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क्या बीमार मानसिकता का कोई इलाज हो सकता है?

जब से देश आजाद हुआ है, तब से भारत में हजारों दंगे हो चुके हैं, जिनमें लाखों लोग हताहत हुए हैं।

क्या बीमार मानसिकता का कोई इलाज हो सकता है?
यह देखकर आश्चर्य हो रहा है कि इस समय जिनके हाथों में स्वाधीनता संग्राम में अहम भूमिका निभाने वाली कांग्रेस की कमान है, वे भी बदजुबानी पर उतरते हुए दिखाई देने लगे हैं। जो नेता देश का नेतृत्व करने की सोच रहे हैं, वे भी निम्न स्तर की भाषा का प्रयोग करते हुए नजर आ रहे हैं। समाज और देश को बांटने वाले जिन मुद्दों को दफन कर दिया जाना चाहिए, उन्हें जान बूझकर उछाला जा रहा है। केवल इसलिए ताकि एक समुदाय विशेष को डराकर उनके वोट हासिल किए जा सकें।
जब से देश आजाद हुआ है, तब से भारत में हजारों दंगे हो चुके हैं, जिनमें लाखों लोग हताहत हुए हैं। कुछ ऐसे कत्लेआम भी हुए हैं, जिन्हें दंगे की र्शेणी में नहीं रखा जा सकता क्योंकि वे एकतरफा थे। अफसोस की बात तो यह है कि कोई विवेकशील व्यक्ति यदि नेताओं को सलाह देता है कि पिछली बातों को गाते रहने से कुछ हासिल नहीं होगा, आगे की तरफ देखें तो उसे भी गालियां दी जाने लगती हैं।
ताज्जुब की बात तो यह है कि ऐसे हालातों में मीडिया से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस तरह की कुत्सित मानसिकता वाले जहर भरे बयानों को नहीं उछाले परन्तु देखने में आ रहा है कि नफरत की इस मुहिम का प्रसार करने में वही अहम टूल बना हुआ है। जब से भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है, उसी समय से कुछ राजनीतिक जमातें निरंतर इस प्रयास में हैं कि किसी भी तरह से राजनीतिक फिजा में जहर घोलकर उसे साम्प्रदायिक आधार पर खेमों में विभाजित करके वोटों की फसल काट ली जाए। संभवत: नरेन्द्र मोदी को इसका अंदाजा था और इसीलिए उन्होंने अपने पूरे चुनाव अभियान में कभी भी कोई ऐसी बात नहीं कही, जिससे विभाजनकारी शक्तियों को उन्हें बदनाम करने अथवा सवाल खड़े करने का मौका मिल सके। मोदी ने केन्द्र की कांग्रेस नीत यूपीए सरकार की हर मोर्चे पर विफलता, घोटालों, कुशासन, महंगाई, बेरोजगारी और कालेधन जैसे सवालों को प्रमुखता से उठाया। विकास को मुद्दा बनाया। देश को बताया कि किस तरह उन्होंने गुजरात को देश के कुछ गिने-चुने विकसित राज्यों की र्शेणी में लाकर खड़ा किया है।
गुजरात दंगों का राग अलापकर समुदाय विशेष में भय उत्पन्न करके वोटों की फसल काटने का सपना देखने वाले नेताओं के लिए मोदी की सकारात्मक मुहिम किसी राजनीतिक धक्के से कम नहीं थी। यही वजह रही कि बार-बार इन लोगों ने फिर से गुजरात का राग अलापा। मीडिया में पहुंचकर निरंतर यह विलाप किया गया कि मोदी ने अभी तक भी माफी नहीं मांगी है। यह अपने आप में आश्चर्य की विषय है कि देश की किसी भी अदालत में मोदी के खिलाफ कोई वाद लंबित नहीं है। जितनी जांच कमेटी बनी, उनकी रिपोर्ट में उन्हें क्लीन चिट मिली। सुप्रीम कोर्ट तक एसआईटी की रिपोर्ट से संतुष्ट दिखा। ताज्जुब की बात तो यह है कि मीडिया पर होने वाली बहसों में कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी इसे पचा नहीं पा रहे हैं कि मोदी केवल विकास की बात कर रहे हैं। उन पर आरोप लगाए गए कि वे मीडिया को साक्षात्कार नहीं देते हैं। अब जबकि उन्होंने कुछ इंटरव्यू दिए हैं तो फिर से गुजरात का राग अलापा जाना शुरू हो गया है।
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