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डाॅ. रहीस सिंह का लेख : अफगानों की सुरक्षा सुनिश्चित हो

इस समय अफगानिस्तान में जाबोल से लेकर कुंदूज तक और कंधार से जलालाबाद तक तालिबान, इस्लामिक स्टेट, इस्लामी मूवमेंट उज्बेकिस्तान सहित अलकायदा के खंडहरों पर बिखरे हुए कई चरमपंथी समूहों का दबदबा कायम है और इसमें निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। तालिबान शहरों और सैन्य चौकियों को निशाना बनाने के बजाय अब लक्ष्य बनाकर हत्याएं कर रहे हैं, ताकि अफगानों में उनका भय व्याप्त हो सके। काफी हद तक वे इसमें सफल भी हुए हैं, क्योंकि इस समय अफगानिस्तान में भय का वातावरण है। ऐसे में ऐसी पहल की जरूरत है जिसे अफगानिस्तान ही नहीं अफगानों को भी सुरक्षा मिल सके।

डाॅ. रहीस सिंह का लेख : अफगानों की सुरक्षा सुनिश्चित हो
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डाॅ. रहीस सिंह।  

डाॅ. रहीस सिंह

हम उस अफगानिस्तान की बात कर रहे हैं जो इतिहास की कई सदियों तक एशिया के व्यापारियों के लिए 'क्राॅसरोड्स' और तमाम संस्कृतियों के लिए 'मीटिंगप्लेस' के रूप में जाना जाता रहा। आज वह अपनी मौलिकता की मृत्यु का इतिहास लिख रहा है अथवा किसी चीज के उदय का, पता नहीं! सच तो यह है कि काबुलीवाले का देश एक अजीब सी स्थिति से गुजर रहा है। नाटो फौजें वापस जा रही हैं और नाटो देश भारी मन से घोषणा कर रहे हैं कि अफगानिस्तान में उनका 20 साल का सैन्य मिशन पूरा हो गया। अफगान बच्चे हिन्दुकुश की तलहटी में बिखरे हुए कचरे के ढेर में अपनी जिंदगी तलाश रहे हैं, तालिबान फिर से पूरे आत्मविश्वास के साथ अफगानिस्तान में एक नई पटकथा लिख रहा है और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन व्हाइट हाउस के ईस्ट रूम में बैठकर कह रहे हैं कि वहां (अफगानिस्तान) के लोगों को अपना भविष्य खुद तय करना चाहिए। ऐसे में अफगान अपने भाग्य पर इतराएं या रोएं?

अब से कुछ समय पहले तक यह सवाल किया जा रहा था कि क्या तालिबान अमेरिकी गेम का हिस्सा बनेंगे, पर अब कहा जा रहा है, क्या अमेरिका तालिबान गेम का हिस्सा बन गया है। ऐसा क्यों हुआ और कैसे हुआ, यदि हुआ है तो। दरअसल तालिबान की चाहत अफगान समस्या का समाधान नहीं सत्ता रही है। इसके लिए उनके रोडमैप को ही शायद दोहा में मान्यता मिल गई। दोहा में अमेरिका ने तालिबान से समझौता कर उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता दे दी। इसके बाद उसे अफगानिस्तान में अलकायदा और इस्लामिक स्टेट सहित तमाम बिखरे आतंकी संगठनों के साथ गठजोड़ बनाने में आसानी हो गई। फिर तो दोहा में लिखी गई अमेरिकी स्िक्रप्ट शांति का रोडमैप कम अफगान लोकतंत्र और अफगान स्वतंत्रता को संकट में डालने का रोडमैप अधिक था। शायद इसलिए कि अमेरिका इज्जत के साथ अफगानिस्तान से निकल सके। अमेरिका अफगानिस्तान से जल्द से जल्द अपने सैनिकों को वापस बुलाना चाहता है। ध्यान रहे कि पहले अमेरिकी सैनिकों द्वारा अफगानिस्तान छोड़ने की अवधि 11 सितम्बर थी जो अब 31 अगस्त हो गई है। इसके बाद तालिबान को काबुल की ओर जाने वाले राजमार्ग की बाधाएं काफी कम और संभावनाएं ज्यादा हो जाएंगी। जो बाइडेन भले ही कह रहे हों कि अफगान सेना में तालिबान को जवाब देने की क्षमता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। उन्हीं की एजेंसियां अपनी रिपोर्ट्स में कह रही हैं अमेरिकी सेना के अफगानिस्तान से चले जाने के छह माह के अंदर भी तालिबान सत्ता पर कब्जा कर लेगा। जो भी हो, इतना तो तय है कि आगे की लड़ाई अशरफ गनी की सरकार या अफगानिस्तान की लोकल फोर्सेज अकेले नहीं लड़ पाएंगी।

