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 310- 311 से संरक्षित अपनी नौकरशाही भला क्यों चूकती। वैसे भी वह अंग्रेजी व्यवस्था की पूंछ से ही निकली है। लिहाजा उसे कल्पनाशीलता की बजाए अपने रुतबे और अहं को तुष्ट करने में ही ज्यादा बेहतरी नजर आती है। रूतबा शहर केंद्रित व्यवस्था में ही हासिल किया जा सकता है। लिहाजा गांव उजाड़ होते चले गए। हिंदी में ग्रामीण रंग के मशहूर लेखक विवेकी राय कहते थे कि जब तक गांव पगडंडियों पर था, तब तक वहां संतुष्टि थी, उसकी सीमा में जीवन यापन की सुविधाएं थी। लेकिन जब से वह हाईवे पर आने लगा, वह भी शहर की नकल करने लगा। इस प्रक्रिया में गांव वालों को लगा कि नकली शहर में रहने की बजाय वह शहर ही चल पड़े। इस पूरी प्रक्रिया को बढ़ाने में बेलगाम जनसंख्या वृद्धि और ग्रामीण स्तर पर रोजगार की कमी ने मदद की। उदारीकरण के दौर में स्थानीय दस्तकारी को किनारे लगाया तो वे लोग भी शहरों के मजदूर होने के मजबूर हो गए। कोरोना संकट काल में गांवों की ओर लौटते लोगों को देख विचारकों को लगा कि यह प्रक्रिया रूकेगी, दस्तकारी को बढ़ावा मिलेगा। ऐसा सोचते वक्त वे भूल गए कि ग्रामीण इलाकों में दस्तकारी आदि की जो बुनियादी सोच और सहूलियत खत्म हो चुकी है, उसे एकबारगी नहीं जिंदा किया जा सकता। इसलिए गांवों में लौटे हाथों को काम दे पाना मुश्किल होगा। वैसे कुछ लोगों ने आशंका जताई थी कि जब पेट की आग जगेगी तो लोगों के सामने फिर उन्हीं शहरों की ओर लौटने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं होगा। तब इन आवाजों को केंद्र विरोधी राजनीति के तुमुलगान में दबा दिया गया था। अब यह आवाज सही साबित हो रही है।

जब तक गांवों में बुनियादी सहूलियतें नहीं बढ़ाई जाएंगी, नीतिगत रूप से गांव को आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में नहीं लाया जाएगा, दस्तकारी के लिए बाजार का निर्माण नहीं किया जाएगा। तब तक गांवों की प्रतिभाओं को गांवों तक रोक पाना आसान नहीं होगा। वैसे भी देश में करीब चालीस करोड़ लोग महज पेट की आग बुझाने की बुनियादी जरूरत के लिए अपने बुनियादी जगहों से दूर जाने को मजबूर हैं। गांवों को स्मार्ट बनाने की योजना पर आगे बढ़ना होगा, इसके लिए एक रास्ता यह हो सकता है कि कारपोरेट सोशल रिस्पॉंसबिलिटी यानी सीएसआर के तहत बड़ी कंपनियों को गांवों को ही गोद दिया जाए तो गांवों की श्रमशक्ति को गांवों में ही काम मुहैया कराया जा सकेगा।

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