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इराक से आती खतरनाक आहटों को सुने दुनिया

विश्व शांति के सामने यह एक नई तरह की चुनौती आ गई है।

इराक से आती खतरनाक आहटों को सुने दुनिया
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नई दिल्‍ली.सुन्नी चरमपंथियों के संगठन इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) ने इराक और सीरिया में अपने अधिकार वाले हिस्से को खिलाफत अर्थात इस्लामी राज्य घोषित कर दिया है। साथ ही उन्होंने अपने प्रमुख अबू बक्र अल-बगदादी को इस नए इस्लामी राज्य का खलीफा घोषित किया है। अभी इसके कब्जे में उत्तरी सीरिया के अलेप्पो से लेकर पूर्वी इराक में दियाला तक का भूभाग है।

पश्चिम एशिया सहित समूची दुनिया के लिए यह अच्छी खबर नहीं है। विश्व शांति के सामने यह एक नई तरह की चुनौती आ गई है। इराक भयंकर गृहयुद्ध की चपेट में है। इसमें अभी तक लाखों बेगुनाह लोगों की जान जा चुकी है। इस्लामिक जगत में हुए इस उथल-पुथल के काफी खतरनाक प्रभाव सामने आ सकते हैं। विश्व समुदाय की ओर से इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। आईएसआईएस अलकायदा का ही एक भाग है परंतु अब उससे पूरी तरह अलग हो गया है और उससे भी ज्यादा खतरनाक रूप धारण कर लिया है।

इसे ओसामा बिन लादेन की अगली पीढ़ी कहा जा रहा है। आईएसआईएस के इरादे ठीक नहीं लगते हैं और वह सिर्फ इराक व सीरिया तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। वह विश्व को 90 साल पीछे खलीफा के दौर में ले जाना चाहता है जब इराक और सीरिया पर ऑटोमन (उस्मानी तुर्क) का अधिकार था। दरअसल, दुनिया से खलीफा व्यवस्था 1924 में ही खत्म हो गयी थी। हालांकि इस आतंकी समूह ने अपने सरगना को पूरी दुनिया के मुसलमानों के नेता का दर्जा दिया है परंतु अभी यह कहना कठिन है कि इस्लामिक देशों में इसका कितना सर्मथन है।

वहीं अब इराक की चुनी हुई शिया बहुल सरकार बगदाद और दक्षिण क्षेत्रों में ही सिमट गई है। इराक कुर्द, सुन्नी और शिया बहुल इलाकों के रूप में तीन क्षेत्रों में बंटने की कगार पर पहुंच गया है। इराक की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है। वह कई देशों को तेल निर्यात करता है पर अब तेल के कई कुओं पर आईएसआईएस का कब्जा हो गया है। हालांकि कुछ बाहरी देश आईएसआईएस के चरमपंथियों को शह दे रहे हैं। यह और भी खतरनाक है। इराक की बर्बादी के लिए अमेरिका की असमय वहां से वापसी को जिम्मेदार माना जा रहा है।

अब वह वहां सीधे हस्तक्षेप करने से भी बच रहा है परंतु संयुक्त राष्ट्र की खामोशी चिंताजनक है। ऐसे हालात में संयुक्त राष्ट्र की जिम्मेदारी बनती है कि वह इराक में अपने सुरक्षा दल को भेजे। संयुक्त राष्ट्र को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि आसपास के देशों का वहां किसी तरह का हस्तक्षेप न हो। वे देश जो इराक से कच्चा तेल खरीदते हैं उनकी अर्थव्यवस्था पर इसका खराब असर पड़ रहा है। क्योंकि इस संघर्ष से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ गई हैं।

भारत ही करीब 13 फीसदी तेल वहां से आयात करता है। इराक संकट का हल जितनी जल्दी से खोज लिया जाए उतना अच्छा है। वहां मानव अधिकारों का खुला उल्लंघन हो रहा है। भारत सहित कईदेशों के हजारों नागरिक वहां फंसे हैं। अमेरिका का लोकतंत्र लाने के नाम पर हमला और सद्दाम हुसैन की मृत्यु के बाद इराक खंडहर में तब्दील हो चुका है। अब गृहयुद्ध की स्थिति बनी है। यदि इसे रोका नहीं गया तो इराक के हालात बद से बदतर होते चले जाएंगे।

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