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कटघरे में उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था

उत्तर प्रदेश फिर सांप्रदायिक सौहार्द के लिहाज से कसौटी पर है।

कटघरे में उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था
उत्तर प्रदेश फिर सांप्रदायिक सौहार्द के लिहाज से कसौटी पर है। इसका पश्चिमी हिस्सा पिछले एक साल से सांप्रदायिक हिंसा से ग्रस्त है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर मंडल में तीन जिले हैं। पिछले साल सितम्बर में मुजफ्फरनगर और शामली जिले में हिंसक टकराव हुआ और अब आमतौर पर शांत समझे जाने वाले सहारनपुर जिला भी खूनी संघर्ष की आग में झुलस गया। बार-बार के सांप्रदायिक हिंसा को देखते हुए यह कहा जाने लगा हैकि यहां का सामाजिक ताना-बाना काफी नाजुक दौर में पहुंच गया है। और इसके लिए कोई सबसे ज्यादा जिम्मेदार है तो वह राज्य के प्रशासनिक तंत्र की नाकामी और बदहाल कानून व्यवस्था। जमीन को लेकर दो गुटों के बीच शुरू हुई झड़प इलाके में तनाव की वजह बनी है। स्थानीय प्रशासन वर्षों पुराने गुरुद्वारे और कब्रिस्तान की इस जमीन विवाद से पूरी तरह वाकिफ था। ऐसे में यह सवाल उठता हैकि प्रशासन ने सतर्कता क्यों नहीं बरती? यदि दोनों गुटों के बीच के इस टकराव को शुरुआत में ही रोक लिया गया होता तो हालात बेकाबू नहीं होते। उपद्रवियों के उत्पात की प्रकृति को देखकर ऐसा लग रहा है कि इस पूरे मामले से अखिलेश सरकार बेपरवाह रही। शुक्रवार को यह घटना एक मामूली कहासुनी के साथ शुरू होकर जिस तरह से उग्र हिंसा में बदल गई, उसे देखकर यह भी कहा जा रहा हैकि उपद्रवियों ने इसके लिए पहले से ही तैयारी की थी। दुस्साहस देखिए कि अराजक तत्वों ने पुलिस थानों और चौकियों में घुसकर तोड़फोड़ की और एक पुलिसकर्मी की हत्या कर दी, वहीं दमकल के दफ्तर सहित उनकी कई गाड़ियों को भी आग लगा दी। यह किसी भी रूप में सामान्य घटना नहीं है। इससे पता चलता हैकि कानून व्यवस्था का उन्हें कोई भय नहीं है। यह किसी भी सरकार और उसके प्रशासन तंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। दुर्भाग्यवश उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार आने के बाद से इस तरह के संकेत बार-बार दिखाई पड़ रहे हैं। हर महीने प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा भड़कने की खबरें आती रही हैं। समाजवादी पार्टी की सरकार भले ही अपने पक्ष में तर्क दे, परंतु आज उत्तर प्रदेश में शासन के तौर-तरीकों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। उस पर आरोप लगने लगे हैं कि समाज में कटुता बढ़ाने में अखिलेश यादव की सरकार के नीतिगत फैसलों का अहम योगदान रहा है। किसी भी सरकार को पक्षपात से बचना चाहिए। एक समुदाय को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि चुनी हुई सरकार दूसरों के मुकाबले उसको कम तरजीह दे रही है। इस तरह की शासन प्रणाली से सामाजिक समरसता दरकने लगती है। अखिलेश यादव की सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि जनता ने उन्हें शासन और कानून व्यवस्था को चुस्त व जनोपयोगी बनाने के लिए चुना है। बेहतर होगा कि उनकी सरकार सभी को एकसमान तरजीह दे और कोई भी फैसला समाज के सभी वगरें व समुदायों के कल्याण को देखते हुए करे, बजाय वोट बैंक को ध्यान में रखने के। और यह सुनिश्चित करनी चाहिए कि कानून-व्यवस्था के साथ कोई भी अराजक तत्व खिलवाड़ नहीं कर सकेगा।
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