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संसार चक्र चलाना है तो बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

देश के इन सौ जिलों में प्रति एक हजार लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या राष्ट्रीय औसत से भी काफी नीचे है।

संसार चक्र चलाना है तो बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

एक परिवार, समाज और देश के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती हैकि बेटियों को बचाने के लिए देशव्यापी मुहिम छेड़ने की जरूरत पड़ रही है। यह हमारी असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है कि बेटियों को जन्म से पूर्व ही मां की कोख में मार दिया जा रहा है। हरियाणा के पानीपत जिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना का आगाज किया है। यह योजना देश के सौ जिलों में लागू होगी। देश के इन सौ जिलों में प्रति एक हजार लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या राष्ट्रीय औसत से भी काफी नीचे है। वैसे तो पूरे देश में ही लिंगानुपात का स्तर चिंता का विषय बना हुआ है।

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2011 की जनगणना के अनुसार देश में छह वर्ष तक के प्रति एक हजार लड़कों की तुलना में 914 लड़कियां ही हैं। देश में सबसे भयावह स्थिति हरियाणा की है। यहां प्रति हजार लड़कों पर 830 लड़कियां ही हैं। हरियाणा के बारह जिलों की हालत तो और भी दयनीय है। यहां लिंगानुपात राज्य के औसत से भी नीचे पहुंच गया है। झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े राज्यों से भी लिंगानुपात के बदतर हालात हैं। जबकि हरियाणा आर्थिक संपदा से परिपूर्ण व साक्षरता के मामले में बेहतर स्थिति में है, फिर भी लोगों को बेटियां बोझ लग रही हैं। इसी वजह से इस योजना के शुभारंभ के लिए हरियाणा को चुना गया। दरअसल, आज पूरा देश बेटियों के मामले में निर्दयी बना हुआ है। अपनी गलतफहमियों के कारण हम प्रकृति के संतुलन के नियम को बदलने का काम कर रहे हैं। इसमें लिंग जांच करने वाली आधुनिक तकनीक व डॉक्टरों का भी बड़ा हाथ है। जिस डॉक्टर को जान बचाने की शिक्षा मिली है वही बेटियों की जान ले रहा है। लिंगानुपात में अंतर आने से यह संतुलन बिगड़ गया है, जिसके कारण कई सारी बुराइयां आज हमारे सामने खड़ी हो गई हैं।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक कहा है कि जो मां-बाप बेटे की चाह में बेटियों को मार रहे हैं, उन्हें यह सोचना चाहिए कि बेटियां रहेंगी ही नहीं तो बहुएं कहां से आएंगी। क्योंकि प्रति लड़कों पर जितनी बेटियां कम होंगी, उतने लड़कों की शादी नहीं होगी। आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। आज कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां लड़कियों ने कामयाबी के झंडे न गाड़े हों। कई क्षेत्रों में तो वे लड़कों से भी आगे हैं। फिर लड़कियों को पैदा करने और उनकी लड़कों के बराबर परवरिश देने में भेदभाव क्यों होता है? दरअसल, इसकी वजह पारंपरिक सोच है कि बेटा वंश चलाएगा, बुढ़ापे का सहारा बनेगा, जबकि बेटी को तो शादी के बाद दूसरे के घर जाना है।

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आज जो लोग भी ऐसा सोच रहे हैं, वे भारी भ्रम में हैं। यदि बेटे सहारा बनते तो देश में वृद्धा आश्रमों में बढ़ोतरी नहीं होती। जबकि देश में ऐसे ढेरों उदाहरण हैं जब बेटियों ने मां-बाप के प्रति अपनी जिम्मेदारी लड़कों से बढ़कर निभायी है। इसीलिए हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है। हमें बेटों की तरह बेटियों को भी अमूल्य धन के रूप में समझने की शुरुआत कर देनी चाहिए। स्त्री-पुरुष एक परिवार, समाज व देश के विकास के लिए जरूरी दो पहियों के समान हैं। एक पहिया मजबूत होगा और दूसरा कमजोर तो इनकी गाड़ी नहीं चलेगी। आइए आज से ही लड़कियों को सुरक्षित जन्म, समुचित शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और समाज में बराबरी का दर्जा देने का संकल्प लें।

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