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अब ममता के लिए नैतिक ईमानदारी दिखाने का वक्त

घूस देने वाले पत्रकारों पर मुकदमा नहीं चलेगा, क्योंकि उन्होंने समाज के हित में दुराचरण का पर्दाफाश किया।

अब ममता के लिए नैतिक ईमानदारी दिखाने का वक्त
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से ठीक 19 दिन पहले राज्य में सत्ताधारी दल तृणमूल कांग्रेस के सांसदों, मंत्रियों और कई निगम कॉरपोरेटों के एक स्टिंग में कैमरे पर कथित रूप से घूस लेते पकड़े जाने से ममता बनर्जी की 'बेदाग छवि' निश्चित ही सवालों के घेरे में आ गई है। सारदा घोटाले की आंच अभी ठंडी भी नहीं हुई है, जिससे ममता सरकार की साख पहले से ही झुलसी हुई है, ऐसे में एक और 'भ्रष्टाचार' के सामने आने से दीदी की ईमानदार राजनीतिक पूंजी में सेंध तो लग ही गई है। हालांकि पश्चिम बंगाल की सीएम और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की मुखिया ममता बनर्जी इसे राजनीतिक साजिश करार देते हुए 'रिश्वतखोरी' मामले की जांच से इनकार किया है। उन्होंने अपने नेताओं को बेदाग मानते हुए कहा है कि 'जो हमसे टकराएगा, वह चूरचूर हो जाएगा।' ठीक चुनाव से पहले ममता का अपने कथित भ्रष्ट मंत्रियों व सांसदों का इस तरह बचाव करना जनता के बीच भारी पड़ सकता है। यह नैतिक और राजनीतिक सवालों से जी चुराने जैसा ही है। उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार का उदाहरण सामने है, 2012 में विस चुनाव से पहले लोकायुक्त रिपोर्ट में बसपा सरकार के करीब 20 मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे, उसके बाद बसपा चुनाव हार गई थी, जबकि मायावती ने नैतिक ईमादारी दिखाते हुए अपने आरोपी मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई भी की थी। इसलिए ममता बनर्जी को भी अपने कथित भ्रष्ट नेताओं को लेकर जनता के बीच 'नैतिक सवालों' का सामना करना होगा। दरअसल नारद न्यूज नामक वेबपोर्टल के स्टिंग में टीएमसी के जो भी सांसद, मंत्री व विधायक रिश्वत लेते देखे गए हैं, वे सभी पार्टी के बड़े नेता व ममता के बेहद करीबी माने जाते हैं, ऐसे में वे नैतिक रूप से बच नहीं सकतीं। खुद ममता ने तहलका स्टिंग को मुद्दा बनाकर नैतिक ईमानदारी के आधार पर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व की एनडीए सरकार से इस्तीफा दे दिया था। अब उनके सामने वही सवाल खड़ा है। उनके एमएच अहमद मिर्जा, मुकुल रॉय, सुब्रत मुखर्जी, सौगत रॉय, सुल्तान अहमद, सुवेन्दु अधिकारी, काकोली घोष दस्तीदार, प्रसून बनर्जी, सुवोन चटर्जी, मदन मित्रा, इकबाल अहमद, फरहाद हकीम जैसे नेताओं पर चार से पचास लाख तक घूस लेने के आरोप लगे हैं। इनमें सांसदों की जांच को लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता वाली एथिक्स कमेटी को भेज दिया है। इससे पहले 2005 में एक एथिक्स कमेटी ने एक स्टिंग ऑपरेशन में कथित तौर पर फर्जी निजी कंपनियों की मदद के लिए रिश्वत लेते हुए देखे गए 11 सांसदों की सदस्यता समाप्त कर दी थी, जिनमें 10 लोकसभा और एक राज्यसभा के थे। 2001 के तहलका स्टिंग कांड में सीबीआई कोर्ट ने निर्णय दिया था कि काल्पनिक कंपनी से भी घूस लेते पकड़े जाने पर भ्रष्टाचार विरोधी धारा लागू होगी, जबकि घूस देने वाले पत्रकारों पर मुकदमा नहीं चलेगा, क्योंकि उन्होंने समाज के हित में दुराचरण का पर्दाफाश किया। इन दो उदाहरणों से देखा जाए तो ममता की पार्टी के नेताओं का वैधानिक पक्ष कमजोर है। विधानसभा चुनावों में विपक्षी दल-लेफ्ट, कांग्रेस व भाजपा इसे मुद्दा बनाने से नहीं चूकेंगे। किसी भी नेता के लिए राजनीतिक जीवन में पारदर्शिता, ईमानदारी और नैतिकता बड़ी निधि होती है। ममता बनर्जी की अभी तक छवि भी ऐसी ही रही है, जिसके दम पर उन्होंने 37 साल के वाम शासन को उखाड़ फेंका था। अब जब भ्रष्टाचार की छींटें उनके नेताओं पर पड़ रहे हैं, तो उन्हें इस बार भी उन्हें अपने आरोपी नेताओं का बचाव करने की बजाय उच्च नैतिक मानदंड अपनाना चाहिए।
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