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चिंतन: होली जैसे उत्सव विश्व में शांति के लिए अहम

पूर्णिमा पर होली और रंग का उत्सव मनाए जाने की पुरातन परंपरा हमारे देश में वर्षों से चली आ रही है।

चिंतन: होली जैसे उत्सव विश्व में शांति के लिए अहम
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होली का पर्व देश के अधिकांश राज्यों, नेपाल और उन देशों में बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है, जहां इसे मानने वालों की बड़ी जनसंख्या रहती है। फाल्गुन मास में बसंतोत्सव शुरू होने के साथ ही होली का त्योहार आमतौर पर आरंभ हो जाता है। ब्रज, मथुरा, वृंदावन, बरसाने और पुष्कर की होली का हिस्सा बनने के लिए देश ही नहीं, विदेशी भी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। पूर्णिमा पर होली और रंग का उत्सव मनाए जाने की पुरातन परंपरा हमारे देश में वर्षों से चली आ रही है। इसका इस कारण भी विशेष महत्व है, क्योंकि यही वक्त है, जब खेतों में सरसों फलनी फूलनी शुरू होती है।

गेहूं में बालियां आ जाती हैं। ऋतु परिवर्तित होती है। कई तरह के प्राकृतिक बदलाव बसंत ऋतु से देखने को मिलने लगते हैं। ऐसी धारणा और परंपरा भी है कि होली के बहाने लोग पुराने वैर भाव भूलकर गले मिल जाते हैं। इस दिन सब पुराने गिले-शिकवे भूलकर नए सिरे से शुरुआत करते हैं। पेड़, पौधे, पशु, पक्षी और मनुष्य, सभी उल्लास से परिपूर्ण दिखाई देने लगते हैं। बहुत से क्षेत्रों में रंगों से होली खेली जाती है तो बहुत से इलाकों में अब बदली हुई परिस्थितियों में लोग गुलाब, अबीर, टेसु के सूखे रंगों से होली खेलते हैं। पहले दिन होलिका दहन की परंपरा है। दूसरे दिन फाग खेलने की।

रंग के बाद नए वस्त्रादि धारण करने और ढोल बाजों के साथ नृत्य किए जाने और अपने अराध्यों के द्वार पर पहुंचकर उन्हें नमन करने की परंपरा चली आ रही है। होली कब से मनाई जा रही है, इसे लेकर कुछ पुख्ता जानकारी तो उपलब्ध नहीं है परन्तु पौराणिक ग्रंथों, नारद पुराण और भविष्य पुराण में भी इसका उल्लेख है। कई प्राचीन मंदिरों और पौराणिक स्थलों में दीवारों पर उकेरे गए भित्ती चित्रों में भी होली खेले जाने के दृश्य देखने को मिलते हैं। कई मुगल शासकों के भी होली पर्व में शामिल होने के दृष्टांत पढ़ने-सुनने को मिलते हैं।

खासकर मध्यकालीन भारतीय मंदिरों में होली के दृश्य दीवारों पर देखने को मिलते हैं। इसे लेकर कई तरह की कहानियां हैं। इनमें प्रमुख है हिरण्यकशिपु राजा की, जिसने अहंकार के वशीभूत होकर अपने राज्य में ईश्वर के नाम लेने पर पाबंदी लगा दी थी। उसके अपने पुत्र प्रह्लाद भगवान के अनन्य भक्त थे और बहन होलिका को यह वरदान था कि वह अग्नि में भस्म नहीं हो सकती। उनकी ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को लेकर आग में बैठे। ऐसी कहानी प्रचलित है कि होलिका जल गई, परन्तु प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ।

प्रह्लाद की याद में ही होली दहन की परंपरा बरसों से चली आ रही है। भारत के इतिहास, संस्कृति, साहित्य, गीत- संगीत में होली का विशिष्ट महत्व है। खासकर आधुनिक दौर में इस पर्व का महत्व और भी बढ़ गया है जबकि छोटी-छोटी बातों पर लोगों के बीच वैमनस्य का भाव पैदा होने लगा है। प्रांतों के बीच टकराव बढ़ते जा रहे हैं। वोट बैंक की राजनीति के चलते पार्टी हित देश हित पर भारी पड़ते दिखाई देने लगे हैं।

प्रेम, सद्भावना, आपसी समझबूझ व विश्वास के स्थान पर शत्रुता, दुर्भावना, छल कपट और दूसरे को नुकसान पहुंचाने की प्रवृति गहरे तक पैठ बनाती जा रही है। हमारे आचरण जाने-अनजाने में नई पीढ़ी को सकारात्मक दिशा में बढ़ाने के बजाय विध्वंसक गतिविधियों की ओर अग्रसर कर रहे हैं। भारत ही नहीं, दुनिया के बहुत से देश आतंकवाद की विभीषिका से ग्रस्त हैं। कई देशों में गृहयुद्ध जारी हैं, जिसमें अब तक लाखों लोगों की बहूमूल्य जानें जा चुकी हैं। आज की परिस्थितियों में इन त्योहारों का विशेष महत्व है। ऐसे माहौल में होली जैसे पर्व किसी एक विचारधारा के मानने वालों के लिए ही नहीं, समूची मानव जाति के लिए प्रेम, मेल-मिलाप और सद्भावना का संदेश देने का काम करते हैं।

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