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दक्षिण एशियाई देशों का अहम मंच है सार्क

वहीं आर्थिक रूप से भी भारत बाकी सदस्यों से ज्यादा सशक्त है। ये सभी देश भारत के पड़ोस में स्थित हैं।

दक्षिण एशियाई देशों का अहम मंच है सार्क

नेपाल के काठमांडू में 25 से 27 नवंबर तक दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन यानी सार्क देशों के 18वें शिखर सम्मेलन का आयोजन हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को इसमें शिरकत करने काठमांडू जाएंगे। छह माह के बाद सार्क देशों के राष्ट्रप्रमुखों की यह दूसरी मुलाकात होगी। इससे पहले नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह के दौरान सभी की अनौपचारिक मुलाकात हुई थी। सार्क का अब तक का इतिहास देखें तो सम्मेलनों में क्षेत्रीय मुद्दे ज्यादा हावी रहे हैं। हालांकि इस बार सम्मेलन में आतंकवाद पर लगाम, गरीबी उन्मूलन, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर चर्चाके लिए सहमति बनी है। ये सभी ऐसे मुद्दे हैं जिनसे सार्क देश व्यापक रूप से प्रभावित हैं। यदि इसमें इन समस्याओं से उबरने के लिए कोई साझा कार्यक्रम बनाया जाता है तो सार्क बैठक की यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।

इसके अलावा सार्क देशों के बीच आर्थिक सहयोग की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं। आपसी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र समझौता यानी साफ्टा को लागू करने की मांग सालों से की जा रही है। अब समय आ गया है सार्क देश इस पर भी सोचें। दरअसल, सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का आर्थिक और राजनीतिक संगठन है। संगठन के सदस्य देशों की जनसंख्या (लगभग 1.5 अरब) को देखा जाए तो यह किसी भी क्षेत्रीय संगठन की तुलना में ज्यादा प्रभावशाली है। इसकी स्थापना 8 दिसंबर, 1985 को ढाका में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और भूटान द्वारा मिलकर की गई थी, जहां इसका पहला सम्मेलन हुआ। अप्रैल, 2007 में सार्क के 14वें शिखर सम्मेलन में अफगानिस्तान इसका आठवां सदस्य बना था। अमेरिका और आॅस्ट्रेलिया समेत इसके कई पर्यवेक्षक देश हैं। सार्क का मुख्यालय नेपाल में है। क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर अमेरिका और चीन के बाद सार्क देशों की संयुक्त अर्थव्यवस्था जीडीपी के मामले में तीसरे स्थान पर है। सार्क की नीति सदस्यों के बीच कल्याणकारी अर्थव्यवस्था और क्षेत्र में सामाजिक व सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा देना है। सार्क देशों में भारत का अहम स्थान है। भारत अन्य देशों की तुलना में भौगोलिक और आबादी की दृष्टि से सबसे बड़ा देश है।

वहीं आर्थिक रूप से भी भारत बाकी सदस्यों से ज्यादा सशक्त है। ये सभी देश भारत के पड़ोस में स्थित हैं। इस लिहाज से भी इन देशों के साथ भारत के मधुर संबंध होने जरूरी हैं। हालांकि भारत हमेशा से अपने पड़ोसियों के साथ अच्छे रिश्तों को प्राथमिकता देता रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को सार्कदेशों में ढांचागत व सामाजिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश करना चाहिए। इसके लिए इनके साथ द्विपक्षीय साझेदारी करनी चाहिए। सार्ककी अहमियत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बखूबी समझते हैं। यही कारण है कि उन्होंने अपने शपथग्रहण समारोह में सभी सार्क देशों के राष्टÑाध्यक्षों को विशेष रूप से आमंत्रित कियाथा। हालांकि बीते कुछ सालों से भारत के साथ इन देशों के संबंध पटरी से उतर से गएथे, परंतु केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद एक बार फिर सार्क देशों के साथ रिश्तों में गर्मजोशी आई है।

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