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भारत के प्रति चीन के रुख में बदलाव के संकेत

आमतौर पर चीन के राष्ट्रपति किसी अतिथि विदेश मंत्री से मुलाकात नहीं करते हैं।

भारत के प्रति चीन के रुख में बदलाव के संकेत

भारत अपनी विदेश नीति को लेकर कितना सक्रिय और सजग है इसका उदाहरण मंगलवार को समाप्त हुई विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की चीन की तीन दिवसीय यात्रा है। अब दोनों देशों के रिश्तों में एक बार फिर गर्माहट लौट आई है। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के बाद बढ़ी चीन की चिंता भी कम होती नजर आ रही है। इस यात्रा के बाद यह खबर आई है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा करने के पहले चीन की यात्रा कर सकते हैं। माना जा रहा हैकि नरेंद्र मोदी अपनी चीन यात्रा सड़क मार्ग से पूरी करेंगे। हालांकि जो भी हो, लेकिन इससे पहले ही जिस तरह नरेंद्र मोदी चीन की मीडिया में छाए हुए हैं और वहां उनकी प्रस्तावित यात्रा को लेकर जो उत्साह नजर आ रहा है, उससे दुनिया में भारत के बढ़ते कद का आभास होता है।

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यहां यह याद रखना होगा कि चीन की मीडिया स्वतंत्र नहीं है और उस पर वहां की सरकार का काफी प्रभाव है। वहां की मीडिया अपनी सरकार के कामकाज और सोच को ही ज्यादा तवज्जो देती है। ऐसे में उसके द्वारा पहली बार किसी भारत के प्रधानमंत्री की चीन यात्रा को लेकर इस तरह उत्साह दिखाना और साथ ही वहां की सरकार को यह सलाह देना कि उसे भारत की सभी चिंताओं का समाधान करना चाहिए, काफी मायने रखता है। इस प्रकार, कहा जा सकता है कि भारत के प्रति चीन की धारणा अब बदल रही है। निश्चित रूप से इसका बड़ा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है, जिनकी अगुआई में केंद्र में बनी एनडीए की सरकार पहले ही दिन से विदेश नीति के मोर्चे पर सजगता दिखा रही है।

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हालांकि अभी यह कहना कठिन है कि नरेंद्र मोदी की आगामी चीन दौरा दोनों देशों के रिश्तों को कितनी ऊंचाई प्रदान करेगी और कारोबारी संबंधों में कितनी प्रगति होगी। मौजूदा वक्त में यह भी कहना कठिन है कि दोनों देशों के बीच दशकों पुराने सीमा संबंधी जो विवाद हैं, उन पर कोई महत्वपूर्णसफलता मिलेगी या नहीं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है कि चीन की ओर से जब न तब भारतीय सीमा में घुसपैठ की घटनाएं होती रहती हैं। वहीं इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पाकिस्तान के साथ उसके संबंध किस हद तक गहरे हैं। चीन भारत के हितों की अनदेखी कर पाकिस्तान के हितों की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता जाहिर करता रहा है। हालांकि सुषमा स्वराज की यात्रा में कुछ संतोषजनक बातें सामने आई हैं। जैसे-चीन के राष्ट्रपति का प्रोटोकॉल तोड़कर सुषमा स्वराज से मुलाकात करना महत्वपूर्ण है।

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आमतौर पर चीन के राष्ट्रपति किसी अतिथि विदेश मंत्री से मुलाकात नहीं करते हैं। वहीं आतंकवाद के मुद्दे पर चीन ने रूस के साथ मिलकर भारत को यह भरोसा दिलाया है कि वह इस पर लगाम लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव पर अमल करेगा। जाहिर है, इस तरह चीन पाकिस्तान पर दबाव बनाने की एक तरह से हामी भर रहा है। हालांकि चीन की इस प्रतिबद्धता के बावजूद भारत को सतर्क रहना चाहिए और अपनी आंतरिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को मजबूती देने पर ध्यान केंद्रीत करना चाहिए। इन मोर्चों पर मजबूत होने के बाद ही हम चीन की चुनौती से निपट सकते हैं।

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