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विलुप्ति की चिंता छोड़ हिन्दी को समृद्ध बनाएं

योग दिवस को मिले समर्थन के बाद इसकी संभावना बन रही है कि देर सबेर हिन्दी को भी विश्व जगत का समर्थन मिल जाएगा।

विलुप्ति की चिंता छोड़ हिन्दी को समृद्ध बनाएं

वर्ष 1975 से 2015 तक एक लंबा वक्त गुजरा है। इस बीच समाज में कई स्तरों पर बदलाव आया है। इस बदलाव से हिन्दी भी गुजर रही है। परिवर्तन के दौर में विश्व हिन्दी दिवस का आयोजन काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। 32 साल बाद एक बार फिर हिन्दी के महाकुंभ कहे जाने वाले इस सम्मेलन का आयोजन देश में किया जा रहा है जिसमें 39 देशों के विद्वान इसे समृद्ध बनाने व विस्तार करने के मुद्दे पर मंथन कर रहे हैं। उम्मीद है कि यह सम्मेलन एक कर्मकांड बनकर नहीं रहेगा, बल्कि यहां से कुछ ऐसे फैसले लिए जा सकेंगे जिससे राजभाषा हिन्दी देश विदेश में वह स्थान पा सकेगी जिसकी वह वास्तव में हकदार है। ऐसा इसलिए भी हैकि केंद्र में हिन्दी प्रेमी सरकार आई है। न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश हो या विदेश अपना संबोधन हिन्दी में देना पसंद करते हैं, बल्कि दूसरे वरिष्ठ मंत्री भी अच्छे वक्ताओं में गिने जाते हैं। अब तक के नौ सम्मेलनों में जितने भी प्रस्ताव पारित हुए हैं सबमें दो मुद्दों पर खासा जोर रहा है।

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प्रथम, हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता मिले और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए समयबद्ध कार्यक्रम बनाया जाए तथा दूसरा, हिंदी को साहित्य के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान, न्याय, प्रशासन और वाणिज्य की भाषा बनाई जाए, लेकिन ये दोनों प्रस्ताव तमाम सदिच्छाओं के बावजूद लचर व्यवस्था व कमजोर राजनीतिक इच्छा-शक्ति की भेंट चढ़ चुके हैं। हालांकि इस बार भी इन उद्देश्यों पर काफी जोर दिया जा रहा है, लेकिन पहले की तुलना में इस दिशा में सरकार ने कुछ कदम बढ़ाएं हैं। जैसे संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को आधिकारिक दर्जा दिलाने के लिए प्रधानमंत्री ने अपने स्तर पर जोरदार पहल की है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के दो तिहाई सदस्य देशों का समर्थन जरूरी है। योग दिवस को मिले समर्थन के बाद इसकी संभावना बन रही है कि देर सबेर हिन्दी को भी विश्व जगत का समर्थन मिल जाएगा। इसका जिस तरह विश्व में विस्तार हो रहा है, उससे भी संयुक्त राष्ट्र पर दबाव बना है। इसमें कोई दो राय नहीं कि नीति, विधि व न्याय, प्रशासन, ज्ञान-विज्ञान, वाणिज्य आदि से संबंधित पाठ्य सामग्रियों का हिन्दी में नहीं होना एक बड़ी समस्या है।

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यदि छात्रों को मातृभाषा में ज्ञान देने का सपना साकार करना है, जिससे उनकी नैसर्गिक प्रतिभा का विकास हो सके, तो हिन्दी में इन विषयों की सामग्रियों को उपलब्ध कराना होगा। इसके लिए ऐसी शब्दावलियों का विकास करना होगा जो आसानी से जुबान पर चढ़ जाएं। चूंकि हिन्दी में एक बड़ा बाजार खड़ा होने लगा है, लिहाजा इसकी विलुप्ति की चिंता छोड़ इसे कैसे दूसरी भाषाओं से जोड़ते हुए और समृद्ध बनाया जाए, इस पर मंथन करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने भी कहा हैकि कभी भी भाषा जड़ नहीं हो सकती, उसमें भी चेतना होती है और वह हर काल खंड में कुछ न कुछ बदलती रहती है। इससे वह भाषा और प्राणवान होती है। हमें उन्हें स्वीकरना चाहिए। आज तकनीकी का प्रभाव हर ओर दृष्टिगोचर हो रहा है। भाषाएं भी इससे अछूती नहीं रही हैं। माना जा रहा हैकि आने वाले दिनों में वही भाषा रेस में टिक पाएगी, जो इसके साथ चलेगी। ऐसे में हिन्दी को भी तकनीकी से परिचित कराने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कुल मिलाकर, हिन्दी का भविष्य बेहतर है, क्योंकि इसे लिखने-बोलने-पढ़ने वालों की संख्या बढ़ रही है। साथ ही इसमें रोजगार के भी भरपूर अवसर उपलब्ध हो रहे हैं।

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