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खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर भारत की बड़ी जीत

अब डब्ल्यूटीओ में व्यापार सुगमता करार (टीएफए) के कार्यान्वयन का रास्ता खुल गया है।

खाद्य सुरक्षा के मुद्दे पर भारत की बड़ी जीत
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किसानों और गरीबों के हित में जारी खाद्य सुरक्षा योजना और कृषि सब्सिडी के मुद्दे से संबंधित विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत के प्रस्ताव पर अमेरिका का समर्थन मिलना मोदी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि है। अब डब्ल्यूटीओ में व्यापार सुगमता करार (टीएफए) के कार्यान्वयन का रास्ता खुल गया है। भारत प्रस्ताव को डब्ल्यूटीओ की आम परिषद में अनुमोदन के लिए भेजेगा। यदि आम परिषद इसे स्वीकार लेती है तो भारत टीएफए पर दस्तखत कर सकेगा।

सितंबर में अमेरिका दौरा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बराक ओबामा को इस मुद्दे पर भारत की चिंताओं से अवगत कराया था, उसके बाद से अमेरिका के रुख में नरमी की उम्मीद की जाने लगी थी। अब अमेरिका ने मान लिया है कि भारत अपने कृषि सब्सिडी और खाद्य सुरक्षा योजनाओं को तब तक जारी रख सकता है जब तक इसका कोई स्थाई समाधान नहीं निकलता। इसे डब्ल्यूटीओ में कोई देश चुनौती भी नहीं दे सकता है। जबकि इससे पूर्व के प्रावधानों, जिसे पीस क्लाउज कहा गया था, के अनुसार टीएफए पर हस्ताक्षर करने वाले डब्ल्यूटीओ के सभी सदस्य देशों को कृषि सब्सिडी को अपने कुल कृषि उत्पादन के दस फीसदी के स्तर पर लाना होगा। इसके लिए चार वर्ष की समय सीमा निश्चित की गई थी। कहा गया था कि कृषि सब्सिडी की गणना 1986-87 की कीमतों पर की जाएगी।

भारत को पीस क्लाउज के प्रावधानों पर आपत्ति थी, क्योंकि यदि भारत इन शर्तों को मान लेता तो लाखों किसान और गरीबों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता। सरकार किसानों के हितों को पूरा करने के लिए कृषि सब्सिडी देती है। वहीं गरीबों की खाद्य सुरक्षा के लिए भी कई योजनाएं चलाती है। लिहाजा उन्हें बंद करना पड़ता या फिर उसमें कटौती करनी पड़ती। भारत सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के जरिए किसानों की पैदावार को बड़े पैमाने पर खरीदती है। इन खरीदे गए खाद्यान्नों को भंडारगृह में रखती है और फिर विभिन्न योजनाओं के तहत इन्हें कम दाम पर गरीबों में बांटती है। इसी वजह से जुलाई में भारत ने इस करार पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था।

मोदी सरकार का स्पष्ट मानना था कि वह किसानों और गरीबों के हितों के साथ समझौता नहीं कर सकती है। हालांकि विकसित देशों ने इसके लिए भारत पर काफी दबाव बनाया। यह भी भय दिखाया गया कि अपने अड़ियल रुख के कारण विश्व जगत में भारत अलग-थलग पड़ जाएगा। यह आरोप भी लगे कि भारत के विरोधी रुख के कारण डब्ल्यूटीओ का भविष्य अनिश्चितता के भंवर में फंस गया है। अब आने वाले दिनों में टीएफए के वजूद में आने की संभावना बढ़ गई है। दरअसल, दिसंबर 2013 में इंडोनेशिया के बाली में टीएफए पर सभी देशों के बीच एक व्यापक सहमति बनी थी। जिसके अनुसार इस साल जुलाई में डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों को हस्ताक्षर कर देना था।

टीएफए विभिन्न देशों के बीच होने वाले व्यापार को सुगम बनाएगा। अर्थात इससे विश्व व्यापार आसान, तेज और सस्ता होगा, क्योंकि सदस्य देशों को सिस्टम को पारदर्शी बनाने, लालफीताशाही को कम करने और जरूरी ढांचागत विकास करने होंगे। माना जा रहा हैकि इससे विश्व अर्थव्यवस्था की रफ्तार दो फीसदी बढ़ जाएगी और लाखों लोगों को रोजगार मिलेगा। भारत की कभी व्यापार सुगमता में बाधा डालने की मंशा नहीं थी। भारत बहुपक्षीय व्यापार का हमेशा से समर्थक रहा है। कुल मिलाकर कूटनीतिक स्तर पर इसे मोदी सरकार की एक बड़ी जीत मानी जानी चाहिए।

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