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चिंतन: राष्ट्रपति शासन लगाने के सिवाय चारा क्या था

उत्तराखंड में भी कांग्रेस के ही विधायकों ने हरीश रावत के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया।

चिंतन: राष्ट्रपति शासन लगाने के सिवाय चारा क्या था
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उत्तराखंड राज्य को इसी अद्योगति को प्राप्त होना था। पिछले नौ दिन से जिस तरह से वहां संविधान को ताक पर रखकर सरकार, विधानसभा और व्यवस्था को चलाने की कोशिशें हो रही थीं, उसका परिणाम राष्ट्रपति शासन के रूप में सामने आना ही था। अरुणाचल प्रदेश के बाद यह दूसरा पहाड़ी राज्य है, जहां कांग्रेस नेतृत्व अपनी सरकार को बनाए रख पाने में विफल रहा है। यह आश्चर्य की बात है कि अपनी नाकामी का ठीकरा कांग्रेस भाजपा नीत केन्द्र सरकार के सिर पर फोड़ने की चेष्टा करती हुई दिखाई दे रही है। अरुणाचल प्रदेश में भी उसके विधायकों ने बगावत की जिसके चलते वहां की सरकार गिरी।

उत्तराखंड में भी कांग्रेस के ही विधायकों ने हरीश रावत के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया। यह और भी हैरत की बात है कि असंतुष्ट विधायक पिछले डेढ़ साल से अपनी बात रखने के लिए राहुल गांधी से मिलने की कोशिश कर रहे थे। समय मांग रहे थे परन्तु पार्टी नेतृत्व के पास अपने ही विधायकों से मिलने का वक्त नहीं था। अब वहां राष्ट्रपति शासन लागू हो गया है तो कांग्रेस और कुछ विरोधी दलों के नेता इसे लोकतंत्र की हत्या बताते हुए उन तमाम तथ्यों की अनदेखी करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनके चलते यह नौबत आई है।

अलग-अलग समय पर कांग्रेस के असंतुष्ट विधायकों की संख्या घटती बढ़ती रही, परन्तु असंतोष कायम रहा। बजट सत्र के दौरान पहले सूचना आई कि सत्तारूढ़ पार्टी के ग्यारह से लेकर तेरह विधायक तक विनियोग विधेयक के खिलाफ मत देकर सदन में ही हरीश रावत सरकार को गिरा सकते हैं। नियम यह कहता है कि बजट पारित करते समय यदि एक विधायक भी मत विभाजन की मांग करे तो स्पीकर इसके लिए बाध्य है। सदन की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही पैंतीस विधायकों ने लिखित में स्पीकर और राज्यपाल से मत विभाजन की मांग की।

कार्यवाही के दौरान भी उन पैंतीस एमएलए ने अपनी मांग दोहराई, जिसकी वीडियो फुटेज उपलब्ध है परन्तु उत्तराखंड विधानसभा अध्यक्ष ने संविधान, नियमों, परंपराओं को ताक पर रखते हुए ध्वनिमत से बजट पारित होने का ऐलान कर दिया। भारतीय संसदीय प्रणाली में इस तरह का उदाहरण शायद ही हो। चूंकि हरीश रावत सरकार अल्पमत में आ गई थी, इसलिए बागी विधायकों और भाजपा की मांग पर राज्यपाल ने मुख्यमंत्री से कहा कि वे 28 मार्च तक अपना बहुमत सिद्ध करें। इसके लिए कांग्रेस सरकार ने वो सब अनैतिक कार्य किए, जिसके लिए स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रणाली में कोई जगह नहीं है। स्पीकर से नौ बागी विधायकों को अनुशानहीनता के नोटिस दिलवाए गए। उन्हें 28 मार्च से पहले अयोग्य घोषित करने की कोशिश की गई ताकि हरीश रावत सरकार अपना बहुमत सिद्ध कर सके।

यही नहीं, इस बीच एक स्टिंग आपरेशन भी सामने आया, जिसमें खुद मुख्यमंत्री बागी विधायकों के नेता हरक सिंह रावत और मध्यस्थ पत्रकार से सौदेबाजी करते हुए साफ देखे जा रहे हैं। यानी बगावत करने वाले विधायकों को किसी भी कीमत पर वह वापस बुलाने के लिए कटिबद्ध दिखाई दे रहे हैं। वह यहां तक कह रहे हैं कि वो पांच करोड़ दे सकते हैं। बाकी वो अपने विभागों से कमा सकते हैं।

यानी मुख्यमंत्री अपनी सरकार बचाने के लिए बागियों को उत्तराखंड को लूटने की इजाजत भी देने को तैयार थे। ऐसे हालातों में, जबकि स्पीकर की भूमिका पहले से ही संदिग्ध हो, क्या यह उम्मीद की जा सकती थी कि 28 मार्च को सदन के भीतर निष्पक्ष कार्यवाही होती, जहां हरीश रावत को अपनी सरकार का बहुमत साबित करना था? जिस तरह के हालात उत्तराखंड में उत्पन्न हो गए थे, उसमें यह धारा 356 के तहत कार्रवाई करने का एकदम सटीक समय और मामला था। सही बात तो यह है कि केन्द्र सरकार ने वहां राष्ट्रपति शासन लगाकर लोकतंत्र को बचाया है।

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