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नेपाल का संविधान बनना ऐतिहासिक उपलब्धि

रामबरन यादव देश के प्रथम राष्ट्रपति और माओवादी नेता पुष्पकमल ढहल प्रचंड नेपाल गणराज्य के प्रथम प्रधानमंत्री चुने गए।

नेपाल का संविधान बनना ऐतिहासिक उपलब्धि

आखिरकार सात सालों की लंबी कवायद के बाद नेपाल की संविधान सभा ने बुधवार को नए संविधान को मंजूरी दे दी। अब इस पर सांसदों के हस्ताक्षर होंगे जिसकी पुष्टि संविधान सभा के अध्यक्ष करेंगे और फिर 20 सितंबर से इसे लागू कर दिया जाएगा। पड़ोसी देश नेपाल के लिहाज से इसे ऐतिहासिक उपलब्धि कहा जाना चाहिए। हालांकि बेहतर होता कि यह सर्वसम्मति से पारित हुआ होता क्योंकि मधेशी दल सहित करीब दो दर्जन सांसद अभी भी संविधान के कुछ प्रावधानों पर अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं। यह उचित नहीं कि आरंभ से ही कुछ मुद्दों पर देश बंटा नजर आए। किसी भी देश के संविधान की रचना इस तरह होनी चाहिए जिससे कि वहां के हर नागरिक को लगे कि उसमें उसके अधिकारों की रक्षा की गई है। यानी हर नागरिक को लगना चाहिए कि संविधान उससे जुड़ा हुआ है। मौजूदा हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच यह देखना होगा कि आने वाले दिनों में नेपाल का संविधान इस कसौटी पर कितना खरा उतरता है।

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बहरहाल, इस संविधान में कुल 308 अनुच्छेद हैं। इसके मुताबिक नेपाल गणराज्य का ढांचा संघीय होगा जिसमें सात प्रांत होंगे। जहां प्रतिनिधित्व जनसंख्या के आधार पर न होकर भौगोलिक इलाके के आधार पर तय होगा। यह एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा जहां सभी धर्मों को बराबर का दर्जा मिलेगा। राज्य किसी भी मजहब को लेकर पक्षपात नहीं करेगा। नेपाल के राजशाही से लोकशाही राष्ट्र बनने की यात्रा काफी उठापटक वाली रही है। दशकों तक चले गृहयुद्ध और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद 2005 में तत्कालीन नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र को नेपाल में संसदीय व्यवस्था बहाल करनी पड़ी था, परंतु माओवादी विद्रोह, अल्पसंख्यक समुदायों के असंतोष, राजनीतिक दलों के बीच मतभेदों की खाई ने ऐसा वातावरण पैदा कर दिया कि उसे शांत करने के लिए 2007 में अंतरिम संसद ने राजशाही को समाप्त कर एक लोकतांत्रिक नेपाल के गठन का निर्णय पास कर दिया। उसी के बाद नेपाल में संविधान निर्माण की यात्रा आरंभ हुई। पहली संविधान सभा का चुनाव 2008 में हुआ, जिसमें माओवादी दलों को भारी बहुमत मिला।

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रामबरन यादव देश के प्रथम राष्ट्रपति और माओवादी नेता पुष्पकमल ढहल प्रचंड नेपाल गणराज्य के प्रथम प्रधानमंत्री चुने गए। बाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मई 2012 तक नए संविधान को पास करने के निर्देश को न पूरा किए जाने की हालत में तत्कालीन प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टाराई ने पहली संविधान सभा को भंग कर दिया। उसके बाद नवंबर 2013 में दूसरी संविधान सभा का चुनाव हुआ जिसमें नेपाली कांग्रेस को सबसे अधिक सीटें मिलीं। इसके नेता सुशील कुमार कोइराला ने संयुक्त मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर नई सरकार का गठन किया और 22 जनवरी, 2015 तक देश के नए संविधान का प्रारूप तैयार करने का वादा किया पर अब जाकर नेपाल को नया संविधान मिला है। बहरहाल, नेपाल का यह संविधान एक तरह से उसके लिए उपलब्धि ही है क्योंकि विभिन्न दलों के बीच जिस तरह मतभेद बढ़ रहे थे उसे देखते हुए कई तरह की आशंका जताई जाने लगी थी।

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