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आखिरकार पूरी हुई वन रैंक वन पेंशन की मांग

1990 में रिटायर हुए कर्नल को आज हुए रिटायर कर्नल के बराबर ही पेंशन मिलेगी।

आखिरकार पूरी हुई वन रैंक वन पेंशन की मांग
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आखिरकार पूर्वसैनिकों की वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) की चार दशक से ज्यादा पुरानी मांग पूरी हो गई। इसी के साथ मोदी सरकार ने अपने एक प्रमुख वादे को भी पूरा कर दिया। इसका फायदा देश के तीस लाख परिवारों को मिलेगा क्योंकि अब समान रैंक से रिटायर होने वाले सभी सैन्यकर्मियों को समान पेंशन मिलेगी। इसका मतलब हुआ कि 1990 में रिटायर हुए कर्नल को आज हुए रिटायर कर्नल के बराबर ही पेंशन मिलेगी। पहले इसमें काफी विसंगतियां थीं। एक ही रैंक से रिटायर होने वाले सैन्य कर्मियों की पेंशन राशि में काफी अंतर था। वन रैंक वन पेंशन को एक जुलाई, 2014 से लागू किया जाएगा और इसका आधार वर्ष 2003 होगा। इसके अतिरिक्त पेंशन की हर पांच साल में समीक्षा होगी। वन रैंक वन पेंशन को लागू करने में सालाना आठ से दस हजार करोड़ रुपये की धनराशि खर्च होगी। हालांकि कुछ लोग भ्रम फैला रहे थे कि प्रीमैच्योर रिटायर हुए जवानों को यह लाभ नहीं मिलेगा। उन्हें प्रधानमंत्री ने जवाब देते हुए कहा हैकि वन रैंक वन पेंशन का लाभ सभी रिटायर सैनिकों को मिलेगा। उन्होंने यह भी साफ कर दिया हैकि इस पर सरकार कोईआयोग नहीं बनाने जा रही है, बल्कि एक न्यायिक समिति गठित करेगी जो कि इस योजना को लागू करने में सामने आने वाली विसंगतियों को दूर करने से संबंधित एक रिपोर्ट छह माह में दे देगी।

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हालांकि यह निराशाजनक है कि पूर्व सैनिकों का एक समूह सरकार की घोषणा से असंतुष्ट नजर आ रहा है। दरअसल, पूूर्व सैनिक पेंशन की समीक्षा पांच साल के बजाय हर साल या दो साल में चाह रहे हैं। ओआरओपी लागू करने की तिथि एक जुलाई 2014 के बजाय अप्रैल 2014 करने की मांग कर रहे हैं। अधिकतम और न्यूनतम पेंशन के औसत के आधार पर ओआरओपी तय करने के बजाय अधिकतम पेंशन के आधार पर इसे तय करने की मांग कर रहे हैं। वहीं एक सदस्यीय न्यायिक समिति के बजाय पांच सदस्यीय न्यायिक समिति चाह रहे हैं जिसमें उनके भी तीन प्रतिनिधि रहें। सरकार कह चुकी हैकि हर साल पेंशन की समीक्षा नहीं हो सकती, यह काफी पेचीदा है। दुनिया में कहीं ऐसा नहीं होता। वहीं उन्हें न्यायिक समिति के पास अपनी बातें रखने की छूट है। जाहिर है, ये ऐसे मामले नहीं हैं जिन्हें लेकर सरकार की आलोचना की जाए अथवा लिखित आश्वासन नहीं मिलने की सूरत में फिर से धरना-प्रदर्शन पर बैठने की बात की जाए।

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यह उचित नहीं कि पूर्व सैनिक छह माह भी रुकने को तैयार नहीं। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि ओआरओपी की मांग 1973 से ही की जा रही थी, लेकिन किसी भी पूर्व सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। ऐसे में आज जब देश के सामने आर्थिक चुनौतियां खड़ी हैं तब इस तरह के बड़े फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए। विपक्ष का रवैया भी हैरान करने वाला है। एक तो वह अपने शासन काल में इस महत्वपूर्ण मांग की अनदेखी करती रही और जब चुनाव आए तो पांच सौ करोड़ रुपये का आवंटन कर खानापूर्ति कर दी। अब केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक ओआरओपी की घोषणा कर दी है तब इसका स्वागत किया जाना चाहिए और ऐसा माहौल नहीं बनाया जाना चाहिए जिससे लगे कि सरकार अपने वादे से पीछे हट गई क्योंकि देश में सैनिकों से जुड़ा मुद्दा काफी संवेदनशील होता है। देश पर इसका नकारात्मक असर हो सकता है।

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