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‘सेक्युलरिज्म’ अलाप से वोटरों का अपमान क्यों?

फारूक ने कहा कि नरेंद्र मोदी के पक्ष में वोट देने वालों को समुद्र में डूब जाना चाहिए।

‘सेक्युलरिज्म’ अलाप से वोटरों का अपमान क्यों?
नेताओं की बयानबाजियों को देखकर लगता है लोकतंत्रोत्सव अपने निकृष्टतम दौर में पहुंच गया है। सत्ता के सहयोगी सभी दलों का एकमेव लक्ष्य नरेंद्र मोदी पर निजी प्रहार है। सोनिया, राहुल, प्रियंका, मुलायम, लालू, नीतीश कुमार, मायावती और ममता बनर्जी के बाद ताजा प्रहार संप्रग सरकार में केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुला ने किया है। फारूक ने कहा कि नरेंद्र मोदी के पक्ष में वोट देने वालों को समुद्र में डूब जाना चाहिए। फारूक यही नहीं रुके। उन्होंने चेतावनी दे डाली कि यदि भारत सांप्रदायिक हो गया तो कश्मीर उसके साथ नहीं रहेगा।
फारूक के ये दोनों बयान मोदी पर अब तक किए गए समस्त राजनीतिक व निजी प्रहारों में सबसे ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि इस बयान की तासीर केवल नरेंद्र मोदी तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे खतरनाक सोच परिलक्षित होती है। जिम्मेदार पदों पर बैठे केंद्रीय मंत्री स्तर के एक नेता अगर यह कहे कि विरोधी नेता को वोट देने वालों को समुद्र में डूब जाना चाहिए, तो इसका मतलब है कि वह लोकतंत्र का सम्मान नहीं कर रहा है। यानी वह वोटरों का अपमान कर रहा है। इससे ऐसे नेताओं की तानाशाही-अहंकारी-सामंतशाही सोच सामने आती है। रही बात मोदी को सांप्रदायिक कहने की तो किसी एक नेता के ऐसा कहने से कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि कौन सांप्रदायिक है और धर्मनिरपेक्ष यह तय करने का अधिकार किसी नेता को नहीं है, फारूक जैसे किसी नेता के प्रमाण-पत्र से न ही कोई सांप्रदायिक होगा न ही धर्मनिरपेक्ष।
हालांकि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने फारूक के हमलों का करारा जवाब दिया है। फारूक की परिवारवादी राजनीति पर कश्मीर से पंडितों के भगाए जाने का आरोप लगाते हुए मोदी ने कहा कि हम सेक्युलर हैं, इसलिए नहीं कि हमारे संविधान में यह शब्द लिखा है, बल्कि सेक्युलरिज्म हमारे खून में है। भाजपा ने पलटवार किया कि देश को धर्मनिरपेक्ष बने रहने के लिए इन केंद्रीय मंत्री के प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। सोचने वाली बात है कि फारूक अचानक मोदी के खिलाफ क्यों जहर उगलने लगे। तो इसके पीछे असल वजह केंद्र से कांग्रेस नीत सरकार की संभावित रुखसती और जम्मू-कश्मीर में नेशनल कान्फ्रेंस का तेजी से घट रहा जनाधार मालूम पड़ रही है।
ऐसा नहीं है कि फारूक को भाजपा से कोई ऐतराज है। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में फारूक अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कान्फ्रेंस शामिल थी और उमर मंत्री थे। लेकिन इस बार भाजपा से नेशनल कान्फ्रेंस का गठबंधन नहीं हो सका और जेएंडके में भी पीडीपी से उनकी पार्टी पिछड़ रही है। राजनीति के जानकार समझते हैं कि फारूक को सत्ता से दूर रहना गंवारा नहीं होता और सत्ता के संभावित गणित में वे फिट नहीं बैठ रहे हैं। इसलिए बौखलाहट होना स्वाभाविक ही है, जिसमें वे सेक्युलरिज्म का राग अलाप रहे हैं, ताकि राजनीतिक जमीन बचाई जा सके। इससे फारूक के राजनीतिक पाप धुल नहीं जाते हैं। जिस यूपीए सरकार पर भ्रष्टाचार-घोटाले का कलंक है, निवेश-अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचाने का आरोप है, उसी सरकार में फारूक भी मंत्री रहे हैं, इसलिए यूपीए की नाकामियों में वे भी बराबर के भागीदार हैं।
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