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और अब दिल्ली को भी जीतने की चुनौती

दिल्ली में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है।

और अब दिल्ली को भी जीतने की चुनौती
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दिल्ली में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। सभी राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधि राज्य के मतदाताओं को रिझाने के लिए कमर कस मैदान में उतर गए हैं। अब जब दस फरवरी को नतीजे आएंगे तो साफ हो जाएगा कि प्रदेश की जनता ने किसमें अपना विश्वास जताया है और किसे विपक्ष में बैठने का अवसर दिया है। दिल्ली में साल भर के बाद ही विधानसभा चुनाव कराने की नौबत इसलिए आई है क्योंकि गत वर्ष 14 फरवरी को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से सिर्फ 49 दिन तक ही सरकार चलाई थी।

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दरअसल, चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। अरविंद केजरीवाल के इस्तीफा देने के कारण विधानसभा निलंबित हो गई जिसे 4 नवंबर, 2014 को भंग कर दिया गया था। लगभग एक साल से दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लागू है। इससे पहले दिल्ली में दिसंबर 2013 में विधानसभा के चुनाव हुए थे, तब वहां कांग्रेस के पंद्रह साल के शासन का अंत हो गया था। चुनाव में 32 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। 28 सीटों के साथ आम आदमी पार्टी दूसरे और आठ सीटों के साथ कांग्रेस तीसरे स्थान पर थी। उस चुनाव में आप की सफलता ने सभी को चौंकाया जरूर था। उसकी जीत को कई राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवियों ने भारतीय राजनीति में आ रहे बड़े बदलाव की तरह देखा था। उसे नई राजनीति की संज्ञा दी गई थी। माना गया था कि आम आदमी पार्टी के चुनाव लड़ने के तौर तरीके राजनीति को नई दिशा देंगे, लेकिन बाद में स्वयं आप भी ज्यादा दिनों तक अपने सिद्धांतों पर टिकी नहीं रह सकी। कई ऐसे मौके आए जब लगा कि राज्य में संवैधानिक संकट पैदा हो जाएगा। लिहाजा साल भर में आप की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से गिरा है। अब इस चुनाव में उसका वजूद एक तरह से दांव पर है। जाहिर है, यह चुनाव आप की राजनीति की दिशा को तय करेगा। वहीं पूरे देश में कांग्रेस की हालत पहले से ही खराब है। दिल्ली में उसके उभार की अभी गुंजाइश कम ही दिख रही है। गत मईमें भाजपा दिल्ली की लोकसभा की सभी सात सीटें जीत गई थी। आम चुनावों के अनुसार भाजपा विधानसभा की साठ सीटों, जबकि आप सिर्फ दस सीटों पर ही आगे थी। कांग्रेस इसमें कहीं नहीं थी।

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हाल में चुनाव पूर्वजितने भी सर्वे आए हैं सभी में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने के अनुमान व्यक्त किए गए हैं। वहीं देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार प्रतीत हो रही है। क्योंकि आम चुनाव के बाद हुए चार राज्यों के चुनावों में भाजपा की जीत हुई है। इन चुनावों में भाजपा के प्रमुख चेहरा वही थे। लगता है, दिल्ली में भी पार्टी उन्हीं के नाम पर वोट मांगेगी। दरअसल, भाजपा ज्यादा से ज्यादा राज्यों में जीत दर्जकरना चाहती है। उसकी मंशा संसद के उच्च सदन राज्यसभा में भी अपनी सीटों को बढ़ाना है, जिससे आने वाले दिनों में संसद के जरिए देशहित में विकास के एजेंडे को लागू करने में कोई अड़चन न आए। हालांकि दिल्ली में आप के रूप में उसके सामने एक प्रतिद्वंद्वी मौजूद जरूर है। जाहिर है, भाजपा के सामने अब दिल्ली को भी जीतने की चुनौती होगी।

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