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खाद्यान्न सुरक्षा पर भारत का रुख सराहनीय

पिछले साल दिसंबर में बाली में टीएफए की रूपरेखा खींची गई थी।

खाद्यान्न सुरक्षा पर भारत का रुख सराहनीय
विकसित देशों के तमाम दबावों को दरकिनार कर भारत ने विश्व व्यापार संगठन के सदस्य देशों की जेनेवा में हुई बैठक में व्यापार सुविधा समझौता (टीएफए) पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर साफ कर दिया है कि उसके लिए देश के गरीबों और किसानों के हितों की रक्षा सवरेपरि है। दरअसल, पिछले साल दिसंबर में बाली में टीएफए की रूपरेखा खींची गई थी। भारत ने मांग की हैकि इस समझौते से खाद्यान्न सुरक्षा और सब्सिडी को अलग रखा जाये। इस करार पर सहमति की अंतिम तिथि 31 जुलाई है। भारत और कुछ अन्य विकासशील देशों की असहमति को देखते हुए करार पर किसी नतीजे पर पहुंचने की उम्मीद कम ही है। हालांकि अमेरिका, यूरोपीय यूनियन के सदस्य देश और ऑस्ट्रेलिया सहित कई विकसित देशों ने भारत की मांगों को नजरअंदाज करते हुए अपने रुख पर दोबारा विचार करने की सलाह दे रहे हैं। इस करार को लेकर उनका अपना तर्कहै कि टीएफए के अमल में आने से वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक खरब डॉलर से अधिक की वृद्धि होगी और विश्व भर में दो करोड़ से अधिक रोजगार के अवसर पैदा होंगे, परंतु इसका दूसरा पहलू भी है। इसके जरिए वे विकासशील देशों के बाजार में अपनी उपस्थिति को और बढ़ाना चाहते हैं। इस करार से उन्हें मदद मिलेगी। यही वजह हैकि वे दबाव बना रहे हैं। इस समझौते में कहा गया है कि विकासशील देशों को अपनी खाद्य सब्सिडी 10 प्रतिशत तक रखनी होगी। भारत के लिए यह मानना मुश्किल है। भारत चावल व अन्य खाद्य वस्तुओं पर 15 से 24 प्रतिशत की सब्सिडी देता है। यह सब्सिडी किसानों को उनके उत्पादों पर न्यूनतम सर्मथन मूल्य के जरिए दी जाती है। अगर भारत यह समझौता वर्तमान स्वरूप में स्वीकार कर लेता है, तो इसका सीधा प्रभाव भारत सरकार के खाद्यान्न भंडारण और फसलों पर दी जाने वाली इस न्यूनतम सर्मथन मूल्य की व्यवस्था पर पड़ेगा। सब्सिडी कम करने पर किसानों को अपने उत्पाद उचित कीमतों पर बेचने में काफी समस्याएं आएंगी। ऐसे में विदेशी कंपनियों को कृषि सेक्टर में आमंत्रित करना होगा ताकि इसमें निवेश बढ़े। इससे भारतीय कृषि और किसान और बदहाल होंगे। खाद्यान्न उत्पादन कम होगा। इसके परिणामस्वरूपबड़ी मात्रा में खाद्यान्न आयात करना पड़ेगा। आज भी देश की करीब 60 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। उसे कई तरह की राहतों की जरूरत है। और इस बात की गारंटी देना सरकार की जिम्मेदारी है कि उसके उत्पाद की सही कीमत उसे मिल सके। इस करार पर हस्ताक्षर कर देने के बाद खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम भी प्रभावित होता, क्योंकि तब भारत सरकार को खाद्यान्नों का भंडारण भी सीमित करना पड़ता। देश की बड़ी आबादी गरीब है, सरकार खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम के तहत उन तक सस्ता अनाज पहुंचाती है। ऐसे में किसानों और गरीब जनता के हितों की परवाह किये बिना विश्व व्यापार संगठन के करार पर हस्ताक्षर करना किसी भी तरह उचित नहीं होगा। भारत ने सुझाव दिया है कि खाद्यान्न सुरक्षा और सब्सिडी पर स्थाई हल के लिए फिर से चर्चा हो और अक्तूबर में इसकी समीक्षा की जाये। जाहिर है, भारत सरकार ने इस संबंध में सराहनीय रुख अपनाया है।
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