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चिंतन: कठोर कानून के जरिए दासता से मुक्ति संभव

दुनिया भर में महिलाओं और बच्चों समेत चार करोड़ 58 लाख लोग ''आधुनिक गुलामी'' की गिरफ्त में है।

चिंतन: कठोर कानून के जरिए दासता से मुक्ति संभव
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मध्यकाल की सामंती व्यवस्था की देन 'गुलामी' आधुनिक युग में भी मौजूद है। बेशक औद्योगिक क्रांति के बाद आर्थिक प्रगति के चलते पूरी दुनिया के सामाजिक ताने-बाने (सोशल आर्डर) में अभूतपूर्व बदलाव हुआ है, फिर भी मध्ययुगीन दासता की निशानी से विश्व मुक्त नहीं हुआ है। ऑस्ट्रेलिया आधारित मानवाधिकर समूह 'वाक फ्री फाउंडेशन' की ओर से जारी 'वैश्विक गुलामी सूचकांक 2016' इसी तथ्य की पुष्टि करता है।

इस सूचकांक के मुताबिक दुनिया भर में महिलाओं और बच्चों समेत चार करोड़ 58 लाख लोग 'आधुनिक गुलामी' की गिरफ्त में है। दो साल पहले, 2014 में यह तादाद तीन करोड़ 58 लाख थी। इनमें भारत टॉप पर है। यहां एक अरब 30 करोड़ की आबादी में से एक करोड़ 83 लाख 50 हजार लोग आधुनिक गुलामी में जकड़े हैं। वर्ष 2014 में भारत में तादाद एक करोड़ 43 लाख थी। उत्तर कोरिया, उज्बेकिस्तान, कंबोडिया और कतर में इसकी व्यापकता ज्यादा है।

कोरिया में आबादी का 4.37 प्रतिशत आधुनिक दासता की गिरफ्त में है। दुनिया के 167 देशों में मॉडर्न स्लेवरी है। इनमें शीर्ष पांच देश एशिया के हैं। भारत के बाद चीन (33 लाख 90 हजार), पाकिस्तान (21 लाख 30 हजार), बांग्लादेश (15 लाख 30 हजार) और उज्बेकिस्तान (12 लाख 30 हजार) का स्थान है। आबादी के अनुपात में जिन देशों में सबसे कम आधुनिक गुलामी का आकलन किया गया है उनमें लक्जमबर्ग, नार्वे, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, स्वीडन, बेल्जियम, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं। बंधुआ मजदूरी, घरों में नौकर, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, जबरन शादी, वेश्यावृत्ति और भीख मांगना आदि आधुनिक दासता की श्रेणी में हैं।

इस गुलामी में शोषण के उन हालात को रखा गया है जिससे धमकी, हिंसा, जोर-जबरदस्ती, ताकत का दुरूपयोग या छल-कपट के चलते लोग नहीं निकल सकते हैं। दरअसल, जैसे-जैसे समाज जाति के चक्र को तोड़कर आर्थिक संरचना (इकॉनोमिक ऑर्डर) की ओर अग्रसर हुआ है, वैसे-वैसे दासता का रूप भी बदला है। आधुनिक गुलामी आर्थिक समाज की देन है। यह एक तरह से 'आर्थिक दुश्चक्र' की तरह है, जिसमें गरीब फंसे रहते हैं। भारत में आधुनिक दास्ता को खत्म करने की दिशा में सरकारी स्तर पर काफी काम हुआ है।

सरकार ने मानव तस्करी, गुलामी, बंधुआ मजदूरी, बाल वेश्यावृत्ति और जबरन शादी को अपराध घोषित किया है। निजी स्तर पर भी बंधुआ मजदूरी के खिलाफ काम करने के लिए कैलाश सत्यर्थी को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। फिर भी भारत में जिस तरह की गरीबी है और गरीबों की बहुत बड़ी आबादी भोजन-वस्त्र जैसी मूल जरूरतों से दो-चार है, उसमें आधुनिक दासता पर पूर्ण अंकुश आसान नहीं है। हालांकि मोदी सरकार सामाजिक क्षेत्र में बदलाव लाने के लिए काफी योजनाएं लागू की हैं। लेकिन यही काफी नहीं है। समाज के हर तबके के सहयोग के बिना आधुनिक दासता से मुक्ति संभव नहीं है।

भारत में बड़े सामाजिक परिवर्तन की जरूरत है और जातिगत जड़ता को भी समाप्त करने की आवश्यकता है। दुनिया भर के देशों में भी आधुनिक गुलामी पर प्रतिबंध लगाने के लिए कठोर कानून बनाने की जरूरत है। ब्रिटेन ने 2015 में सख्त आधुनिक गुलामी अधिनियम बनाया है। दूसरे देशों के लिए ब्रिटेन का कानून नजीर बन सकता है। संयुक्त राष्ट्र को भी आधुनिक दासता के खिलाफ सख्त अभियान चलाना होगा।

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