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चिंतन: हनुमनथप्पा की शहादत पर गमजदा देश को गर्व

करगिल फतह के बाद सियाचीन के बर्फीले पहाड़ों पर भारतीय सैनिकों की स्थाई मौजूदगी हो गई।

चिंतन: हनुमनथप्पा की शहादत पर गमजदा देश को गर्व
और देश ने अपना एक सपूत खो दिया। हिमवीर मद्रास रेजिमेंट के लांस नायक हनुमनथप्पा को नहीं बचाया जा सका। उनको बचाने की सभी कोशिशें नाकाम हो गईं। लाखों देशवासियों की दुआएं भी काम नहीं आईं। सरहद की रक्षा में बलिदान देने वाले वीर शहीद पर देश को सदा गर्व रहेगा। सियाचीन के दुर्गम इलाके में सीमा की रक्षा के दौरान हनुमनथप्पा अपने नौ और साथियों के साथ गश्त के दौरान अचानक हुए हिमपात के शिकार हो गए थे। इस दौरान सभी दस जांबाज जवान करीब 35 फीट बर्फ में दब गए थे। उस समय वहां -45 डिग्री तापमान था। उनमें से नौ का शव मिला था और सेना के सर्च ऑपरेशन के दौरान बर्फ में दबने के छह दिन बाद हनुमनथप्पा अकेला जीवित मिला था। खून जमा देने वाले तापमान में उनका जीवित मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं था। उन्हें बेहतर इलाज के लिए दिल्ली स्थित रेफरल आर्मी अस्पताल लाया गया। यहां वे तीन दिनों तक जिंदगी से जूझते रहे। इलाज के दौरान ही वे डीप कोमा में आ गए। डॉक्टरों ने हर संभव कोशिश की। लोग उन्हें किडनी व लीवर देने को भी तैयार हो गए। लेकिन मल्टीपल अर्गन फैल्योर की वजह से उन्हें बचाया नहीं जा सका। वे देश के लिए शहीद हो गए। पल झपकते ही दुश्मनों के दांत खट्टे कर देने वाला यह रीयल हीरो मौत से बाजी जीत कर फिर हार गया। अपने इस सपूत के लिए आज पूरा देश गमजदा है। इसके साथ ही उनके शौर्य, साहस व बलिदान पर समस्त देशवासियों को गर्व भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, तीनों सेना प्रमुखों ने अपने शोक संदेश में गहरा दुख प्रकट किया है। इस वक्त पूरा देश सभी भेदभाव भुलाकर मात्र 33 साल के शहीद हनुमनथप्पा के शोक-संतप्त परिवार के साथ खड़ा है। इस क्षण पूरा राष्ट्र एकजुट है। कभी कभार छोटी-मोटी ऊंच-नीच होने पर हम सेना पर सवाल उठाने में देर नहीं करते हैं, लेकिन उस वक्त हम भूल जाते हैं कि सेना के जवान किन कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, वे किस तरह अपनी जान को जोखिम में डालकर देश की सरहदों की रक्षा करते हैं, ताकि देशवासी महफूज रह सके और चैन की नींद सो सके। सियाचीन में हनुमनथप्पा समेत दस जवानों की शहादत उनसभी आलोचकों को जवाब है। 1980 से पहले सियाचीन पर कोई पहरा नहीं था। बाद में सेना ने बेस में मौजूदगी जतानी शुरू की। फिर भी ग्लेशियर अछूता था। इसका लाभ उठाकर पाकिस्तान ने करगिल को अंजाम दिया। करगिल फतह के बाद सियाचीन के बर्फीले पहाड़ों पर भारतीय सैनिकों की स्थाई मौजूदगी हो गई। तब से जवान ग्लेशियर पर गश्ती कर रहा है। सियाचीन में सेना अब तक करीब आठ हजार जवान गंवा चुका है। उनकी मौत हार्ट अटैक, अत्यधिक ठंड, हिमस्खलन, बर्फबारी आदि वजहों से हुई हैं। अब दस जवानों के शहीद होने के बाद सेना को सियाचीन जैसे दुर्गम क्षेत्र में सरहद की रक्षा के लिए तकनीक के अधिक से अधिक इस्तेमाल के विकल्पों पर भी गौर करना चाहिए। आज ड्रोन समेत अव्वल दज्रे के निगरानी उपकरण मौजूद हैं। बहरहाल कर्नाटक के एक गरीब परिवार से निकलकर लांस नायक तक का सफर करना वाले मजबूत इच्छा शक्ति के धनी हनुमनथप्पा की देश की रक्षा के लिए आहुति राष्ट्र सेवा का जज्बा रखने वालों को सदा प्रेरित करती रहेगी। देश को हमेशा उनके शौर्य व बलिदान पर अभिमान रहेगा।
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