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भारत-वियतनाम रिश्तों को नई ऊंचाई देने की कोशिश

भारत और वियतनाम की सारी गतिविधियां इस दायरे में ही सीमित हैं।

भारत-वियतनाम रिश्तों को नई ऊंचाई देने की कोशिश
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भारत और वियतनाम के सांस्कृतिक संबंध सदियों पुराने हैं। अब ये दोनों देश रणनीतिक रिश्तों, जिसमें राजनीति, आर्थिक, सामरिक और अंतरिक्ष प्रमुख हैं, को भी नई ऊंचाई देने की कोशिश कर रहे हैं। इस कड़ी में वियतनाम के प्रधानमंत्री गुएन तान डुंग का यह भारत दौरा काफी अहम साबित हुआ है। उनकी यह तीसरी भारत यात्रा है और इससे पूर्व प्रधानमंत्री डुंग 2007 और 2012 में भारत दौरे पर आ चुके हैं। भारत के लिए भी वियतनाम कितनी अहमियत रखता है इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि देश में मई में नई सरकार बनने के बाद पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और फिर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी वियतनाम की यात्रा कर चुके हैं।

भारत की पूर्व की ओर देखो नीति में वियतनाम अहम स्थान रखता है। यह बात मंगलवार को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वियतनाम के प्रधानमंत्री डुंग के साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भी स्पष्ट रूप से महसूस की गई। दोनों देशों ने आपसी संबंधों को नया आयाम देने के लिए अंतरिक्ष, रक्षा, बंदरगाह समेत कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए। वियतनाम नालंदा विश्वविद्यालय के विकास में सहयोग देगा। वहीं दोनों देशों की जनता के बीच आपसी संपर्क बढ़ाने के उद्देश्य से अगले माह से भारत की एक निजी विमान कंपनी वियतनाम की हो-ची मिन्ह सिटी से सीधी विमान सेवा भी शुरू कर रही है, जबकि वियतनाम की विमान कंपनियां अगले वर्ष से इस तरह की सीधी उड़ान सेवा शुरू करेंगी।इसके अलावा दोनों देशों के बीच तीन अतिरिक्त तेल ब्लॉक आवंटन पर साझेदारी बढ़ाने पर भी सहमति बनी है। वियतनाम हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह चीन का पड़ोसी देश है। इसके अलावा वियतनाम के अधिकार क्षेत्र में आने वाला दक्षिण चीन सागर का हिस्सा समुद्री व्यापार के लिए काफी अहम होने के साथ-साथ इस क्षेत्र में गैस और तेल के बड़े भंडार पाए गए हैं। वहीं इसका रणनीतिक महत्व भी है। दक्षिण चीन सागर से ही ज्यादातर व्यापारिक जहाजें गुजरती हैं। हमारी ओएनजीसी कंपनी लंबे समय से गैस और तेल उत्खनन और खोज में वियतनाम का सहयोग कर रही है।

देश में ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए यह साझेदारी अहम है। वहीं वियतनाम से मधुर रिश्ते हमारे समुद्री व्यापार को भी सहूलियत प्रदान करेंगे। लेकिन इसमें चीन अड़चन पैदा कर रहा है। दो माह पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की यात्रा के दौरान भारत और वियतनाम के बीच हुए समझौते पर भी बीजिंग ने नकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी। इसकी जड़ में उसकी विस्तारवादी नीति रही है। दरअसल, चीन इस पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना अधिकार जताता है। जो कि अंतरराष्ट्रीय कानून का सरासर उल्लंघन है। इस कानून में किसी देश का उसकी समुद्री सीमा पर कहां तक अधिकार होगा इसका स्पष्ट उल्लेख किया गया है।

भारत और वियतनाम की सारी गतिविधियां इस दायरे में ही सीमित हैं। चीन को भी चाहिए कि बेवजह बाधा और विवाद खड़ा करने की बजाय कानूनसम्मत निर्धारित सीमा में ही रहे। भारत-वियतनाम ने जिस तरह से मित्रता को आगे बढ़ाने के लिए एकजुटता दिखाई है, उससे न केवल दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में शांति और स्थिरता आएगी ही बल्कि चीन को करारा जवाब भी मिला होगा।

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