आज की स्थिति है उसके आधार पर यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि अफगानिस्तान जिस दलदल से लगभग 20 साल पहले थोड़ा सा बाहर आता हुआ दिखा था अब वह पुनः उसी में धंसने की ओर बढ़ रहा है। फिर तो यह सवाल उठना लाजिमी होगा कि 9/11 के बाद शुरू हुए 'वाॅरइन्ड्यूरिंग फ्रीडम' का क्या हुआ? सवाल यह भी उठना चाहिए कि काबुल के ध्वंस और तालिबान-अलकायदा के खिलाफ आपरेशन में 'डेथटोल' के रूप में अपनी जिंदगियां चुकाने वाले अफगानों को क्या मिला? बिना इनका उचित उत्तर मिले यह कैसे कहा जा सकता है कि 20 साल पहले का सैन्य मिशन पूरा हो गया। यदि उस अध्याय का समापन हो गया है तो फिर हरेक अफगान के जेहन यह डर क्यों बना हुआ है कि अफगानिस्तान की आगे की राह कैसी होगी? दुनिया के तमाम देश आज की स्थिति को लेकर चिंतित क्यों हैं? यदि अध्याय अपूर्ण है तो फिर अफगानिस्तान को ऐसे ही छोड़ दिए जाने का प्रयोजन क्या है? क्या अफगानिस्तान और अफगानों की जिंदगियों को बचाने के लिए अभी भी वैश्विक प्रयासों की जरूरत नहीं है? यदि हां, तो ऐसा इनीशिएटिव लेगा कौन? चीन, रूस, भारत अथवा अमेरिका? क्या भारत अथवा चीन-रूस या फिर भारत-रूस की तरफ से कोई इनीशिएटिव लिया जा सकता है? किसी भी विकल्प पर विचार करने से पहले हमें यह स्वीकार करना होगा कि अमेरिका अफगानिस्तान में तालिबान से लड़ते-लड़ते थक चुका है। शायद यही तालिबान का उद्देश्य भी था।

अब देखना यह है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी से उत्पन्न होने वाले संभावित खालीपन को भरेगा कौन? वैसे चीन स्थितियों को गंभीरता से देख रहा है। इस बात की भी संभावना है कि चीन और पाकिस्तान एक दूसरे का हाथ थामकर इस खालीपन को भरने की कोशिश करें। कारण यह कि चीन यह अच्छी तरह से जानता है कि यदि अफगानिस्तान गलत हाथों में पड़ गया तो क्षेत्र में निहित चीनी हित प्रभावित होंगे। हालांकि चीन अफगानिस्तान में खुलेआम शामिल होता हुआ दिखना नहीं चाहता, लेकिन वह शंघाई सहयोग संगठन और चीन एंड सेंट्रल एशिया 5 के माध्यम से रचनात्मक भूमिका निभाना चाहता है। चीन-पाक-अफगानिस्तान त्रिपक्षीय व्यवस्था इसका प्रमाण है। जहां तक भारत का प्रश्न है तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर हाल ही में यूरोपीय संघ के उपाध्यक्ष बोरवेल के साथ साझा बयान में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत अफगानिस्तान में किसी भी तरह के 'इस्लामिक अमीरात' का समर्थन नहीं करेगा। इससे स्वयं को इस्लामिक अमीरात आफ अफगानिस्तान के रूप में पेश करने वाले तालिबान को यह स्पष्ट संदेश गया कि उसे भारत का समर्थन नहीं मिल सकता।

जो भी हो इस समय अफगानिस्तान में जाबोल से लेकर कुंदूज तक और कंधार से जलालाबाद तक तालिबान, इस्लामिक स्टेट, इस्लामी मूवमेंट उज्बेकिस्तान सहित अलकायदा के खंडहरों पर बिखरे हुए कई चरमपंथी समूहों का दबदबा कायम है और इसमें निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। तालिबान शहरों और सैन्य चौकियों को निशाना बनाने के बजाय अब लक्ष्य बनाकर हत्याएं कर रहे हैं, ताकि अफगानों में उनका भय व्याप्त हो सके। काफी हद तक वे इसमें सफल भी हुए हैं, क्योंकि इस समय अफगानिस्तान में भय का वातावरण है। ऐसे में ऐसी पहल की जरूरत है जिसे अफगानिस्तान ही नहीं अफगानों को भी सुरक्षा मिल सके। ध्यान रहे कि अमेरिका ने पिछले बीस वर्षों में सिर्फ अफगानिस्तान को देखा, अफगानों को नहीं। भारत एक रचनात्मक पहल कर सकता है। भारत इंडो-पैसिफिक में बनने वाले क्वाड का सक्रिय सदस्य है। चीन, रूस और सेंट्रल एशियाई देशों के साथ बने शंघाई सहयोग संगठन का भी सदस्य है तथा ब्रिक्स का भी, लेकिन चीन और पाकिस्तान इसमें बड़ी बाधा हैं और बिना सामूहिक प्रयास के अफगानिस्तान में मानवीय मूल्यों की स्थापना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा संबंधी संभावनाएं शून्य के बराबर हैं। ध्यान रहे कि अब अफगानों में किसी तरह के युद्ध को झेलने और डेथटोल अदा करने की क्षमता शेष नहीं है।

(लेखक विदेश मामलों विशेषज्ञ हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)

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