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चुनावी मौसम में नैंसी पावेल का इस्तीफा

पावेल ने गत 13 फरवरी को नौ साल के बहिष्कार को खत्म करते हुए मोदी से मुलाकात की थी।

चुनावी मौसम में नैंसी पावेल का इस्तीफा
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नई दिल्ली. भारत में अमेरिकी राजदूत नैंसी पावेल का समय से पूर्वइस्तीफा क्या एक सामान्य घटना है या इसके तार करवट बदल रही भारतीय राजनीति से भी जुड़ते हैं? अभी कुछ ही दिनों पहले यह खबर आई थी कि भारत के साथ संबंध सुधारने की दिशा में ओबामा प्रशासन उन्हें वापस अमेरिका बुला सकता है। हालांकि अमेरिका की ओर से इसे सामान्य बनाने की भरसक कोशिश हो रही है। कहा जा रहा है कि नैंसी पावेल का ओबामा प्रशासन से कोई मतभेद नहीं है,
चूंकि नैंसी आगामी मई में सेवानिवृत्त होने वाली हैं, लिहाजा उन्होंने खुद को व्यवस्थित करने के लिए ऐसा किया है, लेकिन जो तथ्य सामने आ रहे हैं वे कुछ और ही सच्चाई बयां कर रहे हैं। दरअसल, अमेरिका भी अब समझने लगा है कि इस वर्ष मई की गर्मियों में भारतीय राजनीति की फिजा बदलने वाली है। उसे लगने लगा है कि लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के पक्ष में लहर है।
चुनाव पूर्व सर्वे में भी मोदी प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार बनकर उभरे हैं। इसे देखते हुए अमेरिका काफी समय से उनके साथ संबंधों को सुधारने में जुटा हुआ था। नैंसी इसमें आड़े आ रही थीं क्योंकि वे मोदी विरोधी रुख अख्तियार की हुई थीं। यही नहीं उनको यूपीए सरकार की विदेश नीति के करीब माना जाता रहा है। ऐसे में 16वीं लोकसभा का गठन यदि नरेंद्र मोदी की अगुआई में होता है तो अमेरिका अलग-थलग पड़ सकता था। क्योंकि अमेरिका ही नहीं दुनिया का कोई भी लोकतांत्रिक देश भारत और उसके प्रधानमंत्री को दरकिनार कर नहीं चल सकता। लिहाजा वह पहले ही कड़वाहट को दूर कर लेना चाहता है, जिससे आने वाले दिनों में कोई परेशानी न हो पर इसके लिए नैंसी की विदाई पहले जरूरी थी।
अमेरिका की समस्या यह है कि उसने स्थानीय कानूनों का हवाला देकर 2002 के गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी को 2005 में वीजा देने से मना कर दिया था। एक तरह से अमेरिका ने नरेंद्र मोदी का बहिष्कार कर रखा था। उसके इस कदम का यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया तक ने अनुसरण किया था, परंतु इन देशों ने समय रहते नरेंद्र मोदी से अपनी दूरियां खत्म कर ली है। अमेरिका ने भी उनसे अपनी दूरी खत्म करने की कोशिश की है।
पावेल ने गत 13 फरवरी को नौ साल के बहिष्कार को खत्म करते हुए मोदी से मुलाकात की थी। हालांकि इसके बावजूद वे रिश्तों को सामान्य बनाने के प्रति गर्मजोशी नहीं दिखा रही थीं। ऐसा कहा जा रहा है कि भारत में राजनीतिक बदलाव के बारे में अमेरिका को अवगत कराने में पावेल विफल रहीं। यही नहीं गत वर्ष दिसंबर में जब भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े का मामला हुआ तब भी नैंसी पावेल स्थिति को सामान्य बनाने में सफल नहीं हो पायीं। जिससे दोनों देशों के संबंधों में कटुता बढ़ती गई। अब अमेरिका हालात को तेजी से संभालना चाहता है। वह ऐसे शख्स को लाना चाहता है जो नई सरकार के साथ उसके रिश्ते को मजबूत करे और आगे ले जाए। उम्मीद की जानी चाहिए कि अमेरिका भारत की नई सरकार के साथ मिलकर संबंधों को आगे बढ़ाने में सकारात्मक पहल करेगा।
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