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मीडिया पर आतंकवादी हमला चिंता का विषय, मिलकर करना होगा आतंकवाद का सामना

अब समय आ गया हैकि समूचा विश्व इसके खिलाफ अंतिम लड़ाई के लिए एकजुट हो जाए।

मीडिया पर आतंकवादी हमला चिंता का विषय, मिलकर करना होगा आतंकवाद का सामना
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अमानवीयता का पर्याय बने इस्लामिक स्टेट (आईएस) के आतंकवादियों द्वारा जापान के दो पत्रकारों हरुन युकावा और केंजी गोतो की गला रेत कर हत्या की जितनी निंदा की जाए कम है। हत्या का वीडियो सामने आने के बाद पूरी दुनिया स्तब्ध है। यह असंवदेनशीलता की पराकाष्ठा है। कोई भी धर्म इस तरह की बर्बरता की इजाजत नहीं दे सकता है। पिछले साल अक्टूबर में आईएस के आतंकवादियों ने इराक में पत्रकारिता कर रहे हारुन युकावा को पकड़ लिया था, जिसे बचाने के लिए केंजी गोतो वहां गए थे। ये दोनों पत्रकार गहरे दोस्त थे, लेकिन आतंकवादियों ने बाद में उन्हें भी अपने कब्जे में ले लिया था। आईएस ने दोनों की रिहाई के बदले पहले तो करोड़ों रुपए की फिरौती मांगी पर बाद में जॉर्डन की जेल में बंद एक महिला आतंकी को रिहा करने की मांग रख दी थी।

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जाहिर है, जापान ने आतंकवाद के आगे घुटने टेकने से मना कर दिया। हालांकि, जापान ने दोनों पत्रकारों को मुक्त कराने के लिए सभी कूटनीतिक प्रयास किए, परंतु आतंकवादियों ने एक न सुनी। गत वर्षआईएस ने इसी तरह दो अमेरिकी पत्रकारों स्टीवन सोटलॉफ और जेम्स फोली की हत्या कर दी थी। देखा जा रहा हैकि आतंकी पहले पत्रकारों का अपहरण कर रहे हैं और फिर फिरौती में भारी रकम मांग रहे हैं। यदि कोई देश उनके द्वारा मांगी रकम दे दे रहा है तो वे उस पत्रकार को छोड़ दे रहे हैं, वरना सिर कलम कर दे रहे हैं।

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दरअसल, जेहादी संगठनों को यह लग रहा है कि पत्रकारों के अपहरण से उन्हें आर्थिक मजबूती मिल सकती है। इसलिए वे उनकी रिहाई के बदले मोटी रकम मांग रहे हैं। द कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के अनुसार इस समय इस्लामिक स्टेट के कब्जे में कम से कम 20 पत्रकार हैं। इसमें कई पश्चिमी देशों से हैं और कई सीरिया से संबंधित हैं। ये सभी वहां पत्रकारिता करने गए थे। एक अनुमान के अनुसार 2013 में बंधक पत्रकारों को छोड़ने के बदले इस्लामिक स्टेट को 20 मिलियन डॉलर, जबकि 2014 में लगभग 30 मिलियन डॉलर की राशि मिली। पत्रकारों की हत्या के पीछे उनका राजनीतिक उद्देश्य भी है, क्योंकि पश्चिमी देशों से लंबे समय से उनका टकराव है।

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हाल ही में इंटरनेशनल फेडरेशन आॅफ जर्नलिस्ट द्वारा जारी एक आंकड़े के अनुसार पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक व सीरिया पत्रकारिता के लिहाज से खतरनाक देश हो गए हैं। लिहाजा कई बड़े मीडिया घरानों ने अपने पत्रकारों को इन मुल्कों में भेजना बंद कर दिया है। वर्ष 2013 में 105 पत्रकार आतंकवाद के शिकार हुए थे। 2014 में यह संख्या बढ़कर 118 हो गई। पत्रकारों की मंशा इन क्षेत्र विशेष की घटनाओं से निष्पक्षतापूर्वक दुनिया को अवगत करना होता है। ऐसे में आतंकवाद प्रभावित देशों में पत्रकारों की हत्या और उनके अपहरण की बढ़ती घटनाओं ने पूरी दुनिया को परेशान कर दिया है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी दबाने का प्रयास है। गत दिनों फ्रांस के शार्ली एब्दो के कई पत्रकारों की अलकायदा के आतंकियों ने हत्या कर दी थी। बढ़ता आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए चिंता की बात है। अब समय आ गया है कि समूचा विश्व इसके खिलाफ अंतिम लड़ाई के लिए एकजुट हो जाए।

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