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चिंतन: जानबूझकर बने डिफाल्टरों पर शिकंजा सराहनीय

अब उम्मीद की जानी चाहिए कि सेबी के नए कदमों से विलफुल डिफाल्टरों पर अंकुश लग सकेगा।

चिंतन: जानबूझकर बने डिफाल्टरों पर शिकंजा सराहनीय
देर से ही सही, लेकिन सेबी ने जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों (विलफुल डिफॉल्र्ट्स) को नियामकीय शिकंजे में लाकर सराहनीय कदम उठाया है। विलफुल डिफॉल्र्ट्स ऐसे लोग होते हैं, जिनके पास कर्ज चुकाने की क्षमता होती है, लेकिन जानबूझकर (इंटेशनली) कर्ज नहीं चुकाते हैं। सिक्युरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) के नए नियम के मुताबिक अब कोई भी विलफुल डिफॉल्टर शेयर (स्टॉक या इक्विटी) या बांड (डेट) के जरिये पूंजी बाजार (पब्लिक) से पैसे नहीं जुटा सकेंगे। न ही वे किसी लिस्टेड (स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध) कंपनी के बोर्ड (निदेशक मंडल) में शामिल हो सकेंगे। वे किसी दूसरी लिस्टेड कंपनी का कंट्रोल भी अपने हाथ में नहीं ले सकेंगे। ऐसे डिफाल्टरों को म्यूचुअल फंड या ब्रोकरेज फर्म खोलने या उनसे सम्बद्ध होने की इजाजत भी नहीं होगी। ये नियम सभी सूचीबद्ध फर्मों, उनके प्रोमोटरों व निदेशकों पर लागू होंगे। उन्हें किसी सूचीबद्ध कंपनी में कोई बदल ग्रहण करने से भी रोका जाएगा। सेबी ने सूचीबद्ध कंपनियों को ऑडिटर द्वारा चिन्हित की गई कमियों के संभावित प्रभावों को भी सार्वजनिक करना अनिवार्य किया है। सेबी के इस कदम से विलफुल डिफाल्टर किंगफिशर एयरलाइंस के प्रोमोटर लिकर किंग विजय माल्या अनेक पदों के लिए अपात्र हो जाएंगे। इस नियम से पहले तक केवल रिर्जव बैंक का यह नियम था कि किसी भी डिफाल्टर को बैंक लोन नहीं देगा। लेकिन इससे ज्यादा असर नहीं पड़ता था, क्योंकि ऐसे लोग इक्विटी या डेट मार्केट से पूंजी जुटा लेते थे, इसलिए पूंजी बाजार को कंट्रोल करने वाला नियामक सेबी को यह कदम उठाना पड़ा। वह अगर दस साल पहले ही इस तरह के सख्त नियम बनाता, तो आज देश में विलफुल डिफाल्टरों की बड़ी फौज नहीं होती और न ही माल्या जैसे विलफुल डिफाल्टर कानूनी छेद का लाभ उठा पाते। इस समय देश में करीब 2500 विलफुल डिफॉल्टर हैं। इन पर 64 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। सरकारी बैंकों के कुल एनपीए (डूबत कर्ज) का एक तिहाई केवल 30 लोगों पर है। सरकारी और निजी बैंकों के करीब आठ लाख करोड़ कर्ज फंसे हैं। यह बैंकों के कुल कर्ज का 11.5 फीसदी है। इनमें 6 फीसदी एनपीए और बाकी रिस्ट्रक्चर्ड लोन है। सरकारी बैंक 2012 से 2015 तक 1.14 लाख करोड़ रुपये के कर्ज को राइट ऑफ (बुड़ती खाता) कर चुके हैं। यानी बैंक इसकी वसूली की उम्मीद छोड़ चुकी है। ये आंकड़े बताते हैं कि नियमों के अभाव में किस तरह लोग विलफुल डिफॉल्टर बन कर बैंकों और पब्लिक को चूना लगाया है। सेबी ने कॉरपोरेट की मनमानियों पर नकेल कसने के लिए और भी कई सुधारों का ऐलान किया है। इनमें सेबी सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा ऐसे बुड़ती या डूबत कर्ज की जानकारी सार्वजनिक करना अनिवार्य बनाने पर भी विचार कर रहा है। सेबी की स्टार्टअप, आरईआईटीएस, ढांचागत निवेश ट्रस्ट व निकाय बांड बाजारों के लिए संस्थागत व्यापार प्लेटफार्म को प्रोत्साहित करने की भी योजना है। चूंकि कई स्टार्टअप शीघ्र ही सूचीबद्ध होंगे, इस मायने में यह नियम अहम होगा। सेबी जिंस बाजार को विस्तारित करने के लिए भी कदम उठाएगा और अगले वित्त वर्ष में बैंकों व विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों सहित नए भागीदारों को इसमें भाग लेने की अनुमति देगा। अभी मोदी सरकार के समय ही वायदा बाजार नियामक एफएमसी का सेबी में विलय कर दिया गया है। इससे वायदा बाजार की गड़बड़ियों को भी रोका जा सकेगा। अब उम्मीद की जानी चाहिए कि सेबी के नए कदमों से विलफुल डिफाल्टरों पर अंकुश लग सकेगा।
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