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संतुलित मंत्री परिषद के साथ सधी हुई शुरुआत

मंत्रियों की औसत आयु निकालें तो वह साठ साल के करीब बैठेगी।

संतुलित मंत्री परिषद के साथ सधी हुई शुरुआत
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नई दिल्ली. नरेन्द्र मोदी ने अपने पूरे चुनाव अभियान के दौरान बार-बार एक बात को दोहराया-मिनीमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस। अपनी मंत्री परिषद का आकार छोटा रखकर उन्होंने अपनी कथनी पर अमल के स्पष्ट संकेत दे दिये हैं। राजस्थान और गुजरात सहित कुछ राज्यों को उचित प्रतिनिधित्व अभी नहीं मिलने की बात भले ही सामने आ रही है परन्तु माना जा रहा है कि निकट भविष्य में प्रधानमंत्री मोदी जब विस्तार करेंगे तब इस असंतुलन को दूर कर लेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी मंत्री परिषद अपेक्षाकृत नौजवान चेहरों वाली है।
मंत्रियों की औसत आयु निकालें तो वह साठ साल के करीब बैठेगी। उन्होंने समाज के हर वर्ग को सरकार का हिस्सा बनाया है। खासकर महिलाओं को तरजीह दी है। पूवरेत्तर से लेकर दक्षिण के उन राज्यों को भी प्रतिनिधित्व दिया है, जहां से अतीत में भाजपा को सीटें नहीं मिलती थीं और 2014 के परिवर्तन के इस चुनाव में उसे अच्छी खासी संख्या में सीटें हासिल हुई हैं। नरेन्द्र मोदी के सामने पहली चुनौती यही थी कि वे एक संतुलित कैबिनेट का गठन करें। ऐसा करने के लिए थोड़ा समय उन्होंने जरूर लिया परन्तु कह सकते हैं कि अंतत: वे एक अच्छा संदेश देने में सफल रहे।
सोलह मई को नतीजे आ गये थे। मोदी चाहते तो बीस-इक्कीस मई तक देश की बागडोर संभाल सकते थे परन्तु वे जल्दबाजी में दिखायी नहीं दिये। वे शुरुआती ठोस कदमों और फैसलों से देश और दुनिया को कुछ संदेश देना चाहते थे, जिसमें बहुत हद तक सफल भी रहे। सोच-विचारकर जिस तरह उन्होंने दक्षेस देशों के प्रमुखों को शपथ-ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया, उसे उनकी दीर्घकालिक कूटनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
कुछ घटनाओं को लेकर जिस तरह का पेचीदा और तनावपूर्ण माहौल पिछले कुछ वर्षों से दक्षिण एशियाई देशों के बीच बना हुआ है, उसमें सुधार लाने की जरूरत तो महसूस की जा रही थी, परन्तु किसी भी तरफ से संजीदा पहल नहीं हो पा रही थी। खासकर र्शीलंका और पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते सामान्य नहीं रह गये थे। नरेन्द्र मोदी ने अपनी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में इन दोनों के साथ-साथ बाकी पड़ोसी देशों को आमंत्रित करके इसकी शुरुआत कर दी है।
अमेरिका और ब्रिटेन सहित दुनिया की कई शक्तियों ने नए प्रधानमंत्री की इस पहल की मुक्तकंठ से सराहना की है। खासतौर से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और र्शीलंका के राष्ट्रपति महिन्दा राजपक्षे से जब मंगलवार को उनकी मुलाकातें होंगी, उस पर पूरे विश्व की निगाहें टिकी हुई होंगी। हालांकि अल्प समय की इन मुलाकातों से किसी तरह के नतीजों की उम्मीद कर बैठना जल्दबाजी होगी परन्तु इन मेल मुलाकातों से ही अमन, आगे की वार्ता और परस्पर व्यापार-कारोबार बढ़ाने के रास्ते खुलेंगे, ऐसा कूटनीति के जानकारों को भरोसा है।
पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते इस कारण खराब से खराब होते चले गये हैं क्योंकि भारत की तरफ से अतीत में की गई तमाम पहल पाकिस्तान की वादा खिलाफियों के चलते सिरे नहीं चढ़ सकी। नवाज शरीफ वहां के ऐसे रहनुमा माने जाते हैं, जो भारत के साथ अमन के पैरोकार रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में बनने वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए उनके नई दिल्ली पहुंचने की घटना को बेहद अहम माना जा रहा है। नेपाल, मालदीव, भूटान और मॉरिशस के अलावा कुछ अन्य देशों के प्रमुखों और बांग्लादेश लोकसभा की अध्यक्ष का दिल्ली पहुंचना इसका भी द्योतक है कि विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर तेजी से उभर रहे भारत में ये देश वैश्विक मंचों पर दक्षिण एशिया का नेतृत्व करने की असीम क्षमता देखते हैं।
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